दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा है कि संयुक्त स्वामित्व वाले पारिवारिक मकान में रहने वाली महिला को, यदि उसका पति उस संपत्ति का सह-मालिक है, तो अवैध कब्जेदार नहीं माना जा सकता। ऐसे में उसके पति का भाई उसे मकान से बेदखल नहीं कर सकता, खासकर जब वह संपत्ति पर अपना एकमात्र मालिकाना हक साबित करने में विफल रहा हो।
जस्टिस नीना बंसल कृष्णा ने शेख फिरोजुद्दीन की नियमित द्वितीय अपील खारिज करते हुए यह फैसला सुनाया। इससे पहले दो निचली अदालतें भी नई दिल्ली के ईस्ट ऑफ कैलाश स्थित मकान के एक कमरे पर कब्जा वापस पाने की उनकी मांग खारिज कर चुकी थीं। इस कमरे में उनके भाई की पत्नी फरीदा रह रही थीं।
क्या था संपत्ति विवाद?
मुकदमे के अनुसार, दिल्ली विकास प्राधिकरण (DDA) ने ईस्ट ऑफ कैलाश स्थित जी-45-बी भूखंड अपीलकर्ता और उनकी मां सईदान निसा उर्फ सैदुल निसा को आवंटित किया था। संपत्ति का कब्जा 9 अक्टूबर 1989 को सौंपा गया था।
अपीलकर्ता का दावा था कि उनकी मां का 15 जुलाई 2008 को निधन हो गया था। उन्होंने 5 मार्च 2008 को उनके पक्ष में वसीयत की थी, जिसके आधार पर वह संपत्ति के एकमात्र मालिक बन गए थे।
अपीलकर्ता के भाई आफताब अहमद की शादी प्रतिवादी फरीदा से हुई थी। अपीलकर्ता का दावा था कि आफताब अहमद ने 17 अक्टूबर 2008 को शरीयत कानून के अनुसार फरीदा को तलाक दे दिया था। इसके बावजूद जून 2010 में फरीदा ने मकान की पहली मंजिल के एक कमरे पर जबरन कब्जा कर लिया।
इसी आधार पर अपीलकर्ता ने कमरे का कब्जा वापस दिलाने, साझा सुविधाओं के इस्तेमाल पर रोक लगाने, प्रति माह 10,000 रुपये हर्जाना दिलाने और स्थायी निषेधाज्ञा जारी करने की मांग की।
दूसरी ओर, फरीदा ने अपीलकर्ता के मालिकाना हक को चुनौती दी। उन्होंने कहा कि 23 अप्रैल 1996 के एक समझौते के आधार पर उनके पति आफताब अहमद संपत्ति के मालिक थे। उन्होंने कथित वसीयत को भी झूठा और फर्जी बताया।
फरीदा ने अपने द्वारा शुरू की गई कानूनी कार्यवाहियों का भी उल्लेख किया। इनमें IPC की धारा 498A/406/34 के तहत FIR, सीआरपीसी की धारा 125 के तहत याचिका और घरेलू हिंसा अधिनियम की धारा 12 के तहत शिकायत शामिल थीं।
सिविल जज ने 16 जनवरी 2013 को अपीलकर्ता का मुकदमा खारिज कर दिया था। इसके बाद अतिरिक्त जिला जज ने भी 27 फरवरी 2015 को RCA संख्या 65/2013 में इस फैसले को बरकरार रखा।
हाईकोर्ट में क्या दलीलें दी गईं?
अपीलकर्ता की ओर से एडवोकेट शोभना टकियार ने दलील दी कि फरीदा उनके भाई की तलाकशुदा पत्नी हैं और उनके साथ उनका कोई घरेलू संबंध नहीं है। इसलिए विवादित संपत्ति को फरीदा का वैवाहिक घर नहीं माना जा सकता। उन्होंने यह भी कहा कि आफताब अहमद का संपत्ति में कोई अधिकार, स्वामित्व या हित नहीं है।
अपीलकर्ता ने तर्क दिया कि ट्रायल कोर्ट वसीयत के प्रोबेट से जुड़े मुद्दे का निर्णय करने में सक्षम नहीं था। यदि वसीयत साबित नहीं भी होती है, तब भी अपीलकर्ता अपने स्वतंत्र अधिकार के आधार पर संपत्ति के 50 प्रतिशत हिस्से का स्वीकृत मालिक है।
उन्होंने यह भी कहा कि आफताब अहमद द्वारा 15 सितंबर 2008 को उनके पक्ष में किए गए अधिकार त्याग की घोषणा (Declaration of Surrender) को गलत तरीके से अस्वीकार किया गया।
प्रतिवादी की ओर से एडवोकेट जावेद अहमद और एडवोकेट आकृति आदित्य पेश हुए।
वसीयत और संपत्ति में हिस्सेदारी पर हाईकोर्ट का फैसला
हाईकोर्ट ने कहा कि दोनों निचली अदालतें यह निष्कर्ष निकाल चुकी थीं कि वसीयत कानून के अनुसार साबित नहीं हुई है। यह तथ्यात्मक निष्कर्ष है, जिसकी नियमित द्वितीय अपील में दोबारा समीक्षा नहीं की जा सकती।
कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि पक्षकार मुस्लिम हैं। मुस्लिम कानून के अनुसार, अन्य कानूनी उत्तराधिकारियों की सहमति के बिना मां अपनी हिस्सेदारी के केवल एक-तिहाई भाग तक ही वैध वसीयत कर सकती थीं।
अधिकार त्याग की घोषणा के संबंध में कोर्ट ने कहा कि मुस्लिम कानून के तहत वसीयत के लिए उत्तराधिकारियों की सहमति वसीयतकर्ता की मृत्यु के बाद दी जानी चाहिए। केवल एक उत्तराधिकारी की घोषणा को सभी उत्तराधिकारियों की सहमति नहीं माना जा सकता।
कोर्ट ने पाया कि संबंधित दस्तावेज पर उचित स्टांप शुल्क नहीं चुकाया गया था और उसका रजिस्ट्रेशन भी नहीं हुआ था। इसलिए वह रजिस्ट्रेशन अधिनियम, 1908 की धारा 17 और धारा 49 के प्रावधानों के अंतर्गत आता था।
तलाक साबित नहीं हुआ, पत्नी को निवास का अधिकार
हाईकोर्ट ने पाया कि आफताब अहमद और फरीदा के बीच तलाक साबित नहीं हुआ था। कोई तलाकनामा पेश नहीं किया गया था और तलाक की घोषणा के लिए आफताब अहमद द्वारा दाखिल मुकदमा भी लंबित था।
कोर्ट ने कहा,
“यह स्थापित कानून है कि आफताब अहमद की पत्नी होने के नाते उन्हें विवादित संपत्ति में रहने का अधिकार है, लेकिन उनका दावा मुख्य रूप से उनके पति आफताब अहमद के खिलाफ है।”
महिला को फिलहाल संपत्ति से बेदखल नहीं किए जाने का कारण बताते हुए कोर्ट ने कहा,
“जब तक अन्य कानूनी कार्यवाहियों में उनके अधिकार का अंतिम निर्धारण नहीं हो जाता, तब तक उन्हें विवादित संपत्ति से बेदखल नहीं किया जा सकता। इस संपत्ति में उनके पति का अपनी मां की हिस्सेदारी में कुछ हिस्सा दिखाई देता है, जो विवादित संपत्ति की आधी मालिक थीं।”
जस्टिस कृष्णा ने आगे कहा,
“प्रतिवादी, जो वादी के भाई आफताब अहमद की पत्नी थीं, को विवादित संपत्ति में अवैध कब्जेदार नहीं माना जा सकता, विशेष रूप से तब, जब यह साबित नहीं हुआ है कि आफताब अहमद ने विवादित संपत्ति में अपना हिस्सा वादी यानी अपने भाई के पक्ष में छोड़ दिया था।”
पत्नी के भरण-पोषण के अधिकार को खत्म करने के लिए संपत्ति हस्तांतरित नहीं की जा सकती
हाईकोर्ट ने संपत्ति अंतरण अधिनियम (Transfer of Property Act) की धारा 39 का हवाला देते हुए कहा कि आफताब अहमद अपनी पत्नी के भरण-पोषण के अधिकार को समाप्त करने के उद्देश्य से लंबित वैवाहिक मुकदमे के दौरान संपत्ति में अपना हिस्सा अपने भाई को हस्तांतरित नहीं कर सकते थे।
अपीलकर्ता ने यह भी मांग की थी कि फरीदा को मकान के अन्य हिस्सों पर कब्जा करने से रोका जाए।
इस पर कोर्ट ने कहा कि अपीलकर्ता ने ऐसा कोई साक्ष्य पेश नहीं किया जिससे यह साबित हो कि फरीदा मकान के अन्य हिस्सों में प्रवेश करने की धमकी दे रही थीं।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि सह-मालिक की पत्नी के खिलाफ इस तरह की निषेधाज्ञा जारी नहीं की जा सकती।
कोर्ट ने कहा,
“पक्षकारों के पास एकमात्र विकल्प यह है कि वे संपत्ति का बंटवारा कराकर अपने-अपने हिस्सों का सीमांकन कराएं या आपसी समझौते पर पहुंचें।”
द्वितीय अपील खारिज
दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा कि विवादित संपत्ति सह-मालिकों के बीच अब भी संयुक्त और अविभाजित है। निचली अदालतों ने उपलब्ध साक्ष्यों का सही मूल्यांकन किया था।
इन निष्कर्षों के आधार पर जस्टिस नीना बंसल कृष्णा ने नियमित द्वितीय अपील खारिज कर दी और निचली अदालतों के फैसलों को बरकरार रखा।
केस डिटेल्स
केस टाइटल: शेख फिरोजुद्दीन बनाम फरीदा
केस नंबर: RSA 316/2015
बेंच: जस्टिस नीना बंसल कृष्णा
फैसले की तारीख: 13 अक्टूबर 2026
