सुप्रीम कोर्ट के बाध्यकारी फैसले पर आधारित आदेश की समीक्षा नहीं कर सकता ट्रिब्यूनल: सुप्रीम कोर्ट ने DVC टैरिफ आदेश बहाल किया

सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि कोई ट्रिब्यूनल उसके बाध्यकारी फैसले के आधार पर तय हो चुके कानूनी मुद्दे को समीक्षा के जरिए दोबारा नहीं खोल सकता। कोर्ट ने दामोदर वैली कॉरपोरेशन (DVC) के बिजली टैरिफ से जुड़े मामले में विद्युत अपीलीय ट्रिब्यूनल (APTEL) का समीक्षा आदेश रद्द करते हुए न्यायिक अनुशासन और संविधान के अनुच्छेद 141 के पालन पर जोर दिया।

जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की पीठ ने APTEL का 17 मई 2019 का मूल आदेश बहाल कर दिया। साथ ही मैथन एलॉयज लिमिटेड पर 2 लाख रुपये और स्टील अथॉरिटी ऑफ इंडिया लिमिटेड (SAIL) पर 1.5 लाख रुपये का जुर्माना लगाया।

बेंच ने फैसले की शुरुआत में टिप्पणी की:

“ऐसा अक्सर नहीं होता, लेकिन कभी-कभी हमारे सामने ऐसे आदेश आते हैं, जैसा कि वर्तमान मामले में चुनौती दिया गया आदेश है, जो न्यायिक अनुशासन का खुला उल्लंघन और भारत के संविधान के अनुच्छेद 141 का स्पष्ट उल्लंघन है।”

सिंकिंग फंड को बिजली टैरिफ में शामिल करने का विवाद

मामला DVC के वर्ष 2009 से 2014 के बिजली टैरिफ निर्धारण से संबंधित था। केंद्रीय विद्युत नियामक आयोग (CERC) ने विद्युत अधिनियम, 2003, दामोदर वैली कॉरपोरेशन अधिनियम, 1948 और वर्ष 2009 के टैरिफ विनियमों के तहत टैरिफ निर्धारित किया था।

विवाद इस बात पर था कि DVC द्वारा जारी बॉन्ड के भुगतान के लिए मुनाफे से अलग रखी जाने वाली राशि, जिसे सिंकिंग फंड कहा जाता है, को टैरिफ में शामिल किया जा सकता है या नहीं।

सुप्रीम कोर्ट वर्ष 2018 में Bhaskar Shrachi Alloys Limited & Ors. v. Damodar Valley Corporation & Ors. मामले में पहले की टैरिफ अवधि के लिए इस मुद्दे पर निर्णय दे चुका था।

इसी फैसले के आधार पर APTEL ने 17 मई 2019 को CERC का आदेश बरकरार रखा था।

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उस आदेश के खिलाफ अपील नहीं की गई, लेकिन ट्रिब्यूनल के समक्ष समीक्षा याचिका पांच वर्षों तक लंबित रही।

वर्ष 2024 में APTEL ने समीक्षा स्वीकार करते हुए कहा कि DVC सिंकिंग फंड में योगदान या बॉन्ड की राशि से बनाई गई पूंजीगत संपत्तियों पर मूल्यह्रास (Depreciation) में से केवल एक मद का दावा कर सकता है।

DVC ने समीक्षा आदेश को दी चुनौती

DVC की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता विकास सिंह और डॉ. अभिषेक मनु सिंघवी ने तर्क दिया कि सुप्रीम कोर्ट के बाध्यकारी फैसले के आधार पर पारित पांच वर्ष पुराने आदेश की समीक्षा करना उचित नहीं था।

उन्होंने कहा कि सिंकिंग फंड वैधानिक प्रावधानों के तहत स्वीकार्य खर्च है। DVC पर बाढ़ नियंत्रण, सिंचाई और क्षेत्रीय विकास से संबंधित वैधानिक जिम्मेदारियां भी हैं।

SAIL की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता राजीव शकधर उपस्थित हुए।

पहले प्रतिवादी और समीक्षा याचिकाकर्ता की ओर से एडवोकेट-ऑन-रिकॉर्ड राजीव यादव ने दलील दी कि मूल्यह्रास और सिंकिंग फंड दोनों को टैरिफ में शामिल करने से DVC को दोहरा लाभ मिलता है, जिसका बोझ उपभोक्ताओं पर पड़ता है।

उन्होंने कहा कि बॉन्ड के भुगतान के लिए बनाया गया रिजर्व फंड केवल मुनाफे से निकाला जा सकता है और उसे टैरिफ निर्धारण के लिए खर्च नहीं माना जा सकता।

पहले के सुप्रीम कोर्ट फैसले पर संदेह का कोई कारण नहीं

सुप्रीम कोर्ट ने विद्युत अधिनियम की धारा 14 के चौथे परंतुक की जांच करते हुए Bhaskar Shrachi Alloys फैसले से सहमति जताई।

