घरेलू हिंसा के आरोप साबित करने में विफल रहने और दोनों पक्षों के लगभग समान रूप से कमाने के आधार पर हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने एक महिला की 40,000 रुपये मासिक अंतरिम गुजारा भत्ते की मांग खारिज कर दी है। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि पति और पत्नी दोनों ही असिस्टेंट प्रोफेसर के पद पर कार्यरत हैं और उनकी आर्थिक स्थिति लगभग एक जैसी है, इसलिए यह नहीं कहा जा सकता कि महिला अपना भरण-पोषण करने में लाचार या असमर्थ है।
निचली अदालत और अपीलीय अदालत के फैसलों को चुनौती देने वाली महिला की रिवीजन याचिका पर सुनवाई करते हुए जस्टिस राकेश कैंथला ने यह निर्णय दिया। 3 सितंबर को जारी अपने आदेश में कोर्ट ने कहा कि घरेलू हिंसा साबित न कर पाने की स्थिति में पत्नी किसी भी प्रकार के भरण-पोषण या अन्य कानूनी राहत की हकदार नहीं है। इसके साथ ही हाईकोर्ट ने निचली अदालतों के उस आदेश को सही ठहराया, जिसमें अंतरिम गुजारा भत्ते की अर्जी नामंजूर कर दी गई थी।
शादी के छह दिन बाद ही अलग हो गया था दंपती
अदालती रिकॉर्ड के मुताबिक, दोनों का विवाह अक्टूबर 2023 में हुआ था, लेकिन शादी के महज छह दिन बाद 28 अक्टूबर 2023 को ही वे अलग हो गए। इसके बाद नवंबर 2023 में दोनों पक्षों के बीच एक समझौता पत्र (कॉम्प्रोमाइज डीड) तैयार किया गया था। इस दस्तावेज में स्पष्ट दर्ज था कि दोनों ने आपसी गलतफहमियों के चलते रजामंदी से अलग रहने का फैसला किया है।
जस्टिस कैंथला ने रेखांकित किया कि इस समझौते में घरेलू हिंसा या प्रताड़ना का कोई जिक्र तक नहीं था। ट्रायल कोर्ट और अपीलीय अदालत ने भी इसी निर्विवाद समझौते को मुख्य आधार माना था, क्योंकि रिकॉर्ड पर महिला के साथ किसी भी प्रकार की क्रूरता का कोई प्रमाण मौजूद नहीं था।
दोनों पक्षों ने लगाए एक-दूसरे पर आरोप
याचिकाकर्ता महिला ने अदालत के समक्ष दावा किया था कि ससुराल में उसे लगातार प्रताड़ित किया गया और कम दहेज लाने के ताने मारे गए। उसका आरोप था कि पति ने उसे कमरे के फर्श पर सोने के लिए मजबूर किया, रसोई में ताला लगा दिया और उसे खाना तक नहीं दिया। महिला की ओर से पैरवी कर रहे लीगल एड काउंसिल एडवोकेट विजय पांचटा ने दलील दी कि लगातार हो रहे दुर्व्यवहार के चलते महिला के लिए ससुराल में रहना असंभव हो गया था और कानूनी रूप से विवाहित पत्नी होने के नाते वह गुजारा भत्ता पाने की हकदार है। महिला ने यह भी बताया कि उसका पति एक सरकारी कॉलेज में असिस्टेंट प्रोफेसर है और हर महीने लगभग 1 लाख रुपये कमाता है।
इसके विपरीत, पति ने घरेलू हिंसा की शिकायत को पूरी तरह मनगढ़ंत और झूठा बताया। पति का कहना था कि शादी के बाद उसकी पत्नी ससुराल में केवल करीब पांच दिन ही रुकी और इस दौरान उसका रवैया बेहद असामान्य रहा। पति के मुताबिक, उसने शादी की फोटोग्राफी में शामिल होने से इनकार कर दिया, पति को एक अजनबी की तरह माना और वैवाहिक संबंध स्थापित करने से लगातार मना करती रही। पति ने यह भी आरोप लगाया कि महिला ने उसके और उसके परिवार के सदस्यों के साथ अनुचित व्यवहार किया। इसके अलावा, पति ने कोर्ट का ध्यान इस बात की ओर दिलाया कि महिला खुद भी असिस्टेंट प्रोफेसर के पद पर नौकरी कर रही है और आर्थिक रूप से पूरी तरह आत्मनिर्भर है।
वित्तीय आत्मनिर्भरता और साक्ष्यों के अभाव में खारिज हुई याचिका
ट्रायल कोर्ट ने पूर्व में पति के उन बयानों को विश्वसनीय माना था, जिनमें उसने कुछ ही दिन साथ रहने और वैवाहिक संबंध न बनने की बात कही थी। ट्रायल कोर्ट ने पाया था कि महिला आत्मनिर्भर है और अपना खर्च खुद उठाने में सक्षम है, जिसके आधार पर उसकी अर्जी खारिज कर दी गई थी। इसके बाद अपीलीय अदालत ने भी इस निर्णय को बरकरार रखा था।
दोनों अदालतों से अर्जी खारिज होने के बाद महिला ने हाईकोर्ट में रिवीजन याचिका दायर कर दावा किया था कि पूर्व की अदालतों ने उसके साथ हुई घरेलू हिंसा को अनदेखा किया है। हालांकि, हाईकोर्ट ने समस्त तथ्यों और समझौते का अवलोकन करते हुए माना कि अधीनस्थ अदालतों के निष्कर्ष में कोई त्रुटि नहीं थी, और घरेलू हिंसा साबित न होने व वित्तीय आत्मनिर्भरता के चलते महिला अंतरिम भरण-पोषण की हकदार नहीं है।

