बंधुआ मजदूरों के पुनर्वास में देरी राहत से वंचित करने के समान: सुप्रीम कोर्ट ने देशभर के लिए जारी किए निर्देश

सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि बंधुआ मजदूरों को मुक्त कराने के साथ ही राज्य की जिम्मेदारी समाप्त नहीं हो जाती। उनके पुनर्वास में अत्यधिक देरी का परिणाम उन्हें पुनर्वास से वंचित करने जैसा हो सकता है। कोर्ट ने मुक्त कराए गए बंधुआ मजदूरों को रिहाई प्रमाणपत्र जारी करने, तत्काल आर्थिक सहायता देने और पुनर्वास सुनिश्चित करने के लिए देशभर में समयसीमा निर्धारित की है।

जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस अपरेश कुमार सिंह की बेंच ने सभी राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों को संशोधित मानक संचालन प्रक्रिया (SOP) समान रूप से लागू करने का निर्देश दिया है। कोर्ट ने अनुपालन की निगरानी के लिए दोनों याचिकाएं लंबित रखी हैं।

रिहाई के 24 घंटे के भीतर प्रमाणपत्र, सात दिन में आर्थिक सहायता

सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया कि बंधुआ मजदूरी की शिकायतों का सत्यापन सामान्यतः 24 घंटे के भीतर किया जाए। बंधुआ मजदूर की पहचान होने के बाद सामान्यतः अगले 24 घंटे में रिहाई प्रमाणपत्र जारी किया जाए।

यह प्रमाणपत्र ऐसी भाषा में होना चाहिए जिसे संबंधित व्यक्ति समझ सके। केंद्र सरकार सभी राज्यों में मान्य एक समान प्रारूप निर्धारित करेगी।

कोर्ट ने कहा कि रिहाई प्रमाणपत्र जारी होने के सामान्यतः सात दिन के भीतर तत्काल आर्थिक सहायता दी जाए। इसके अलावा बचाव के 90 दिन के भीतर प्रत्येक व्यक्ति के लिए अलग पुनर्वास योजना तैयार की जाए।

बेंच ने स्पष्ट किया कि केवल जांच या आपराधिक कार्यवाही लंबित होने के आधार पर तत्काल आर्थिक सहायता नहीं रोकी जानी चाहिए।

तीन साल बाद मिली सहायता, 17 मजदूर अब भी भुगतान से वंचित

मामले की शुरुआत बंधुआ मजदूरी से मुक्त कराए गए सुरेंद्र मांझी की संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत दाखिल याचिका से हुई थी।

मांझी को 28 फरवरी 2019 को उत्तर प्रदेश के शाहजहांपुर जिले में एक ईंट भट्ठे से अन्य मजदूरों के साथ मुक्त कराया गया था।

ये मजदूर बिहार के विभिन्न जिलों से आए थे। आरोप था कि बंधुआ कर्ज चुकाने के नाम पर उन्हें वहां लाया गया और शोषणकारी परिस्थितियों में काम कराया गया।

READ ALSO  IIT suicide case: Special court grants bail to student arrested on abetment charges

मांझी को बंधुआ मजदूरों के पुनर्वास की केंद्रीय क्षेत्र योजना के तहत तत्काल आर्थिक सहायता वर्ष 2022 में मिली। यानी उन्हें मुक्त कराए जाने के लगभग तीन साल बाद भुगतान हुआ।

याचिका में दाखिल प्रत्युत्तर के अनुसार, जिन 42 मजदूरों को रिहाई प्रमाणपत्र दिए गए थे, उनमें से केवल 25 को 20,000 रुपये प्रति व्यक्ति मिले। शेष 17 मजदूर भुगतान की प्रतीक्षा कर रहे थे।

बिहार सरकार ने यह भी बताया कि उत्तर प्रदेश के अधिकारियों द्वारा जारी कुछ रिहाई प्रमाणपत्र निर्धारित प्रारूप में नहीं थे।

पुनर्वास के बिना मुक्ति अधूरी: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले की शुरुआत में कहा:

“हालांकि, केवल बचाव की कार्रवाई से बंधन से मुक्ति सुनिश्चित नहीं की जा सकती।”

बेंच ने कहा कि समस्या कानून की अनुपस्थिति नहीं, बल्कि उसके क्रियान्वयन में है।

कोर्ट ने टिप्पणी की:

“जब तक गरिमापूर्ण जीवन के लिए आवश्यक परिस्थितियां पूरी नहीं होतीं, तब तक बंधुआ मजदूर की रिहाई को राज्य के दायित्व की पूर्ति नहीं माना जा सकता।”

सुरेंद्र मांझी और भुगतान की प्रतीक्षा कर रहे 17 मजदूरों की स्थिति का उल्लेख करते हुए बेंच ने कहा:

“ये परिस्थितियां दर्शाती हैं कि पुनर्वास में देरी वास्तव में पुनर्वास से वंचित करने के समान हो सकती है।”

कोर्ट ने अंतरराज्यीय मामलों में प्रशासनिक मतभेदों के कारण मजदूरों को सहायता नहीं मिलने पर भी आपत्ति जताई।

बेंच ने कहा:

