AI कानूनी ड्राफ्टिंग में मदद कर सकता है, लेकिन वकील की जिम्मेदारी नहीं ले सकता: आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट

आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट ने न्यायिक कार्यवाही में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) के इस्तेमाल को लेकर वकीलों को सावधानी बरतने की सलाह दी है। एक रिट याचिका के साथ दाखिल हलफनामे में कई विसंगतियां मिलने के बाद कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि यह दस्तावेज AI की मदद से तैयार किया गया था। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि AI का इस्तेमाल करने के बावजूद अदालत में पेश किए गए तथ्यों और कानूनी संदर्भों की सत्यता सुनिश्चित करना वकील की जिम्मेदारी है।

न्यायमूर्ति सुब्बा रेड्डी सत्ती ने 27 अक्टूबर के आदेश में कहा कि AI कानूनी शोध और दस्तावेज तैयार करने में सहायक हो सकता है, लेकिन यह वकील या न्यायिक अधिकारी के पेशेवर विवेक और जिम्मेदारियों का विकल्प नहीं बन सकता।

कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि AI से तैयार सामग्री में गलत या मनगढ़ंत जानकारी होने पर तकनीक के इस्तेमाल को बचाव के तौर पर पेश नहीं किया जा सकता।

AI से तैयार हलफनामे में मिलीं विसंगतियां

मामले की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने याचिका के साथ दाखिल हलफनामे की भाषा और उसकी ड्राफ्टिंग में कई विसंगतियां पाईं।

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न्यायमूर्ति सत्ती ने दस्तावेज की जांच के बाद इसे AI से तैयार सामग्री माना और कहा कि कानूनी पेशे से जुड़े लोगों को ऐसी तकनीक का इस्तेमाल करते समय अधिक सतर्क रहना चाहिए।

हाईकोर्ट ने कहा कि वकीलों का अपने मुवक्किल के साथ-साथ अदालत के प्रति भी दायित्व होता है। इसलिए AI की सहायता से तैयार किसी भी दस्तावेज में शामिल तथ्यों और कानूनी आधारों की स्वतंत्र रूप से जांच करना आवश्यक है।

कोर्ट ने यह भी टिप्पणी की कि यदि किसी वकील ने स्वयं मेहनत करके ऐसा हलफनामा तैयार किया होता, तो पेशेवर जिम्मेदारी निभाने के लिए उसका प्रयास सराहनीय होता।

1989 के सिविल मुकदमे से जुड़ा विवाद

यह मामला बिक्री समझौते से संबंधित एक पुराने सिविल विवाद से जुड़ा था।

कोर्ट के आदेश के अनुसार, एक व्यक्ति ने याचिकाकर्ता के खिलाफ बिक्री समझौते के विशिष्ट पालन के लिए सिविल मुकदमा दायर किया था। ट्रायल कोर्ट ने 4 दिसंबर 1989 को उस व्यक्ति के पक्ष में फैसला सुनाया था।

इसके बाद संबंधित व्यक्ति के पक्ष में बिक्री विलेख निष्पादित किया गया और 27 अप्रैल 2005 को ट्रायल कोर्ट ने इसे दस्तावेज के रूप में पंजीकृत किया।

बाद में याचिकाकर्ता के जनरल पावर ऑफ अटॉर्नी धारक ने हाईकोर्ट में रिट याचिका दाखिल की।

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याचिका के साथ दिए गए हलफनामे में दावा किया गया कि सिविल मुकदमे में डिक्री के क्रियान्वयन की कार्यवाही समाप्त कर दी गई थी, क्योंकि ट्रायल कोर्ट के फैसले में वर्णित संपत्ति अस्तित्व में नहीं थी, उसकी पहचान नहीं हो सकती थी और उसका विवरण आधिकारिक रिकॉर्ड से मेल नहीं खाता था।

हाईकोर्ट ने रिट याचिका खारिज की

याचिकाकर्ता ने हाईकोर्ट से अधिकारियों को 5 जनवरी 2023 की शिकायत के आधार पर जांच करने और एफआईआर दर्ज करने का निर्देश देने की मांग की थी।

इसके अलावा, काकीनाडा स्थित ट्रायल कोर्ट से संबंधित सिविल मुकदमे का रिकॉर्ड मंगाने और अदालत के आदेश के क्रियान्वयन को रद्द करने का अनुरोध भी किया गया था।

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हालांकि, हाईकोर्ट ने पाया कि इस विवाद में राहत प्राप्त करने के लिए रिट याचिका उचित कानूनी उपाय नहीं है।

न्यायमूर्ति सत्ती ने याचिका खारिज करते हुए कहा कि याचिकाकर्ता के वकील को अपने मुवक्किल को उचित मंच पर उपलब्ध कानूनी उपाय अपनाने की सलाह देनी चाहिए थी।

इसी आदेश में हाईकोर्ट ने AI के इस्तेमाल पर जोर देते हुए स्पष्ट किया कि कानूनी दस्तावेज तैयार करने में तकनीक की सहायता लेने से वकील की पेशेवर जिम्मेदारी कम नहीं होती। अदालत के समक्ष प्रस्तुत सामग्री की शुद्धता और विश्वसनीयता सुनिश्चित करना वकील का दायित्व बना रहता है।

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