इलाहाबाद हाईकोर्ट ने वर्ष 1983 के एक रेप मामले में दोषी ठहराए गए तीन लोगों को बरी कर दिया है। कोर्ट ने पाया कि अभियोजन पक्ष के सबूतों में गंभीर विरोधाभास थे। दोनों पीड़ित महिलाओं के बयानों में महत्वपूर्ण अंतर था और घटना के छह दिन बाद FIR दर्ज कराने में हुई देरी का भी संतोषजनक स्पष्टीकरण नहीं दिया गया था।
जस्टिस अब्दुल शाहिद ने 12 अक्टूबर 2026 को पारित आदेश में ट्रायल कोर्ट के वर्ष 1985 के फैसले को रद्द करते हुए तीनों दोषियों की अपील स्वीकार कर ली। इस मामले में कुल चार लोगों को दोषी ठहराया गया था, लेकिन अपील लंबित रहने के दौरान एक व्यक्ति की मृत्यु हो गई थी। इसके चलते उसके खिलाफ अपील की कार्यवाही समाप्त कर दी गई थी।
हाईकोर्ट ने कहा कि ट्रायल कोर्ट ने अभियोजन पक्ष के सबूतों में मौजूद महत्वपूर्ण कमियों का सही तरीके से मूल्यांकन नहीं किया था।
FIR दर्ज कराने में छह दिन की देरी पर सवाल
हाईकोर्ट ने मामले में FIR दर्ज कराने में हुई देरी को महत्वपूर्ण माना। कथित घटना 17 अक्टूबर 1983 की थी, जबकि FIR 23 अक्टूबर 1983 को दर्ज कराई गई थी।
दोनों महिलाओं ने देरी का कारण आरोपियों का डर बताया था। उनका कहना था कि आरोपियों ने उन्हें पुलिस के पास जाने से भी रोका था।
हालांकि, हाईकोर्ट ने पाया कि अभियोजन पक्ष यह स्पष्ट नहीं कर सका कि पुलिस तक पहुंचने के अवसर उपलब्ध होने के बावजूद घटना की शिकायत पहले क्यों नहीं की गई।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यौन अपराधों के मामलों में FIR दर्ज कराने में देरी अपने आप में अभियोजन के मामले को खारिज करने का आधार नहीं हो सकती। लेकिन जब देरी का उचित कारण नहीं बताया जाता या दिया गया स्पष्टीकरण संतोषजनक नहीं होता, तो सबूतों की विश्वसनीयता का आकलन करते समय यह एक महत्वपूर्ण परिस्थिति बन जाती है।
हाईकोर्ट ने इस मामले में FIR दर्ज कराने में हुई देरी को जानबूझकर की गई देरी माना।
दोनों महिलाओं के बयानों में महत्वपूर्ण विरोधाभास
हाईकोर्ट ने दोनों महिलाओं की गवाही की जांच करते हुए पाया कि आरोपियों की भूमिका को लेकर उनके बयानों में महत्वपूर्ण अंतर था।
कोर्ट ने कहा कि किसी दर्दनाक घटना के बारे में बयान देते समय गवाहों से घटनाक्रम या छोटी-छोटी बातों में अंतर होना स्वाभाविक है। ऐसे मामूली अंतर के आधार पर किसी गवाह की विश्वसनीयता पर सवाल नहीं उठाया जा सकता।
हालांकि, मौजूदा मामले में विरोधाभास केवल मामूली बातों तक सीमित नहीं थे। वे अभियोजन पक्ष की कहानी के महत्वपूर्ण पहलुओं से जुड़े थे और दोनों प्रमुख गवाहों के बयानों की एकरूपता को प्रभावित करते थे।
कोर्ट ने यह भी पाया कि दोनों महिलाओं के बयानों में बाद में महत्वपूर्ण नई बातें जोड़ी गई थीं। इन कमियों के कारण अभियोजन पक्ष के सबूत दोषसिद्धि को बरकरार रखने के लिए पर्याप्त विश्वसनीय नहीं थे।
मेडिकल रिपोर्ट और पुरानी दुश्मनी पर भी किया विचार
हाईकोर्ट ने दोनों महिलाओं की मेडिकल रिपोर्ट पर भी गौर किया। कथित घटना के छह दिन बाद हुई मेडिकल जांच में किसी भी महिला के शरीर पर बाहरी या हाल की चोट के निशान नहीं मिले थे।
कोर्ट ने इस तथ्य पर भी ध्यान दिया कि आरोपियों और महिलाओं के परिवार के बीच पहले से दुश्मनी थी।
हाईकोर्ट ने कहा कि पुरानी दुश्मनी दोधारी तलवार की तरह होती है। कोर्ट ने इस परिस्थिति को दोनों महिलाओं की गवाही की विश्वसनीयता का आकलन करते समय ध्यान में रखा।
सभी परिस्थितियों पर विचार करने के बाद कोर्ट ने पाया कि दोनों प्रमुख गवाहों के बयान पर्याप्त रूप से विश्वसनीय नहीं थे।
क्या था पूरा मामला?
अभियोजन पक्ष के अनुसार, 17 अक्टूबर 1983 की रात करीब 11 बजे चार लोग एक घर में घुसे थे। उस समय एक महिला और उसकी भाभी घर के अंदर सो रही थीं।
आरोप था कि चारों लोगों ने परिवार के सदस्यों को हथियार दिखाकर धमकाया और दोनों महिलाओं के साथ रेप किया।
घटना के छह दिन बाद, 23 अक्टूबर 1983 को FIR दर्ज कराई गई। मामले की सुनवाई के बाद ट्रायल कोर्ट ने वर्ष 1985 में आरोपियों को रेप का दोषी ठहराया था।
दोषियों ने इस फैसले को इलाहाबाद हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। उनकी अपील कई दशकों तक लंबित रही।
हाईकोर्ट ने दोषसिद्धि रद्द कर तीनों को किया बरी
हाईकोर्ट ने FIR दर्ज कराने में देरी, गवाहों के बयानों में विरोधाभास, मेडिकल रिपोर्ट और दोनों पक्षों के बीच पुरानी दुश्मनी सहित सभी परिस्थितियों का मूल्यांकन किया।
कोर्ट इस निष्कर्ष पर पहुंचा कि अभियोजन पक्ष के सबूत इतने विश्वसनीय नहीं थे कि उनके आधार पर दोषसिद्धि बरकरार रखी जा सके।
जस्टिस अब्दुल शाहिद ने कहा कि ट्रायल कोर्ट ने इन महत्वपूर्ण कमियों पर उचित ध्यान नहीं दिया था।
इसके बाद हाईकोर्ट ने अपील स्वीकार करते हुए ट्रायल कोर्ट का दोषसिद्धि संबंधी फैसला रद्द कर दिया और तीनों जीवित अपीलकर्ताओं को आरोपों से बरी कर दिया।