“मुक्त कराए गए मजदूर का अधिकार राज्यों की प्रशासनिक प्रक्रियाओं या अधिकार क्षेत्र से जुड़ी व्यवस्थाओं में अंतर पर निर्भर नहीं किया जा सकता।”

सभी राज्यों को छह महीने में लागू करनी होगी संशोधित SOP

सुप्रीम कोर्ट ने 14 मई 2026 की संशोधित SOP को सभी राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में छह महीने के भीतर लागू करने का निर्देश दिया।

केंद्र सरकार को राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) से परामर्श करके तीन महीने के भीतर पूरक दिशानिर्देश जारी करने होंगे।

कोर्ट ने केंद्र को पुनर्वास योजना में प्रस्तावित बदलावों पर भी तीन महीने में निर्णय लेने को कहा। इनमें आर्थिक सहायता बढ़ाने और अंतरिम जीवन-निर्वाह सहायता उपलब्ध कराने के प्रस्ताव शामिल हैं।

READ ALSO  विवाद की कार्यवाही के लंबित रहने के दौरान कर्मचारी को बर्खास्त नहीं किया जा सकता: हाई कोर्ट

सभी राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों को छह महीने के भीतर नोडल अधिकारी नियुक्त करना होगा।

बेंच ने स्पष्ट किया कि राज्यों के बीच किसी विवाद के कारण पात्र लाभार्थी का भुगतान नहीं रोका जा सकता।

17 मजदूरों को बकाया सहायता देने का निर्देश

सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश और बिहार सरकारों को निर्देश दिया कि वे भुगतान से वंचित 17 मजदूरों की स्थिति का एक महीने के भीतर संयुक्त सत्यापन करें।

इसके बाद बकाया आर्थिक सहायता का भुगतान प्राथमिकता के आधार पर तीन महीने में और किसी भी स्थिति में छह महीने के भीतर किया जाए।

पुनर्वास की निगरानी के लिए भी तय की व्यवस्था

कोर्ट ने बंधुआ मजदूरों से जुड़े मामलों की निगरानी के लिए NAVJIVAN पोर्टल के इस्तेमाल का निर्देश दिया।

राज्यस्तरीय निगरानी समितियां प्रत्येक महीने मामलों की समीक्षा करेंगी। जिला स्तर पर शिकायतों के निस्तारण के लिए अधिकारी नियुक्त किया जाएगा, जिसे सामान्यतः 30 दिन के भीतर शिकायतों का समाधान करना होगा।

बेंच ने कहा कि मुक्त कराए गए बच्चों के मामलों में बाल संरक्षण कानूनों का पालन सुनिश्चित किया जाए।

जिला सतर्कता समितियों को रिहाई के बाद कम से कम एक वर्ष तक संबंधित व्यक्तियों के पुनर्वास की समीक्षा करनी होगी।

READ ALSO  इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश सिंचाई विभाग में जूनियर इंजीनियरों की वरिष्ठता सूची की पुष्टि की

केंद्र और राज्यों से अनुपालन रिपोर्ट तलब

सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को चार महीने के भीतर अनुपालन हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया।

राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों को छह महीने के भीतर निर्देशों का पालन करना होगा और उसके बाद दो सप्ताह में अनुपालन हलफनामे दाखिल करने होंगे।

मामले की अगली सुनवाई सात महीने बाद होगी।

सुनवाई के दौरान कोर्ट ने केंद्र सरकार के 15 मई 2026 के अनुपालन हलफनामे और याचिकाकर्ता संख्या दो बचपन बचाओ आंदोलन के सुझावों पर विचार किया।

एक अन्य याचिका नेशनल कैंपेन कमेटी फॉर द इरैडिकेशन ऑफ बॉन्डेड लेबर और अन्य ने दाखिल की थी, जिसमें बंधुआ मजदूरी की निरंतर मौजूदगी और बंधुआ मजदूरी प्रथा (उन्मूलन) अधिनियम, 1976 के कमजोर क्रियान्वयन का मुद्दा उठाया गया था। इस याचिका को 18 अगस्त 2026 को पहली याचिका के साथ जोड़ा गया था।

केंद्र की ओर से भारत के अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणी तथा याचिकाकर्ताओं की ओर से अधिवक्ता अभिषेक जेबराज और संजना ग्रेस थॉमस ने दलीलें रखीं।

बेंच ने कहा कि यह कार्यवाही पक्षों के बीच टकराव की नहीं है, क्योंकि याचिकाकर्ताओं, केंद्र, राज्यों और अन्य संबंधित पक्षों का साझा उद्देश्य बंधुआ मजदूरी को समाप्त करना है।

केस डिटेल्स

केस टाइटल: Surendra Manjhi & Anr. v. Union of India & Ors.

केस नंबर: Writ Petition (Civil) No. 511 of 2022 with Writ Petition (C) Diary No. 32325 of 2026

पीठ: जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस अपरेश कुमार सिंह

फैसले की तारीख: 2 नवंबर 2026

Law Trend
Law Trendhttps://lawtrend.in/
Legal News Website Providing Latest Judgments of Supreme Court and High Court

Related Articles

Latest Articles