हाजिरी में नियमों की अनदेखी कर सहानुभूति नहीं दिखा सकती अदालतें: केरल हाईकोर्ट

केरल हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि वैधानिक नियमों और विनियमों को दरकिनार कर केवल नरमी या सहानुभूति के आधार पर छात्रों की उपस्थिति में कमी को माफ नहीं किया जा सकता। अदालत ने कहा कि स्थापित नियमों की अनदेखी कर दिखाई गई सहानुभूति ‘गलत सहानुभूति’ की श्रेणी में आती है, जिससे पूरे छात्र समुदाय के साथ-साथ आम जनता का भी नुकसान होता है।

जस्टिस बेचू कुरियन थॉमस ने 1 सितंबर को यह टिप्पणी करते हुए एक छात्रा की याचिका खारिज कर दी। याचिकाकर्ता ने उपस्थिति अनिवार्य सीमा से कम होने के कारण परीक्षा पंजीकरण की अनुमति न मिलने के कॉलेज के फैसले को अदालत में चुनौती दी थी।

माफी योग्य सीमा से काफी नीचे थी उपस्थिति

रिकॉर्ड के अनुसार, याचिकाकर्ता छात्रा की उपस्थिति 59 से 69 प्रतिशत के बीच रही थी। विश्वविद्यालय और कॉलेज प्रशासन ने अदालत को बताया कि यह उपस्थिति नियमों के तहत छूट (कंडोनेशन) देने की निर्धारित सीमा से बहुत कम थी।

छात्रा की तरफ से पैरवी कर रहे वरिष्ठ वकील ने दलील दी कि कॉलेज प्रबंधन ने उपस्थिति दर्ज करने और उसकी गणना करने में गंभीर गलतियां की हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि छात्रा को नुकसान पहुंचाने के इरादे से उसकी वास्तविक उपस्थिति की प्रविष्टियां जानबूझकर दर्ज नहीं की गईं। यह भी दावा किया गया कि कॉलेज के प्रतिनिधियों ने उपस्थिति रिकॉर्ड में त्रुटियों की बात व्यावहारिक रूप से स्वीकार की थी।

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इसके विपरीत, विश्वविद्यालय ने पक्ष रखते हुए कहा कि छात्र शिकायत निवारण बोर्ड (BASG) ने पूरे मामले और रिकॉर्ड की विस्तृत जांच की थी। चूंकि जांच में कॉलेज द्वारा दर्ज उपस्थिति में कोई विसंगति या खामी नहीं पाई गई, इसलिए बोर्ड ने छात्रा की अपील को निरस्त कर दिया था।

अनुच्छेद 226 के तहत अदालती दखल का सीमित दायरा

हाईकोर्ट ने अपने फैसले में रेखांकित किया कि आदेश जारी करने से पूर्व शिकायत निवारण बोर्ड ने उपस्थिति के सभी विवरण मंगाए थे और कॉलेज द्वारा दर्ज किए गए रिकॉर्ड में कोई अनियमितता नहीं मिली।

अदालत ने यह भी माना कि याचिकाकर्ता ने कॉलेज प्रशासन पर किसी दुर्भावनापूर्ण इरादे का आरोप नहीं लगाया है। ऐसे में पूरे बैच में से केवल उसी छात्रा को चुनकर उसके साथ भेदभाव या अन्यायपूर्ण व्यवहार किए जाने की बात गले नहीं उतरती।

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संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत न्यायिक समीक्षा के दायरे का हवाला देते हुए बेंच ने कहा कि किसी विशेषज्ञ शैक्षणिक व अपीलीय प्राधिकरण के निर्णय में अदालतों के दखल की सीमाएं तय हैं। हाईकोर्ट ने कहा कि अपीलीय बोर्ड ने रिकॉर्ड खंगालने के बाद कॉलेज के रुख को खारिज करने का कोई आधार नहीं पाया, और अदालत के पास भी कॉलेज के रिकॉर्ड पर अविश्वास करने का कोई कारण मौजूद नहीं है।

अंतरिम राहत के बाद दोबारा अदालत पहुंची थी छात्रा

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यह मामला 9 मार्च 2026 से प्रस्तावित परीक्षाओं से पहले शुरू हुआ था। जब छात्रा को परीक्षा में बैठने से रोका गया, तब उसने हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी। उस समय मार्च में हाईकोर्ट ने उसे अंतरिम राहत देते हुए अनंतिम (प्रोविजनल) तौर पर परीक्षा पंजीकरण की अनुमति दी थी और साथ ही छात्र शिकायत निवारण बोर्ड (BASG) में अपील करने की छूट दी थी।

बोर्ड द्वारा रिकॉर्ड की पड़ताल के बाद अपील खारिज किए जाने पर छात्रा ने फिर से हाईकोर्ट का रुख किया था। अदालत ने मामले के सभी पहलुओं पर विचार करते हुए अंततः छात्रा की याचिका खारिज कर दी।

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