सुप्रीम कोर्ट ने देश के सभी राज्यों को निर्देश दिया है कि वे अपने यहां वृद्धाश्रमों की स्थापना और वरिष्ठ नागरिकों को दी जा रही सुविधाओं पर चार हफ्तों के भीतर नई स्थिति रिपोर्ट (स्टेटस रिपोर्ट) पेश करें।
चीफ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी मोहना की तीन सदस्यीय बेंच ने अटॉर्नी जनरल आर वेंकटरमणी को निर्देश दिया कि वे सभी राज्यों के एडवोकेट्स जनरल (महाधिवक्ताओं) से संपर्क कर यह ताजा जानकारी जुटाएं। राज्यों के लिए यह चार हफ्तों की समयसीमा उनके एडवोकेट्स जनरल को पत्र मिलने की तारीख से गिनी जाएगी।
स्थानांतरण से पहले जमीनी हकीकत परखेगा सुप्रीम कोर्ट
यह निर्देश 2016 से लंबित एक जनहित याचिका पर सुनवाई के दौरान सामने आया। सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार ने इस मामले को संबंधित राज्यों के हाईकोर्ट्स में भेजने का सुझाव दिया था। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने मामले को तुरंत स्थानांतरित करने के बजाय पहले देश भर में बुजुर्गों की देखभाल से जुड़े बुनियादी ढांचे की वास्तविक स्थिति की समीक्षा करने का फैसला किया।
अदालतों के अधिकार क्षेत्र और भूमिका पर बात करते हुए चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने स्पष्ट किया कि सुप्रीम कोर्ट इस संबंध में व्यापक सिद्धांत और रूपरेखा तय कर सकता है, जबकि जमीनी स्तर पर उनके प्रभावी क्रियान्वयन की जिम्मेदारी संबंधित राज्यों के हाईकोर्ट्स को सौंपी जा सकती है।
करोड़ों बुजुर्गों के अधिकारों की अनदेखी का उठाया मुद्दा
याचिकाकर्ता डॉ. अश्विनी कुमार ने अदालत में व्यक्तिगत रूप से पेश होकर अपनी दलीलें रखीं। उन्होंने बेंच से इस लंबे समय से अटके मामले पर तत्काल विचार करने का आग्रह किया। डॉ. कुमार ने कहा कि करोड़ों बुजुर्ग नागरिकों के मौलिक अधिकारों और कल्याण से जुड़ा यह मामला वर्षों से अनिर्णीत पड़ा है और इस पर जारी सतत परमादेश (कंटीन्यूइंग मैंडामस) पर आगे कोई सुनवाई नहीं हो सकी है।
अपनी याचिका में डॉ. कुमार ने देश के प्रत्येक जिले में वृद्धाश्रम स्थापित करने, बुजुर्गों को सम्मानजनक पेंशन देने और उनके लिए समर्पित वृद्धावस्था स्वास्थ्य देखभाल (जेरियाट्रिक केयर) की पुख्ता व्यवस्था सुनिश्चित करने की मांग की है।
संस्थागत सुरक्षा के लिए 2016 से जारी कानूनी लड़ाई
वरिष्ठ नागरिकों के लिए वैधानिक और संवैधानिक सुरक्षा उपायों को लागू कराने के मकसद से दायर यह जनहित याचिका वर्ष 2016 से शीर्ष अदालत के समक्ष विचाराधीन है। इस मामले में 8 अप्रैल 2016 को दिए गए शुरुआती आदेश में सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को नोटिस जारी किया था। साथ ही देश भर में बुजुर्गों के अधिकारों और कल्याण से जुड़े प्रभावी उपाय तैयार करने के लिए राष्ट्रीय कानूनी सेवा प्राधिकरण (नालसा) और हेल्पएज इंडिया से सहयोग मांगा था।
उस समय कोर्ट ने डॉ. कुमार को खुद बहस करने की अनुमति दी थी और बुजुर्गों की सेवा में लंबे अनुभव को देखते हुए हेल्पएज इंडिया को भी इस प्रक्रिया से जोड़ा था। अदालत ने हेल्पएज इंडिया से अनुरोध किया था कि वह याचिका में उठाए गए मुद्दों के समाधान के लिए एक व्यावहारिक योजना तैयार करने में बेंच की मदद करे।
इसके अलावा, बेंच ने नालसा के सदस्य-सचिव को भी नोटिस जारी कर पूछा था कि क्या बुजुर्गों के अधिकारों के संरक्षण के लिए कोई विशेष योजना पहले से मौजूद है। कोर्ट ने निर्देश दिया था कि यदि ऐसी कोई योजना है, तो उसकी प्रति अदालत में प्रस्तुत की जाए। वहीं, योजना न होने की स्थिति में नालसा को यह स्पष्ट करने के लिए कहा गया था कि क्या वह मौजूदा कानूनों के तहत वरिष्ठ नागरिकों को कानूनी सहायता देने और उनके अधिकारों की रक्षा के लिए कोई नई योजना तैयार कर सकता है। सुप्रीम कोर्ट ने नालसा और राज्य विधिक सेवा प्राधिकरणों द्वारा बुजुर्गों के बुनियादी और कानूनी अधिकारों की रक्षा के लिए उठाए जा सकने वाले अन्य कदमों की जानकारी भी मांगी थी।