बेंच ने कहा कि DVC अधिनियम उन मामलों में लागू रहेगा, जहां उसके प्रावधान विद्युत अधिनियम, 2003 से असंगत नहीं हैं।

कोर्ट ने कहा:

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“हमें पहले के फैसले पर संदेह करने का बिल्कुल कोई कारण नहीं दिखाई देता।”

बेंच ने पाया कि वर्ष 2009 के टैरिफ विनियमों का विनियम 43 स्पष्ट रूप से DVC अधिनियम की धारा 40 के तहत स्थापित फंड को टैरिफ के जरिए वसूल किए जाने वाले खर्च में शामिल करने की अनुमति देता है।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि पहले के फैसले में भले ही ‘दोहराव’ या ‘दोहरी अनुमति’ जैसे शब्दों का इस्तेमाल नहीं हुआ था, लेकिन मूल्यह्रास को स्वीकार करते हुए सिंकिंग फंड की टैरिफ के जरिए वसूली को भी मान्यता दी गई थी।

कोर्ट ने यह भी पाया कि समीक्षा याचिकाकर्ता ने स्वयं अपनी याचिका में स्वीकार किया था कि Bhaskar Shrachi Alloys फैसले के बाद सिंकिंग फंड का मुद्दा अब अनिर्णीत नहीं रह गया था।

समीक्षा के नाम पर गलत आदेश को भी दोबारा नहीं सुधारा जा सकता

सुप्रीम कोर्ट ने State of West Bengal v. Kamal Sengupta फैसले में निर्धारित सिद्धांतों का उल्लेख करते हुए कहा कि समीक्षा की आड़ में किसी गलत आदेश को भी सुधारा नहीं जा सकता।

APTEL के रवैये पर नाराजगी व्यक्त करते हुए बेंच ने टिप्पणी की:

“हम यह कहे बिना नहीं रह सकते कि ट्रिब्यूनल पूरी तरह रास्ते से भटक गया है। इस अभिव्यक्ति के लिए हमें खेद है, लेकिन समीक्षा स्वीकार किए जाने पर अपनी नाराजगी व्यक्त करने के लिए हमें इससे उपयुक्त कोई दूसरा शब्द नहीं मिला।”

कोर्ट ने समीक्षा आदेश को “स्पष्ट रूप से अवैध, पूरी तरह अनुचित और न्यायिक अनुशासन के सिद्धांतों का खुला उल्लंघन” बताया।

अनुच्छेद 141 का पालन अनिवार्य

सुप्रीम कोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 141 के महत्व पर जोर देते हुए कहा कि देश की सर्वोच्च अदालत द्वारा घोषित कानून का पालन सभी संबंधित अदालतों और ट्रिब्यूनलों के लिए अनिवार्य है।

बेंच ने कहा:

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“यह एक संवैधानिक प्राधिकार है, जो सुनिश्चित करता है कि देश की सर्वोच्च अदालत के फैसलों का पालन किया जाए। इसके बिना पूरी व्यवस्था में अराजकता फैल जाएगी।”

कोर्ट ने माना कि APTEL ने बाध्यकारी न्यायिक फैसले के बावजूद उसी मुद्दे पर समीक्षा स्वीकार करके न्यायिक अनुशासन का उल्लंघन किया।

मैथन एलॉयज और SAIL पर कुल 3.5 लाख रुपये का जुर्माना

सुप्रीम कोर्ट ने समीक्षा याचिका दाखिल करने और उसकी सुनवाई के लिए पांच वर्ष तक प्रतीक्षा करने को कानूनी प्रक्रिया का दुरुपयोग बताया।

बेंच ने पहले प्रतिवादी मैथन एलॉयज लिमिटेड पर 2 लाख रुपये का जुर्माना लगाया।

SAIL के संबंध में कोर्ट ने कहा कि महारत्न दर्जे का दावा करने वाले सार्वजनिक क्षेत्र के इस उपक्रम को समीक्षा आदेश का समर्थन करने की गलत सलाह दी गई थी। कोर्ट ने उस पर 1.5 लाख रुपये का जुर्माना लगाया।

दोनों को एक महीने के भीतर जुर्माने की राशि DVC को देनी होगी। निर्धारित अवधि में भुगतान नहीं करने पर 18 प्रतिशत वार्षिक ब्याज लगेगा।

सुप्रीम कोर्ट ने APTEL का समीक्षा आदेश रद्द कर 17 मई 2019 का मूल आदेश बहाल कर दिया। अपील खर्च सहित स्वीकार की गई और यह खर्च लगाए गए विशेष जुर्माने के अतिरिक्त होगा।

केस डिटेल्स

केस टाइटल: Damodar Valley Corporation vs. Maithan Alloys Limited & Ors.

केस नंबर: Civil Appeal No. 11106 of 2024

पीठ: जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन

फैसले की तारीख: 30 अक्टूबर 2026

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