सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि किसी पुरुष की पहले से शादी होने की जानकारी मिलने के बावजूद उसके साथ संबंध जारी रखने वाली महिला यह दावा नहीं कर सकती कि उसे धोखे से अपनी कानूनी पत्नी होने का विश्वास दिलाया गया था।
जस्टिस बी.वी. नागरत्ना और जस्टिस आर. महादेवन की डिवीजन बेंच ने इस टिप्पणी के साथ केरल हाईकोर्ट और ट्रायल कोर्ट के आदेश रद्द कर दिए। कोर्ट ने आरोपी को भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 376, 420, 493, 494 और 495 के तहत लगाए गए आरोपों से मुक्त कर दिया।
बेंच ने कहा कि उपलब्ध परिस्थितियों से यह मामला आपसी सहमति से बने संबंध का प्रतीत होता है, जिसे संभवतः सामाजिक जांच या बदनामी से बचने के लिए विवाह का रूप दिया गया था और जो बाद में समाप्त हो गया।
1996 में कथित विवाह, 2008 में शुरू हुआ विवाद
शिकायतकर्ता के अनुसार, आरोपी ने खुद को अविवाहित बताया और उससे शादी करने का प्रस्ताव रखा। वर्ष 1996 में दोनों मैसूर गए, जहां एक मंदिर में उनका कथित विवाह हुआ। इसके बाद वे वर्ष 2003 तक साथ रहे।
वर्ष 2008 में महिला ने उपेक्षा का आरोप लगाते हुए घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम, 2005 के तहत मजिस्ट्रेट के समक्ष कार्यवाही शुरू की।
इसी दौरान आरोपी ने बताया कि वह पहले से विवाहित है और उसके दो बच्चे हैं।
31 अगस्त 2009 को महिला की शिकायत खारिज हो गई। इसके खिलाफ दाखिल अपील भी सफल नहीं हुई।
इसके बाद महिला ने IPC की धारा 376, 420, 493, 494 और 495 के तहत निजी शिकायत दाखिल की, जो 4 अप्रैल 2011 को पैरवी के अभाव में खारिज हो गई।
समान आरोपों वाली दूसरी शिकायत मजिस्ट्रेट ने दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 156(3) के तहत पुलिस को भेजी। इसके आधार पर कादिरूर पुलिस स्टेशन में एफआईआर संख्या 503/2011 दर्ज हुई।
9 जनवरी 2015 को ट्रायल कोर्ट ने आरोपी का आरोपमुक्त करने का आवेदन खारिज कर दिया।
21 मई 2025 को केरल हाईकोर्ट ने भी इस आदेश को बरकरार रखा। हाईकोर्ट का मानना था कि तथ्य संबंधी गलत धारणा के आधार पर दी गई सहमति बलात्कार का मामला बन सकती है।
आरोपी ने कहा, महिला को पहले से थी शादी की जानकारी
अपीलकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता आर. बसंत ने दलील दी कि दोनों के बीच संबंध आपसी सहमति से थे।
उन्होंने कहा कि महिला ने पहले की कार्यवाही में स्वीकार किया था कि कथित विवाह के नौ महीने के भीतर आरोपी के भाई ने उसे उसकी पहली शादी की जानकारी दे दी थी।
बचाव पक्ष ने यह भी कहा कि महिला उस मंदिर की पहचान तक नहीं कर सकी, जहां कथित विवाह हुआ था।
अपीलकर्ता ने आपराधिक कार्यवाही को बदला लेने और आर्थिक दबाव बनाने का प्रयास बताया।
शिकायतकर्ता की ओर से एडवोकेट-ऑन-रिकॉर्ड के. राजीव ने तर्क दिया कि पहली शिकायत गुण-दोष के आधार पर खारिज नहीं हुई थी, इसलिए दूसरी शिकायत दाखिल करने पर रोक नहीं थी।
उन्होंने कहा कि आरोपी लगातार आश्वासन देता रहा कि वह विवाहित नहीं है। महिला ने आईवीएफ उपचार के रिकॉर्ड का उल्लेख किया, जिसमें आरोपी ने पति के रूप में हस्ताक्षर किए थे।
इसके अतिरिक्त किरायानामा और संयुक्त डाकघर बचत खाते को भी संबंध के समर्थन में प्रस्तुत किया गया।
पहली शादी की जानकारी के बाद भी संबंध जारी रखने पर कोर्ट ने उठाया सवाल
सुप्रीम कोर्ट ने IPC की धारा 493 के तहत आरोप की जांच करते हुए पाया कि महिला ने स्वीकार किया था कि वर्ष 1996 में साथ रहना शुरू करने के छह महीने के भीतर उसे आरोपी की पहली शादी के बारे में पता चल गया था।
