मंदिर के पास प्रार्थना हॉल के पुनर्निर्माण को मद्रास हाईकोर्ट की हरी झंडी, कहा—महज आशंका के आधार पर नहीं रोका जा सकता धार्मिक सह-अस्तित्व

मद्रास हाईकोर्ट ने तमिलनाडु के शिवगंगा जिले में एक हिंदू मंदिर से करीब 45 मीटर की दूरी पर स्थित ईसाई प्रार्थना हॉल के पुनर्निर्माण की प्रशासनिक अनुमति को बरकरार रखा है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि विभिन्न धर्मों के शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व की संवैधानिक गारंटी को महज किसी अप्रमाणित आशंका या डर के आधार पर सीमित नहीं किया जा सकता।

जस्टिस एम. धंदापानी और जस्टिस एन. दिलीप कुमार की खंडपीठ ने हिंदू मुन्नानी के एक जिला कार्यकारिणी सदस्य की याचिका खारिज करते हुए यह फैसला सुनाया। याचिकाकर्ता ने दयापुरम गांव में चर्च की इमारत के पुनर्निर्माण के लिए शिवगंगा के जिला कलेक्टर द्वारा दी गई अनुमति को चुनौती दी थी।

25 अगस्त के अपने आदेश में जजों ने कहा कि कानून-व्यवस्था बिगड़ने की महज आशंका किसी प्रशासनिक फैसले में दखल देने का आधार नहीं बन सकती। कोर्ट ने यह भी रेखांकित किया कि सक्षम प्राधिकारी ने सभी जरूरी दस्तावेजों और मौके की मुआयना रिपोर्ट को देखने के बाद ही आदेश जारी किया था, जिसमें स्थानीय लोगों की ओर से किसी विवाद या आपत्ति का कोई जिक्र नहीं था।

प्रार्थना हॉल के 25 साल पुराने होने की पुष्टि

सुनवाई के दौरान प्रतिवादियों ने कोर्ट को बताया कि उस स्थान पर पिछले लगभग 25 वर्षों से प्रार्थना हॉल मौजूद है। इमारत काफी पुरानी और जर्जर हो चुकी थी, इसलिए केवल उसका पुनर्निर्माण कराया जा रहा है।

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प्रशासन द्वारा कराए गए फील्ड इंस्पेक्शन में भी यह बात सामने आई कि मंदिर और प्रार्थना हॉल के बीच लगभग 45 मीटर की दूरी है। इसके अलावा गांव के निवासियों ने अधिकारियों को बताया कि वे पिछले ढाई दशकों से वहां पूजा-अर्चना होते देख रहे हैं और उन्हें प्रार्थना हॉल के बने रहने या उसके दोबारा निर्माण पर कोई एतराज नहीं है।

वर्ष 2021 से चल रहा था कानूनी विवाद

यह मामला पहली बार 2021 में हाईकोर्ट पहुंचा था। उस समय याचिकाकर्ता ने आरोप लगाया था कि चर्च प्रबंधन जिला कलेक्टर की पूर्व अनुमति के बिना ही निर्माण कार्य करवा रहा है। इस पर कोर्ट ने अप्रैल 2021 में प्रशासन को उस परिसर पर ताला लगाकर सील करने का निर्देश दिया था।

साथ ही, हाईकोर्ट ने प्रतिवादियों को यह छूट दी थी कि वे पुनर्निर्माण के लिए जिला कलेक्टर के समक्ष विधिवत आवेदन कर सकते हैं। कलेक्टर से औपचारिक मंजूरी मिलने के बाद याचिकाकर्ता ने दोबारा हाईकोर्ट का रुख किया और दावा किया कि मंदिर के इतने नजदीक प्रार्थना हॉल बनने से इलाके में कानून-व्यवस्था की समस्या पैदा हो सकती है।

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याचिकाकर्ता के पास नहीं था कोई ठोस आधार

हाईकोर्ट ने अपने आदेश में यह स्पष्ट किया कि ऐसा कोई सबूत पेश नहीं किया गया जिससे साबित हो सके कि प्रार्थना हॉल का निर्माण या इस्तेमाल किसी भी कानूनी प्रावधान का उल्लंघन करता है। न ही कलेक्टर का फैसला कोर्ट के पिछले निर्देशों के विपरीत पाया गया।

पीठ ने यह भी दर्ज किया कि याचिकाकर्ता दयापुरम गांव का निवासी नहीं है और वह जिला प्रशासन के आदेश में किसी भी प्रकार की गैरकानूनी बात, प्रक्रियागत खामी, मनमानापन या अदालती निर्देशों की अनदेखी साबित करने में नाकाम रहा। इन आधारों पर कोर्ट ने जिला कलेक्टर के फैसले में किसी भी तरह का हस्तक्षेप करने से साफ इनकार कर दिया।

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