जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट ने रद्द की पीएसए हिरासत, 38 दिन की देरी और जमानत छुपाने पर प्रशासन को लगाई फटकार

जम्मू-कश्मीर एवं लद्दाख हाईकोर्ट ने एक 41 वर्षीय व्यक्ति के खिलाफ जन सुरक्षा कानून (पीएसए) के तहत जारी हिरासत आदेश को निरस्त कर दिया है। अदालत ने फैसला सुनाते हुए कहा कि हिरासत का आदेश जारी करने में हुई 38 दिनों की अकारण देरी और आरोपी को मिली अग्रिम जमानत की जानकारी छुपाना उसके संवैधानिक अधिकारों का खुला उल्लंघन है। पीठ ने यह भी स्पष्ट किया कि अग्रिम जमानत मिलने के ठीक चार दिन बाद पीएसए के तहत कार्रवाई करना न्यायिक आदेश को निष्प्रभावी करने के उद्देश्य से सत्ता का अनुचित प्रयोग दर्शाता है।

न्यायमूर्ति राजेश सेखरी की पीठ ने 29 अगस्त को पारित अपने आदेश में कहा कि किसी भी व्यक्ति की निवारक हिरासत तभी वैध मानी जा सकती है जब कथित गतिविधियों और हिरासत के फैसले के बीच सीधा व तात्कालिक संबंध बना रहे। अदालत ने पाया कि इस मामले में हिरासत आदेश से जुड़े महत्वपूर्ण अदालती दस्तावेजों को छुपाकर कानूनी प्रक्रियाओं की अनदेखी की गई।

जमानत के आदेश को प्रशासन से छुपाने पर कड़ा रुख

मामले की पृष्ठभूमि के अनुसार, याचिकाकर्ता को उसके खिलाफ दर्ज ताजा प्राथमिकी में 4 दिसंबर 2025 को अदालत से अग्रिम जमानत मिल गई थी। इसके ठीक चार दिन बाद, 8 दिसंबर 2025 को कठुआ के जिला मजिस्ट्रेट ने उसके खिलाफ पीएसए के तहत नजरबंदी वारंट जारी कर दिया। हिरासत के प्रस्ताव में इस जमानत आदेश का कोई उल्लेख नहीं किया गया था।

हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि प्रायोजक एजेंसी द्वारा हिरासत प्राधिकारी से जमानत के आदेश जैसे अहम तथ्य को छुपाना पूरे निवारक हिरासत आदेश को अवैध बना देता है। पीठ ने कहा कि ऐसी जानकारी छुपाए जाने से हिरासत प्राधिकारी निष्पक्ष और कानूनी रूप से सही निर्णय लेने से वंचित रह जाता है, साथ ही यह बंदी के उस संवैधानिक अधिकार पर भी चोट करता है जिसके तहत वह अपनी हिरासत को कानूनी चुनौती दे सकता है।

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38 दिनों तक फाइल दबाए रखने पर सवाल

सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता के. एस. जोहल और अधिवक्ता सुप्रीत सिंह जोहल ने दलील दी कि कठुआ के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक (एसएसपी) ने 30 अक्टूबर 2025 को हिरासत की सिफारिश भेजी थी, जबकि जिला मजिस्ट्रेट ने इस पर 8 दिसंबर 2025 को फैसला लिया। वकीलों ने कहा कि 38 दिनों के इस लंबे अंतराल ने कथित गतिविधियों और तत्काल कार्रवाई की जरूरत के बीच के तात्कालिक संबंध को पूरी तरह खत्म कर दिया।

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अदालत ने इस तर्क को स्वीकार करते हुए टिप्पणी की कि यदि याचिकाकर्ता की गतिविधियां कानून-व्यवस्था के लिए सचमुच इतनी गंभीर खतरा थीं, तो जिला मजिस्ट्रेट को पुलिस सिफारिश मिलते ही तुरंत कदम उठाना चाहिए था। अदालत ने कहा कि ऐसी स्थिति में संबंधित व्यक्ति को 38 दिनों तक खुले में घूमने और कथित असामाजिक गतिविधियों को जारी रखने की छूट नहीं दी जा सकती थी। पीठ ने कहा कि हिरासत प्राधिकारी लंबे समय तक इस मामले पर निष्क्रिय बैठा रहा और सिफारिश मिलने के बाद भी समय रहते आदेश पारित करने में आंखें मूंदे रहा।

धार्मिक टिप्पणी और पुराने मामलों का हवाला

दूसरी तरफ, सरकार की ओर से पेश अधिवक्ता सुनील मल्होत्रा ने हिरासत आदेश का बचाव करते हुए कहा कि प्रशासन ने पुख्ता आधार और दस्तावेजों की जांच के बाद ही यह कदम उठाया था। उन्होंने अदालत को बताया कि आरोपी के खिलाफ चार प्राथमिकियां और दो दैनिक डायरी रिपोर्ट (डीडीआर) दर्ज थीं, जो यह दर्शाती हैं कि वह लगातार शांति और सौहार्द बिगाड़ने वाली गतिविधियों में लिप्त रहा है।

पुलिस डोजियर में आरोप लगाया गया था कि आरोपी ने सोशल मीडिया पर भगवान राम को लेकर आपत्तिजनक टिप्पणियां की थीं और करवा चौथ का व्रत रखने वाली हिंदू महिलाओं का उपहास उड़ाते हुए फेसबुक पर वीडियो पोस्ट किया था। सरकारी वकील ने कहा कि बार-बार चेतावनी और कानूनी कार्रवाइयों के बावजूद आरोपी धर्म और जाति के आधार पर नफरत फैलाने वाली सामग्री पोस्ट करता रहा। इसके अलावा, हिरासत के खिलाफ आरोपी द्वारा सरकार को भेजा गया प्रतिवेदन भी नियमानुसार विचार के बाद खारिज किया जा चुका था।

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हाईकोर्ट ने याचिका स्वीकार कर हिरासत आदेश किया रद्द

अदालत ने सरकारी पक्ष की दलीलों को खारिज करते हुए कहा कि पुलिस सिफारिश के बाद हिरासत आदेश में हुआ अत्यधिक विलंब मौजूदा मामले के तथ्यों से मेल नहीं खाता। हाईकोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि हिरासत में हुई अनुचित देरी और महत्वपूर्ण जमानत आदेश को छुपाने के कारण पूरी प्रक्रिया दूषित हो गई। इन आधारों पर पीठ ने याचिकाकर्ता की अर्जी स्वीकार करते हुए उसके खिलाफ जारी पीएसए हिरासत आदेश को तत्काल प्रभाव से रद्द कर दिया।

यह समाचार रिपोर्ट स्वाभाविक हिंदी समाचार शैली में तैयार की गई है, जिसमें उल्लिखित सभी नाम, तिथियां, कानूनी टिप्पणियां और प्रशासनिक विवरण तथ्यात्मक रूप से शामिल हैं।

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