सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि पावरलूम और हैंडलूम इकाइयों से प्राप्त कपड़ों की जॉब वर्क के आधार पर ब्लीचिंग, रंगाई और प्रोसेसिंग करने को टेक्सटाइल का निर्माण (Manufacture) नहीं माना जा सकता। ऐसी गतिविधियां करने वाली इकाइयों पर वस्त्र समिति अधिनियम, 1963 (Textiles Committee Act) की धारा 5A के तहत टेक्सटाइल सेस नहीं लगाया जा सकता।
जस्टिस एस.वी.एन. भट्टी और जस्टिस एन.वी. अंजारिया की पीठ ने वस्त्र समिति के आकलन अधिकारी की अपील खारिज करते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले को बरकरार रखा। हाईकोर्ट ने प्रीमियम सूटिंग प्राइवेट लिमिटेड के खिलाफ ₹2,68,293 की सेस मांग को रद्द कर दिया था।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि किसी कानून में इस्तेमाल किए गए शब्द की परिभाषा यदि उसी कानून में नहीं दी गई है, तो दूसरे कानून में मौजूद उसकी परिभाषा को स्वतः लागू नहीं किया जा सकता। इसके लिए संबंधित कानून में स्पष्ट प्रावधान होना जरूरी है।
कपड़ों की प्रोसेसिंग करने वाली कंपनी से मांगा गया था ₹2.68 लाख सेस
प्रीमियम सूटिंग प्राइवेट लिमिटेड पावरलूम और हैंडलूम इकाइयों से प्राप्त 100 प्रतिशत मानव निर्मित फाइबर वाले कपड़ों की ब्लीचिंग, रंगाई और अन्य प्रोसेसिंग का काम करती है।
कंपनी स्वयं कपड़े का निर्माण नहीं करती थी, बल्कि अन्य इकाइयों से कपड़ा लेकर जॉब वर्क के आधार पर उसकी प्रोसेसिंग करती थी।
वर्ष 2001 में एक ऑडिट संबंधी पत्राचार में सामने आया कि उत्तर प्रदेश में अधिकांश स्वतंत्र टेक्सटाइल प्रोसेसिंग इकाइयां सेस का भुगतान नहीं कर रही थीं।
इसके बाद वस्त्र समिति ने 20 अगस्त 2001 को प्रीमियम सूटिंग को कारण बताओ नोटिस जारी कर ₹2,68,293 के भुगतान की मांग की।
कंपनी ने जवाब दिया कि वह एक स्वतंत्र प्रोसेसिंग इकाई है और ऐसे छोटे बुनकरों के लिए जॉब वर्क करती है, जिनके पास 50 से कम पावरलूम हैं। कंपनी का तर्क था कि इन बुनकरों के उत्पादों को कानून के तहत सेस से छूट प्राप्त है।
हालांकि, वस्त्र समिति ने यह दलील स्वीकार नहीं की और 21 नवंबर 2001 को कंपनी के खिलाफ आकलन आदेश पारित कर दिया।
समिति के निरीक्षण अधिकारी ने कहा कि पावरलूम और हैंडलूम से बने कपड़ों को छूट केवल करघे पर निर्माण के स्तर तक मिलती है। इसके बाद कपड़े की प्रोसेसिंग होने पर यह छूट लागू नहीं होगी।
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने रद्द की थी सेस की मांग
कंपनी ने वस्त्र समिति सेस अपीलीय न्यायाधिकरण के समक्ष आकलन आदेश को चुनौती दी थी।
न्यायाधिकरण ने Chandok Textile Exporters Pvt. Ltd. मामले में अपने पूर्व फैसले का हवाला देते हुए अपील खारिज कर दी। उस फैसले में कपड़ों की प्रोसेसिंग को मैन्युफैक्चरिंग माना गया था।
इसके बाद कंपनी ने इलाहाबाद हाईकोर्ट में रिट याचिका दाखिल की।
हाईकोर्ट ने 6 मार्च 2013 को कंपनी की याचिका स्वीकार करते हुए सेस की मांग रद्द कर दी।
इस फैसले के खिलाफ वस्त्र समिति के आकलन अधिकारी ने सुप्रीम कोर्ट में अपील की।
सुप्रीम कोर्ट में वस्त्र समिति की ओर से चिराग एम. श्रॉफ और प्रीमियम सूटिंग की ओर से तन्मय अग्रवाल पेश हुए।
दूसरे कानून से मैन्युफैक्चरिंग की परिभाषा नहीं ली जा सकती
सुप्रीम कोर्ट के समक्ष वस्त्र समिति का मुख्य तर्क था कि वस्त्र समिति अधिनियम, 1963 में ‘मैन्युफैक्चर’ शब्द को परिभाषित नहीं किया गया है। इसलिए इसका अर्थ केंद्रीय उत्पाद शुल्क अधिनियम, 1944 (Central Excise Act) की धारा 2(f) के अनुसार तय किया जाना चाहिए।
इस प्रावधान में किसी निर्मित उत्पाद को पूरा करने के लिए आवश्यक सहायक या उससे जुड़ी प्रक्रियाओं को भी मैन्युफैक्चरिंग में शामिल किया गया है।
