सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (CPC) के आदेश 21 के नियम 97 से 101 के तहत दाखिल आवेदन को नियमित सिविल मुकदमे के समान माना जाएगा। ऐसे मामलों में निष्पादन अदालत (Executing Court) का अधिकार क्षेत्र सीमित नहीं है और उसे संपत्ति के मालिकाना हक से जुड़े विवाद का भी फैसला करना होगा।
जस्टिस संजय कुमार और जस्टिस संजीव सचदेवा की पीठ ने कर्नाटक हाईकोर्ट और निष्पादन अदालत के फैसलों को रद्द करते हुए बेंगलुरु की एक विवादित संपत्ति पर मूल हक्कुपत्र (Hakkupatra) रखने वाले व्यक्ति के कानूनी उत्तराधिकारियों को वैध मालिक और कब्जाधारी घोषित किया।
सुप्रीम कोर्ट ने वर्ष 1999 की उस डिक्री को भी रद्द कर दिया, जिसके आधार पर संपत्ति पर मालिकाना हक और कब्जे का दावा किया जा रहा था।
निष्पादन अदालत के अधिकार क्षेत्र को सीमित मानना गलत
सुप्रीम कोर्ट ने कर्नाटक हाईकोर्ट के उस दृष्टिकोण को गलत पाया, जिसके अनुसार निष्पादन अदालत के पास संपत्ति के मालिकाना हक से जुड़े विवाद की जांच करने का सीमित अधिकार था।
पीठ ने कहा:
“यह निष्कर्ष CPC के आदेश 21 के नियम 97 से 101 की पूरी योजना पर विचार न किए जाने को दर्शाता है।”
कोर्ट ने Shreenath and Another vs. Rajesh and Others (1998) 4 SCC 543 और N.S.S. Narayana Sarma and Others vs. Goldstone Exports (P) Ltd. and Others (2002) 1 SCC 662 के फैसलों का उल्लेख किया।
इन फैसलों के आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा:
“इन प्रावधानों के तहत दाखिल आवेदन नियमित मुकदमे के समान होता है और यही कारण है कि ऐसे आवेदन पर पारित आदेश के खिलाफ नियमित प्रथम अपील की तरह अपील की जा सकती है।”
सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट की उस टिप्पणी को भी गलत बताया, जिसमें आपत्तिकर्ता को मालिकाना हक की घोषणा के लिए अलग से सिविल कोर्ट जाने की सलाह दी गई थी।
पीठ ने स्पष्ट किया कि आदेश 21 का नियम 101 ऐसे मामलों में अलग मुकदमा दाखिल करने पर स्पष्ट रूप से रोक लगाता है। इसलिए हाईकोर्ट का यह सुझाव उक्त प्रावधान के पूरी तरह विपरीत था।
क्या था संपत्ति विवाद?
मामला बेंगलुरु के मुन्नेकोलाला न्यू एक्सटेंशन, वर्थुर होबली स्थित साइट नंबर 261 से जुड़ा था।
जी.एन. कन्नैया नायडू ने वर्ष 1987 में श्रीकांत राव के खिलाफ मुकदमा दाखिल कर इस संपत्ति पर मालिकाना हक का दावा किया था।
नायडू का कहना था कि तहसीलदार ने 5 जनवरी 1972 को जारी हक्कुपत्र के माध्यम से उन्हें यह जमीन आवंटित की थी। हालांकि, उन्होंने अदालत में मूल हक्कुपत्र पेश नहीं किया और केवल उसकी फोटोकॉपी दाखिल की।
उनका दावा था कि एक ही भूखंड के कई आवंटन होने के कारण तहसीलदार ने मूल दस्तावेज वापस ले लिया था।
प्रतिवादी ने आवंटन का गंभीरता से विरोध नहीं किया और कोई दस्तावेज भी पेश नहीं किया। इसके बाद ट्रायल कोर्ट ने 8 अक्टूबर 1999 को नायडू के पक्ष में मालिकाना हक और कब्जे की घोषणा करते हुए आंशिक रूप से मुकदमा मंजूर कर लिया।
जब इस डिक्री को लागू कराने की कार्यवाही शुरू हुई तो बालकृष्ण ने CPC के आदेश 21 के नियम 97 से 101 के तहत आपत्ति दाखिल की।
बालकृष्ण ने दावा किया कि उसी तारीख, यानी 5 जनवरी 1972 को जारी हक्कुपत्र के माध्यम से यह जमीन उन्हें आवंटित की गई थी।
उन्होंने बताया कि उन्होंने और उनके बेटे आनंद ने जमीन पर एक मकान तथा तीन दुकानें बनवाई थीं। दुकानें किरायेदारों को दी गई थीं।
बालकृष्ण ने आरोप लगाया कि उनके खिलाफ प्राप्त डिक्री धोखाधड़ी और मिलीभगत का परिणाम थी।
निष्पादन अदालत ने 27 सितंबर 2008 को उनका आवेदन खारिज कर दिया। इसके बाद कर्नाटक हाईकोर्ट ने भी 17 अगस्त 2011 को उनकी अपील खारिज कर दी।
