उड़ीसा हाईकोर्ट ने कटक शहर में खस्ताहाल सड़कों और जलभराव की समस्या पर कड़ा रुख अपनाते हुए प्रशासनिक व नागरिक निकायों को तय समयसीमा के भीतर सुधार करने के सख्त निर्देश दिए हैं। अदालत ने दो टूक कहा कि चलने लायक सुरक्षित सड़कें केवल तारकोल और पत्थर का ढांचा नहीं हैं, बल्कि यह संविधान के तहत नागरिकों को मिला बुनियादी जीवन का अधिकार हैं।
कटक में नागरिक समस्याओं और सड़कों की दुर्दशा पर वर्ष 2020 से लंबित स्वतः संज्ञान जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए जस्टिस के. आर. महापात्र और जस्टिस वी. नरसिंह की खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि पिछले कई वर्षों में दाखिल किए गए सरकारी अनुपालन हलफनामे जमीनी स्तर पर चलने योग्य सड़कों में नहीं बदल सके। इसके चलते नागरिकों को हर साल गड्ढों, उनकी खानापूर्ति वाली मरम्मत और फिर बारिश में उधड़ती सड़कों के अंतहीन कष्ट से जूझना पड़ रहा है। मामले की अगली सुनवाई 10 सितंबर को तय की गई है।
नगर निगम का 70 फीसदी सड़कों के ठीक होने का दावा खारिज
सुनवाई के दौरान कटक नगर निगम (सीएमसी) के वकील ने दावा किया कि शहर की 70 प्रतिशत मुख्य सड़कें फिलहाल अच्छी स्थिति में हैं। हालांकि, हाईकोर्ट ने इस दावे को स्वीकार करने से साफ इनकार कर दिया। जजों ने कहा कि विभिन्न वार्डों के लिए गठित अधिवक्ता समितियों की ओर से सामने आ रही जमीनी शिकायतें नगर निगम के इस आकलन से मेल नहीं खाती हैं।
अदालत ने वास्तविकता की जांच के लिए वार्ड-स्तरीय अधिवक्ता समितियों को निर्देश दिया कि वे अपने-अपने वार्डों में जाकर सड़कों का प्रत्यक्ष निरीक्षण करें और सात दिनों के भीतर अपनी समग्र रिपोर्ट अदालत में पेश करें।
अधिकारियों की पेशी और सात दिन में एक्शन प्लान का वादा
हाईकोर्ट के 27 अगस्त के आदेश के अनुपालन में 29 अगस्त को शीर्ष अधिकारियों को अदालत के समक्ष पेश होना पड़ा। सुनवाई में आवास एवं शहरी विकास विभाग की अतिरिक्त मुख्य सचिव उषा पाढ़ी और सीएमसी कमिश्नर किरणदीप कौर सहोता वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से जुड़ीं, जबकि निर्माण (वर्क्स) विभाग तथा सड़क एवं भवन (आरएंडबी) विभाग के वरिष्ठ अधिकारी अदालत कक्ष में व्यक्तिगत रूप से उपस्थित रहे।
अतिरिक्त मुख्य सचिव उषा पाढ़ी ने खंडपीठ को आश्वस्त किया कि कटक में सड़कों के निर्माण, नियमित रखरखाव और मरम्मत के लिए एक व्यापक योजना पर काम चल रहा है। इसके साथ ही बरसात के दिनों में जलभराव से निपटने के लिए एक विस्तृत परियोजना रिपोर्ट (डीपीआर) भी तैयार की जा रही है।
वहीं, निर्माण विभाग के विशेष सचिव ने शहर की सड़कों की मरम्मत से जुड़ा एक आधिकारिक प्रस्ताव अदालत में पेश किया और अगले सात दिनों में उठाए जाने वाले ठोस कदमों व समयसीमा के साथ हलफनामा दाखिल करने का वचन दिया।
सड़क केवल तारकोल और पत्थर नहीं, जीवनरेखा: हाईकोर्ट
