कर्नाटक हाईकोर्ट ने बिना अनुमति के काम से गायब रहने के मामले में बेंगलुरु मेट्रोपॉलिटन ट्रांसपोर्ट कॉरपोरेशन (बीएमटीसी) के एक पूर्व कंडक्टर की बर्खास्तगी को जायज ठहराया है। लगभग चार महीने तक ड्यूटी से नदारद रहने के कारण हटाए गए इस कर्मचारी की याचिका खारिज करते हुए अदालत ने साफ किया कि कर्मचारियों को छुट्टी का कोई पूर्ण या असीमित अधिकार प्राप्त नहीं है। बिना किसी ठोस वजह के निर्धारित कामकाजी घंटों के दौरान अनुपस्थित रहना सीधे तौर पर अनुशासनहीनता के दायरे में आता है।
जस्टिस ज्योति एम ने लेबर कोर्ट के फैसले पर अपनी मुहर लगाते हुए कहा कि औद्योगिक रोजगार में अनधिकृत अनुपस्थिति को गंभीर कदाचार माना जाता है, जिस पर दंडात्मक कार्रवाई पूरी तरह उचित है। अदालत ने रेखांकित किया कि काम के तय समय में किसी भी कर्मचारी को बिना वैध कारण के ड्यूटी से दूर नहीं रहना चाहिए और पूर्व स्वीकृति के बिना गायब रहना सीधे तौर पर सेवा नियमों का उल्लंघन है।
याचिकाकर्ता साल 1992 में बीएमटीसी में बतौर कंडक्टर नियुक्त हुआ था। उस पर 1 सितंबर 2014 से 24 दिसंबर 2014 के बीच बिना किसी सूचना के ड्यूटी से नदारद रहने का आरोप लगा। प्रबंधन द्वारा जारी आरोपपत्र का उसने कोई जवाब नहीं दिया, जिसके बाद एकतरफा विभागीय जांच पूरी कर 6 मई 2015 को उसे नौकरी से बर्खास्त कर दिया गया था।
कंडक्टर के पुराने रिकॉर्ड और लेबर कोर्ट के फैसले पर अदालत का रुख
इस बर्खास्तगी के खिलाफ कर्मचारी ने 2018 में औद्योगिक विवाद दर्ज कराया। लेबर कोर्ट ने 22 दिसंबर 2018 के अपने आदेश में माना कि प्रबंधन की आंतरिक विभागीय जांच उचित प्रक्रिया के अनुरूप नहीं थी, लेकिन इसके बावजूद रिकॉर्ड पर मौजूद तथ्यों को देखते हुए कर्मचारी की पुनर्बहाली की मांग ठुकरा दी गई। इसी आदेश को कंडक्टर ने हाईकोर्ट में चुनौती दी थी।
हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान बीएमटीसी की वकील एच आर रेणुका ने दलील दी कि उक्त अवधि के लिए कर्मचारी ने कभी कोई औपचारिक छुट्टी का आवेदन तक नहीं दिया था। रिकॉर्ड की पड़ताल के बाद अदालत ने पाया कि यह कर्मचारी अपने सेवाकाल के दौरान पहले भी 17 मौकों पर इसी तरह अनधिकृत रूप से ड्यूटी से गायब रह चुका था, जो उसकी पुरानी आदत को दर्शाता है।
अदालत ने यह भी दर्ज किया कि जिरह के दौरान पूर्व कंडक्टर ने 1 सितंबर 2014 से अनुपस्थित रहने की बात खुद स्वीकार की थी और वह आरोपों के जवाब में अपनी बेगुनाही का कोई प्रमाण पेश नहीं कर सका। अदालत ने कहा कि ऐसे पिछले रिकॉर्ड और पुख्ता सबूतों के मद्देनजर लेबर कोर्ट का यह निष्कर्ष बिल्कुल सही और तार्किक था कि कर्मचारी किसी भी प्रकार की सहानुभूति का हकदार नहीं है।
डीटीसी चालक की बर्खास्तगी पर दिल्ली हाईकोर्ट का निर्णय
इसी तरह के एक अन्य पुराने मामले में दिल्ली हाईकोर्ट ने दिल्ली परिवहन निगम (डीटीसी) के एक पूर्व ड्राइवर की बर्खास्तगी को सही ठहराया है। यह ड्राइवर 1988 में करीब सात महीने तक ड्यूटी से नदारद रहा था, जिसके चलते उसे सेवा से हटा दिया गया था। कानूनी लड़ाई के दौरान चालक की मृत्यु हो जाने के बाद उसके कानूनी वारिसों ने इस मामले को अदालत में आगे बढ़ाया।
जस्टिस वी कामेश्वर राव और जस्टिस मनमीत प्रीतम सिंह अरोड़ा की खंडपीठ ने 3 जुलाई के अपने आदेश में याचिका खारिज करते हुए स्पष्ट किया कि केवल एक दिन में विभागीय जांच पूरी हो जाने भर से पूरी प्रक्रिया अमान्य या अनुचित नहीं हो जाती। अदालत ने कहा कि पहली नजर में यह दलील भले ही आकर्षक लगे, लेकिन रिकॉर्ड से स्पष्ट है कि कर्मचारी को बचाव का पूरा मौका दिया गया था और उसने अपने पक्ष में गवाह या दस्तावेज पेश करने के लिए अतिरिक्त समय की मांग नहीं की थी। पीठ ने दोहराया कि अनधिकृत अनुपस्थिति को सहानुभूति के आधार पर माफ नहीं किया जा सकता और बीमारी के आधार पर ली जाने वाली छुट्टियों के समर्थन में कानूनी साक्ष्य होना अनिवार्य है।
चाइल्ड केयर लीव पर राजस्थान हाईकोर्ट की टिप्पणी
सरकारी सेवा में छुट्टियों के कानूनी अधिकार को लेकर राजस्थान हाईकोर्ट ने भी एक सरकारी शिक्षिका की याचिका पर अहम फैसला सुनाया। शिक्षिका ने चाइल्ड केयर लीव (सीसीएल) मंजूर होने की उम्मीद में काम से दूरी बना ली थी, जिसे विभाग ने अनधिकृत अनुपस्थिति मानकर अनुशासनात्मक कार्रवाई शुरू कर दी थी।
जस्टिस मुन्नूरी लक्ष्मण ने 29 अप्रैल के आदेश में याचिका खारिज करते हुए कहा कि कोई भी सरकारी कर्मचारी इस पूर्वानुमान के आधार पर काम से अनुपस्थित नहीं रह सकता कि उसकी सीसीएल मंजूर हो ही जाएगी। अदालत ने स्पष्ट किया कि छुट्टी पाना कर्मचारी का कानूनी हक नहीं है, बल्कि यह पूरी तरह नियोक्ता के विवेकाधिकार पर निर्भर करता है। इसके साथ ही यह भी स्पष्ट किया गया कि तय शर्तों को पूरा करने पर ही अधिकतम दो वर्ष की अवधि के लिए यह अवकाश स्वीकृत किया जा सकता है।