समिति ने इसी आधार पर दलील दी कि कपड़ों की ब्लीचिंग और रंगाई भी निर्माण प्रक्रिया का हिस्सा है और इसलिए कंपनी पर सेस लगाना उचित था।
हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने इस तर्क को अस्वीकार कर दिया।
पीठ ने कहा कि जब किसी कानून में कोई शब्द परिभाषित नहीं है, तो दूसरे कानून में दी गई उसकी परिभाषा को तब तक नहीं अपनाया जा सकता, जब तक विधायिका ने संदर्भ या समावेशन के माध्यम से ऐसा करने का प्रावधान न किया हो।
कोर्ट ने इस संबंध में Union of India and Others vs. R.C. Jain and Others, Jagatram Ahuja vs. Commissioner of Gift Tax, Hyderabad (2000) 8 SCC 249 और Maheshwari Fish Seed Farm vs. T.N. Electricity Board and Another (2004) 4 SCC 705 के फैसलों का उल्लेख किया।
पीठ ने कहा:
“किसी दूसरे कानून में ‘मैन्युफैक्चर’ शब्द को दी गई परिभाषा का सहारा लेना और उसी अर्थ को अपनाना न तो सुरक्षित है और न ही कानून के तहत स्वीकार्य है।”
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि वस्त्र समिति अधिनियम की धारा 5A में इस्तेमाल किए गए ‘मैन्युफैक्चर्ड’ शब्द का अर्थ उसके सामान्य प्रचलित अर्थ के अनुसार ही समझा जाएगा।
जॉब वर्क करने वाली इकाई मूल निर्माता की सहायक इकाई है
सुप्रीम कोर्ट ने धारा 5A के प्रावधानों की जांच करते हुए पाया कि इसके परंतुक में हैंडलूम और पावरलूम उद्योग द्वारा निर्मित कपड़ों को सेस से स्पष्ट छूट दी गई है।
पीठ ने कहा कि प्रीमियम सूटिंग इन उद्योगों से कपड़ा प्राप्त करती है, उसकी प्रोसेसिंग करती है और फिर उसे संबंधित निर्माताओं को वापस कर देती है।
कोर्ट ने कहा:
“प्रतिवादी संख्या 1 के स्तर पर या उसके द्वारा कोई ‘मैन्युफैक्चरिंग’ नहीं की जाती है।”
सुप्रीम कोर्ट ने कंपनी की भूमिका को स्पष्ट करते हुए कहा:
“प्रतिवादी संख्या 1 केवल पावरलूम उद्योग के कपड़ा निर्माताओं की एक विस्तारित इकाई के रूप में काम करती है।”
पीठ ने माना कि कंपनी द्वारा की जाने वाली प्रोसेसिंग मूल पावरलूम उद्योग की निर्माण गतिविधि की पूरक और सहायक प्रक्रिया है। चूंकि पावरलूम उद्योग को स्वयं सेस से छूट प्राप्त है, इसलिए केवल इस सहायक गतिविधि के आधार पर कंपनी को अलग से निर्माता नहीं माना जा सकता।
ब्लीचिंग और रंगाई से कपड़े की गुणवत्ता बदल सकती है, लेकिन नया निर्माण नहीं होता
सुप्रीम कोर्ट ने कपड़ों की ब्लीचिंग और रंगाई के प्रभाव पर विचार करते हुए कहा कि इन प्रक्रियाओं से कपड़े में सुधार हो सकता है, लेकिन इससे धारा 5A के अर्थ में नया टेक्सटाइल उत्पाद निर्मित नहीं होता।
पीठ ने कहा:
“अधिक से अधिक यह कहा जा सकता है कि कपड़े का उन्नयन हुआ है, लेकिन यह धारा 5A के तहत लागू अर्थ में ‘मैन्युफैक्चरिंग’ नहीं बन जाता।”
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि प्रीमियम सूटिंग की इकाइयों में कोई नया टेक्सटाइल उत्पाद निर्मित नहीं हो रहा था। इसलिए कंपनी पर टेक्सटाइल सेस का भुगतान करने की जिम्मेदारी नहीं डाली जा सकती।
सुप्रीम कोर्ट ने वस्त्र समिति की अपील खारिज की
सुप्रीम कोर्ट ने माना कि इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कानून की सही व्याख्या करते हुए कंपनी के खिलाफ सेस की मांग रद्द की थी।
पीठ ने वस्त्र समिति के आकलन अधिकारी की अपील को आधारहीन पाते हुए खारिज कर दिया।
इसके साथ ही इलाहाबाद हाईकोर्ट का 6 मार्च 2013 का फैसला बरकरार रहा और प्रीमियम सूटिंग प्राइवेट लिमिटेड के खिलाफ ₹2,68,293 की टेक्सटाइल सेस मांग रद्द रही।
केस डिटेल्स
केस का नाम: The Assessing Officer, Textiles Committee vs. M/s. Premium Suiting Pvt. Ltd. & Another
केस नंबर: Civil Appeal No. 785 of 2016
पीठ: जस्टिस एस.वी.एन. भट्टी और जस्टिस एन.वी. अंजारिया
फैसले की तारीख: 26 अक्टूबर 2026
