इलाहाबाद हाईकोर्ट ने दिल्ली विश्वविद्यालय की 25 वर्षीय पूर्व छात्रा और सामाजिक कार्यकर्ता आकृति चौधरी पर लगाए गए राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (एनएसए) को रद्द कर दिया है। अदालत ने इसे व्यक्तिगत स्वतंत्रता का गंभीर उल्लंघन बताते हुए उत्तर प्रदेश सरकार को निर्देश दिया है कि वह याचिकाकर्ता को 5 लाख रुपये का मुआवजा दे। यह राशि गौतम बुद्ध नगर की तत्कालीन जिलाधिकारी मेधा रूपम और एनएसए का प्रस्ताव तैयार करने वाले संबंधित पुलिस अधिकारियों—थानाध्यक्ष (एसएचओ) स्तर तक—के वेतन से वसूली जाएगी।
न्यायमूर्ति अतुल श्रीधरन और न्यायमूर्ति अचल सचदेव की खंडपीठ ने 2 सितंबर को दिए 15 पन्नों के आदेश में स्पष्ट किया कि संबंधित अधिकारियों के सेवा रिकॉर्ड में अदालत की कड़ी नाराजगी भी दर्ज की जाए। पीठ ने कहा कि चौधरी की हिरासत का आदेश बिना सोचे-समझे और बिना किसी ठोस आधार या साक्ष्य के जारी किया गया, जो संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत मिले जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार पर आघात है।
नौकरशाही के निरंकुश रवैये पर सख्त टिप्पणी
हाईकोर्ट ने प्रशासनिक तंत्र को चेताते हुए कहा कि अधिकारियों का निरंकुश रवैया राज्य को जॉर्ज ऑरवेल के अंधकारमय और दमनकारी समाज (ऑरवेलियन डिस्टोपिया) की ओर धकेल सकता है। अदालत ने रेखांकित किया कि नौकरशाही और पुलिस का कर्तव्य संविधान के प्रति है, न कि राजनीतिक कार्यपालिका के प्रति। लोकतंत्र में जनता ही वास्तविक मालिक है और अधिकारी जनता के सेवक हैं।
पीठ ने आगाह किया कि यदि अधिकारी अपने पद की शपथ को भूलकर काम करेंगे, तो नागरिक उन्हें ब्रिटिश हुकूमत का दमनकारी अवशेष मानने लगेंगे, जिससे समाज में जनाक्रोश पैदा हो सकता है। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि जब भी नागरिकों की स्वतंत्रता का बिना कानूनी प्रक्रिया के हनन होगा, न्यायपालिका अधिकारियों की जवाबदेही तय करने के लिए सख्त कदम उठाने से पीछे नहीं हटेगी।
जिलाधिकारी की भूमिका और कार्रवाई की आलोचना
अदालत ने गौतम बुद्ध नगर की जिलाधिकारी मेधा रूपम के आचरण की तीखी आलोचना की और उसे निंदनीय करार दिया। पीठ ने कहा कि जब पुलिस रिपोर्ट में बिना किसी ठोस प्रमाण के केवल आरोप लगाए गए थे, तब जिलाधिकारी का यह वैधानिक दायित्व था कि वे रिकॉर्ड की गहराई से पड़ताल करतीं।
पीठ ने रेखांकित किया कि आकृति चौधरी का कोई पूर्व आपराधिक इतिहास नहीं था और न ही उनके द्वारा हिंसा भड़काने का कोई साक्ष्य मिला। परिस्थितियों से स्पष्ट होता है कि जिलाधिकारी उन्हें एक नजीर बनाकर अन्य नागरिकों को मजदूरों के समर्थन में शांतिपूर्ण आवाज उठाने से रोकना चाहती थीं। अदालत ने दोहराया कि एनएसए जैसे सख्त कानून का इस्तेमाल सामान्य आपराधिक कानूनों के विकल्प के तौर पर नहीं किया जा सकता।
गिरफ्तारी की तारीख और दस्तावेजों में गंभीर फर्जीवाड़ा
हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता की गिरफ्तारी के समय और पुलिस रिकॉर्ड में गंभीर विसंगतियां पाईं। पुलिस ने कागजों में आकृति चौधरी की गिरफ्तारी 12 अप्रैल को दिखाई थी, जबकि उन्हें वास्तव में 11 अप्रैल की शाम करीब 5:30 बजे नोएडा के बॉटनिकल गार्डन मेट्रो स्टेशन से हिरासत में ले लिया गया था।
पुलिस ने अपनी कार्रवाई के बचाव में भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस) की धारा 130 के तहत जारी नोटिस का सहारा लिया। अदालत ने पाया कि इस नोटिस में जनरल डायरी (जीडी) प्रविष्टि संख्या 37 का उल्लेख था, जो 12 अप्रैल की सुबह 10:20 बजे दर्ज की गई थी।
न्यायमूर्ति अतुल श्रीधरन ने रेखांकित किया कि गिरफ्तारी से पहले जारी किए जाने वाले किसी नोटिस में बाद के समय की जीडी प्रविष्टि का दर्ज होना संभव ही नहीं है। उन्होंने कहा कि नोटिस में इस नंबर का दर्ज होना यह साबित करता है कि चौधरी पहले से ही हिरासत में थीं और धारा 130 का नोटिस महज एक दिखावा था। अदालत ने माना कि नोटिस पर जारी करने का समय जानबूझकर नहीं लिखा गया ताकि इस हेरफेर पर पर्दा डाला जा सके।
मजदूरों के हक में प्रदर्शन और एनएसए का दुरुपयोग
दिल्ली विश्वविद्यालय से इतिहास में स्नातक आकृति चौधरी को अप्रैल 2026 में नोएडा के औद्योगिक श्रमिकों द्वारा वेतन वृद्धि को लेकर किए गए शांतिपूर्ण प्रदर्शन के बाद अन्य कार्यकर्ताओं के साथ गिरफ्तार किया गया था। इसके बाद 13 मई को उत्तर प्रदेश पुलिस ने उनके और कार्यकर्ता-पत्रकार सत्य वर्मा के खिलाफ एनएसए के तहत कार्रवाई की थी।
हिरासत के आधारों की समीक्षा करते हुए हाईकोर्ट ने पाया कि आरोप सिर्फ दोहराव, कयास और व्यक्तिगत राय पर आधारित थे, जिनके पीछे कोई दस्तावेजी या तथ्यात्मक प्रमाण नहीं था।
शांतिपूर्ण विरोध के लोकतांत्रिक अधिकार का बचाव
अदालत ने अभिव्यक्ति और शांतिपूर्ण प्रदर्शन के अधिकार का पुरजोर समर्थन करते हुए कहा कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता में सड़कों पर उतरकर अपने अधिकारों के लिए शांतिपूर्वक संघर्ष करना शामिल है।
संभावित शांतिभंग की आशंका के नाम पर लोगों को इकट्ठा होने से रोकने को अदालत ने एक आत्मघाती कदम करार दिया। पीठ ने टिप्पणी की कि शांतिभंग के काल्पनिक डर से लोगों को सभा करने से रोकना ‘गंदे पानी के साथ बच्चे को भी फेंक देने’ जैसा है। संविधान सामूहिक अभिव्यक्ति के इस अधिकार की रक्षा करता है और प्रशासन की मनमर्जी या व्यक्तिपरक राय के आधार पर नागरिकों के इस अधिकार को छीना नहीं जा सकता।