नागरिक सुविधाओं की अनदेखी पर कड़ा एतराज जताते हुए खंडपीठ ने कहा कि आवागमन के लिए सुरक्षित सड़कें संविधान के अनुच्छेद 19(1)(d) के तहत निर्बाध आवाजाही और अनुच्छेद 21 के तहत जीवन के अधिकार से जुड़ी एक अनिवार्य जीवनरेखा हैं।
इस दौरान खंडपीठ ने मशहूर लेखक फ्रांज काफ्का के उपन्यास ‘द कैसल’ की निराशावादी पंक्ति—”उम्मीदें तो असीम हैं, लेकिन हमारे लिए नहीं”—का उल्लेख किया। अदालत ने कहा कि वह इस निराशा से असहमति जताती है और उसे राज्य सरकार के ताजा आश्वासनों पर पूरा भरोसा है कि इनसे जमीन पर वास्तविक और स्थायी बदलाव देखने को मिलेगा। साथ ही, अदालत ने सड़कों के बार-बार गड्ढों में तब्दील होने, अस्थायी मरम्मत और मानसून में दोबारा बर्बाद होने के कष्टदायी चक्र की तुलना शेक्सपियर के नाटक ‘किंग लियर’ (एक्ट 2) में वर्णित “हजारों चीखों वाले दुख” से की।
सालों से खिंचती समयसीमा और प्रशासनिक लापरवाही का इतिहास
हाईकोर्ट की यह सख्ती 2020 से जारी न्यायिक निगरानी का हिस्सा है। अदालत के रिकॉर्ड बताते हैं कि एजेंसियां बार-बार समयसीमा पूरा करने में विफल रही हैं। पूर्व में दुर्गा पूजा से पहले सड़कों की मरम्मत पूरी करने का वादा पूरा नहीं हुआ, जिसके बाद नगर निगम कमिश्नर ने नवंबर 2024 के अंत तक का समय मांगा था। इसके बाद दिसंबर 2024 में पेश की गई अनुपालन रिपोर्ट से खुलासा हुआ कि स्वीकृत 105 सड़क व नाला निर्माण कार्यों में से केवल 64 काम ही पूरे हो सके थे।
इससे पहले, 12 सितंबर 2024 को अदालत ने 15 वार्डों में क्षतिग्रस्त सड़कों की तत्काल मरम्मत के आदेश दिए थे, जिसके बाद 3 अक्टूबर को अधिवक्ता समिति ने कई इलाकों में भारी जलभराव और जर्जर सड़कों की जानकारी दी थी। 30 अक्टूबर 2024 को अपने आदेश में अदालत ने वार्ड नंबर 2 की एक सड़क को लेकर सीएमसी और सड़क एवं भवन विभाग के बीच आपसी तालमेल की भारी कमी पर फटकार लगाई थी, जहां दोनों महकमे एक-दूसरे पर जिम्मेदारी टाल रहे थे।
यह जांच 2025 में और कड़ी हो गई। 21 अगस्त 2025 के आदेश में खंडपीठ ने दर्ज किया कि हाल ही में मरम्मत की गई सड़कें बहुत कम समय में दोबारा टूट गईं, जो घटिया निर्माण कार्य और निगरानी के पूर्ण अभाव की ओर इशारा करता है। सितंबर 2025 में अदालत ने नगर निगम द्वारा मरम्मत के लिए चिह्नित सड़कों की सूची जमा न करने पर कड़ी नाराजगी जताई और इसे अदालती निगरानी से बचने का “धृष्टतापूर्ण प्रयास” करार दिया।
इसके बाद 9 अक्टूबर 2025 को हाईकोर्ट ने वार्ड इंजीनियरों को मरम्मत योग्य सभी सड़कों का ब्योरा और उन्हें पूरा करने की समयसीमा तय करने का निर्देश दिया था। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया था कि अस्पतालों, शिक्षण संस्थानों, बाजारों, दुर्घटना-संभावित क्षेत्रों और घनी आबादी वाले वार्डों की सड़कों को प्राथमिकता के आधार पर दुरुस्त किया जाए।

