बॉम्बे हाईकोर्ट ने एक दंपति के बीच लंबे समय से चल रहे वैवाहिक विवाद का निपटारा करते हुए गोवा में दर्ज उनके विवाह पंजीकरण को रद्द करने का निर्देश दिया है। करीब एक साल तक चली मध्यस्थता के बाद दोनों पक्षों में समझौता हुआ, जिसके तहत पति अपनी पूर्व पत्नी को भरण-पोषण और गुजारा भत्ते के सभी दावों के अंतिम निपटारे के लिए 35 लाख रुपये देगा। दोनों पक्षों ने जनवरी 2019 में अमेरिकी कोर्ट से मिले तलाक को भी मान्य और बाध्यकारी स्वीकार किया है।
न्यायमूर्ति भारती डांगरे और न्यायमूर्ति आशीष एस. चव्हाण की खंडपीठ ने 16 अक्टूबर के आदेश में समझौते की शर्तों को रिकॉर्ड पर लिया। इनमें भरण-पोषण, बच्चों की कस्टडी, संपत्ति संबंधी विवाद और भारत तथा अमेरिका में शुरू की गई कानूनी कार्यवाहियों के निपटारे से जुड़े प्रावधान शामिल हैं।
हाईकोर्ट ने निर्देश दिया कि पति द्वारा समझौते के आधार पर जारी हाईकोर्ट की डिक्री प्रस्तुत किए जाने पर गोवा का संबंधित विवाह पंजीकरण कार्यालय रिकॉर्ड में आवश्यक प्रविष्टि करके विवाह का पंजीकरण रद्द करे।
पत्नी को मिलेंगे 35 लाख रुपये, बच्चों की कस्टडी भी तय
समझौते के अनुसार, पति अपनी पूर्व पत्नी को 35 लाख रुपये देगा। इस राशि में पिछले, वर्तमान और भविष्य के भरण-पोषण तथा गुजारा भत्ते से जुड़े सभी दावे शामिल होंगे। पत्नी ने भी सहमति दी है कि निर्धारित राशि मिलने के बाद वह पति से किसी अतिरिक्त रकम की मांग नहीं करेगी।
दोनों बच्चों की स्थायी और एकल कस्टडी मां को दी गई है। हालांकि, पिता को बच्चों से मिलने और उनसे संपर्क रखने का अधिकार रहेगा। समझौते में बच्चों के भरण-पोषण की व्यवस्था भी तय की गई है।
हाईकोर्ट ने रिकॉर्ड किया कि पति ने दोनों बच्चों के अमेरिकी पासपोर्ट और भारत के ओवरसीज सिटीजन ऑफ इंडिया (OCI) कार्ड सौंप दिए हैं।
इसके अलावा, पति-पत्नी के बीच संपत्ति से जुड़े विवादों का भी समझौते के माध्यम से निपटारा किया गया है।
दोनों पक्षों ने यह भी सहमति दी कि उन्होंने पहले भारत या अमेरिका में किसी अदालत, पुलिस स्टेशन, सरकारी प्राधिकरण अथवा अन्य मंच पर जो शिकायतें, मुकदमे, रिपोर्ट या अन्य कार्यवाहियां शुरू की थीं, वे हाईकोर्ट के आदेश के बाद निरस्त मानी जाएंगी और उनका कोई प्रभाव नहीं रहेगा।
2017 से अलग रह रहे थे पति-पत्नी
मामले के अनुसार, दोनों की शादी वर्ष 2011 में हुई थी और विवाह का पंजीकरण गोवा में कराया गया था। शादी के बाद दंपति कुछ समय तक अमेरिका में रहा। उनके दो बच्चे हैं।
वर्ष 2017 में भारत आने के बाद दोनों के संबंध बिगड़ने लगे। कार्यवाही के दौरान सामने आया कि पत्नी ने कथित तौर पर पति के साथ जाने से इनकार कर दिया था। इसके बाद उनके बीच मतभेद बढ़ते गए और वे अलग रहने लगे।
पत्नी ने पुणे की फैमिली कोर्ट में तलाक की कार्यवाही शुरू की। दूसरी ओर, पति ने अमेरिका की लॉस एंजिल्स सुपीरियर कोर्ट में विवाह समाप्त करने के लिए याचिका दाखिल की।
पत्नी ने वर्ष 2017 में अमेरिकी अदालत की कार्यवाही रोकने के लिए एंटी-सूट इंजंक्शन की मांग भी की थी। इसके बाद दोनों पक्षों की ओर से कई आवेदन, हलफनामे और जवाबी हलफनामे दाखिल किए गए।
जनवरी 2019 में अमेरिकी कोर्ट ने दोनों के विवाह को समाप्त करते हुए तलाक की डिक्री जारी कर दी।
इसके बाद मामला बॉम्बे हाईकोर्ट पहुंचा, जहां कोर्ट ने विवाद का समाधान निकालने के लिए दोनों पक्षों को मध्यस्थता में भेजा।
करीब एक साल की मध्यस्थता के बाद हुआ समझौता
हाईकोर्ट के निर्देश पर शुरू हुई मध्यस्थता लगभग एक साल तक चली। इस दौरान दोनों पक्षों के बीच वैवाहिक विवाद, आर्थिक दावों, बच्चों की देखभाल और अन्य लंबित मामलों को लेकर विस्तृत बातचीत हुई।
आखिरकार दोनों पक्ष सभी विवादों के निपटारे पर सहमत हो गए।
समझौते की शर्तें पति ने व्यक्तिगत रूप से और पत्नी की ओर से अधिवक्ता सरवटे ने हाईकोर्ट के समक्ष प्रस्तुत कीं।
खंडपीठ ने पाया कि दोनों पक्ष जनवरी 2019 में अमेरिकी कोर्ट द्वारा जारी तलाक की डिक्री को अपने लिए बाध्यकारी मानने पर सहमत हैं।
इसी आधार पर हाईकोर्ट ने गोवा के संबंधित पंजीकरण कार्यालय को निर्देश दिया कि समझौते के आधार पर जारी डिक्री प्रस्तुत किए जाने के बाद विवाह पंजीकरण रद्द करने के लिए आवश्यक कार्रवाई की जाए।
मध्यस्थ के प्रयासों की हाईकोर्ट ने की सराहना
हाईकोर्ट ने लंबे समय से चले आ रहे विवाद को सुलझाने में मध्यस्थ अधिवक्ता उमा पंडित की भूमिका की सराहना की।
खंडपीठ ने कहा कि व्यापक विचार-विमर्श और मध्यस्थता के प्रयासों के बाद दोनों पक्ष सभी विवादों को समाप्त करने पर सहमत हुए।
कोर्ट ने विधिक सेवा प्राधिकरण और मुख्य मध्यस्थता केंद्र को आदेश की प्रति भेजने का निर्देश दिया, ताकि अधिवक्ता उमा पंडित को उनके प्रयासों के लिए प्रशंसा पत्र जारी किया जा सके।
इस तरह 16 अक्टूबर के आदेश के साथ दोनों पक्षों के बीच भरण-पोषण, बच्चों की कस्टडी, संपत्ति और लंबित कानूनी कार्यवाहियों से जुड़े विवादों का समझौते के आधार पर निपटारा हो गया।