डिक्री के निष्पादन के समय ही तीसरे व्यक्ति को विवाद की जानकारी हो सकती है
सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के उस तर्क को अस्वीकार कर दिया कि बालकृष्ण को पहले ट्रायल कोर्ट जाना चाहिए था और डिक्री के निष्पादन का विरोध नहीं करना चाहिए था।
पीठ ने कहा:
“जब किसी व्यक्ति की जानकारी के बिना उसके पीछे ऐसी डिक्री प्राप्त कर ली जाती है, तो उसे उन कार्यवाहियों के बारे में तभी पता चल सकता है, जब डिक्री के निष्पादन के लिए कदम उठाए जाते हैं।”
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि ऐसी परिस्थितियों में प्रभावित व्यक्ति को निष्पादन की कार्यवाही के दौरान अपनी आपत्ति उठाने का अधिकार है।
मूल हक्कुपत्र बना मालिकाना हक का निर्णायक प्रमाण
सुप्रीम कोर्ट ने दस्तावेजों की जांच करते हुए पाया कि बालकृष्ण के बेटे आनंद ने उनके नाम जारी मूल हक्कुपत्र अदालत में पेश किया था। दूसरी ओर, डिक्री प्राप्त करने वाले नायडू के पास केवल फोटोकॉपी थी।
पीठ ने कहा कि यदि तहसीलदार ने नायडू का मूल हक्कुपत्र वापस ले लिया था, लेकिन बालकृष्ण का मूल दस्तावेज उनके पास रहने दिया था, तो इससे एकमात्र निष्कर्ष यही निकलता है कि बालकृष्ण का आवंटन वास्तविक था और उसे रद्द नहीं किया गया था।
कोर्ट ने यह भी पाया कि नायडू ने अपनी जिरह के दौरान स्वीकार किया था कि बालकृष्ण ने विवादित जमीन पर आरसीसी का मकान और तीन दुकानें बनवाई थीं।
इस स्वीकारोक्ति को महत्वपूर्ण मानते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा:
“उनकी यह स्वीकारोक्ति उनके उस दावे के लिए घातक थी कि प्रतिवादी श्रीकांत राव ने जमीन पर अतिक्रमण करके वहां झोपड़ी बनाई थी।”
टैक्स की रसीदों से मालिकाना हक साबित नहीं होता
सुप्रीम कोर्ट ने निचली अदालतों द्वारा संपत्ति कर की रसीदों पर भरोसा किए जाने को भी गलत पाया।
पीठ ने स्पष्ट किया:
“कर का भुगतान अधिक से अधिक कब्जे के संबंध में निष्कर्ष निकालने का आधार हो सकता है, लेकिन इससे मालिकाना हक साबित नहीं होता।”
कोर्ट ने कहा कि बालकृष्ण के मालिकाना हक का प्रश्न 5 जनवरी 1972 को जारी मूल हक्कुपत्र के आधार पर उनके पक्ष में तय हो चुका था।
सुप्रीम कोर्ट ने बेंगलुरु पूर्वी तालुक के तहसीलदार द्वारा 9 फरवरी 2023 को दाखिल हलफनामे का भी उल्लेख किया।
तहसीलदार ने बताया था कि वर्ष 1972 के भूमि आवंटन से संबंधित रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं हैं। हालांकि, उन्होंने बालकृष्ण के नाम जारी मूल हक्कुपत्र की प्रामाणिकता पर कोई संदेह व्यक्त नहीं किया था।
सुप्रीम कोर्ट ने बालकृष्ण के उत्तराधिकारियों को घोषित किया वैध मालिक
सुप्रीम कोर्ट ने अपील स्वीकार करते हुए कर्नाटक हाईकोर्ट का 17 अगस्त 2011 का फैसला और निष्पादन अदालत का 27 सितंबर 2008 का आदेश रद्द कर दिया।
इसके साथ ही कोर्ट ने 8 अक्टूबर 1999 को O.S. No. 2198 of 1987 में पारित डिक्री भी निरस्त कर दी।
पीठ ने बालकृष्ण के कानूनी उत्तराधिकारियों को साइट नंबर 261, मुन्नेकोलाला न्यू एक्सटेंशन, वर्थुर होबली, जो अब बेंगलुरु पूर्वी तालुक में स्थित है, का वैध मालिक और कब्जाधारी घोषित किया।
सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया कि सभी पक्ष अपने मुकदमे का खर्च स्वयं वहन करेंगे।
केस डिटेल्स
केस का नाम: Balakrishna (Dead) Thr. LRs. vs. G.N. Kanniah Naidu (Dead) Thr. LRs. and Another
केस नंबर: Civil Appeal arising out of SLP (C) No. 29808 of 2011
पीठ: जस्टिस संजय कुमार और जस्टिस संजीव सचदेवा
फैसले की तारीख: 26 अक्टूबर 2026