इसके बावजूद उसने आरोपी का साथ छोड़ने का कोई प्रयास नहीं किया।
बेंच ने कहा:
“यह अस्वीकार्य और अविश्वसनीय है कि वह केवल आरोपी के कथित मौखिक आश्वासनों के आधार पर खुद को उसकी कानूनी पत्नी मानती रही, जबकि उसे इसके विपरीत जानकारी मिल चुकी थी।”
कोर्ट ने आगे कहा:
“यह आचरण स्पष्ट रूप से संकेत देता है कि अपीलकर्ता और प्रतिवादी संख्या दो के बीच संबंध आपसी सहमति से था और वह किसी कानूनी रूप से मान्यता प्राप्त विवाह की प्रकृति का नहीं था।”
महिला द्वारा प्रस्तुत दस्तावेजों पर भी बेंच ने कहा कि उनसे अपने आप किसी प्रकार का विवाह साबित नहीं होता।
कोर्ट ने टिप्पणी की:
“ये दस्तावेज अपने आप में किसी प्रकार के विवाह के अस्तित्व का संकेत नहीं देते, बल्कि केवल लंबे समय से चले आ रहे व्यक्तिगत संबंध को दर्शाते हैं।”
धोखाधड़ी और दूसरी शादी के आरोप भी नहीं टिके
सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि IPC की धारा 494 और 495 के तहत आरोपों के लिए वैध विवाह का प्रथमदृष्टया मामला स्थापित नहीं हुआ था।
इसी तरह धारा 420 के तहत धोखाधड़ी के आरोप के संबंध में रिकॉर्ड पर ऐसा कोई तथ्य नहीं था जिससे पता चले कि महिला ने आरोपी को कोई संपत्ति सौंपी थी या किसी मूल्यवान प्रतिभूति में परिवर्तन किया था।
कोर्ट ने माना कि इन अपराधों के आवश्यक तत्व प्रथमदृष्टया स्थापित नहीं हुए।
सहमति से बने संबंध समाप्त होने पर बलात्कार का आरोप लगाने की प्रवृत्ति पर चिंता
IPC की धारा 376(2)(n) के तहत आरोप की जांच करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि बार-बार बने शारीरिक संबंध दोनों के बीच जारी व्यक्तिगत संबंध का हिस्सा थे। उन्हें उस संबंध से अलग करके नहीं देखा जा सकता।
बेंच ने टिप्पणी की:
“हाल के वर्षों में एक चिंताजनक प्रवृत्ति सामने आई है, जिसमें समाप्त हो चुके सहमति-आधारित संबंधों की बाद में बारीकी से जांच की जाती है, ताकि ऐसी बातों की पहचान की जा सके जिन्हें घटना के बाद हिंसा और यौन उत्पीड़न के रूप में प्रस्तुत किया जा सके।”
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यौन अपराधों के वास्तविक मामलों में पूरी गंभीरता से कार्यवाही होनी चाहिए। हालांकि, संबंध समाप्त होने पर न्यायिक व्यवस्था का इस्तेमाल प्रतिशोध के साधन के रूप में नहीं किया जाना चाहिए।
बेंच ने कहा:
“जब संबंध विफल हो जाते हैं, तो न्याय व्यवस्था को बदला लेने का साधन नहीं बनाया जाना चाहिए।”
कोर्ट ने आगे कहा:
“आपराधिक कानून का इस्तेमाल व्यक्तिगत हिसाब चुकता करने, बदला लेने या किसी व्यक्ति को किसी विशेष तरीके से कार्य करने के लिए मजबूर करने के हथियार के रूप में नहीं किया जा सकता।”
हाईकोर्ट और ट्रायल कोर्ट के आदेश रद्द
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि केरल हाईकोर्ट ने मामले पर विचार करते समय पूरी तरह गलत आधार अपनाया था।
बेंच ने Union of India vs. Prafulla Kumar Samal और Sajjan Kumar vs. Central Bureau of Investigation में निर्धारित सिद्धांतों को लागू करते हुए आरोपी की अपील स्वीकार कर ली।
इसके साथ ही हाईकोर्ट और ट्रायल कोर्ट के आदेश रद्द कर आरोपी को सभी संबंधित आरोपों से मुक्त कर दिया गया।
केस डिटेल्स
केस टाइटल: Santhosh Kumar N.P. vs. State-Station House Officer, Kadirur Police, Tellicherry, Kannur District & Another
केस नंबर: Criminal Appeal Nos. ___ of 2026 (Arising out of SLP (Crl.) Nos. 10173-10174 of 2025)
पीठ: जस्टिस बी.वी. नागरत्ना और जस्टिस आर. महादेवन
फैसले की तारीख: 30 अक्टूबर 2026
