इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने कहा है कि कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालयों (KGBV) के शिक्षकों को वर्षों तक मामूली मानदेय पर संविदा के आधार पर नियुक्त रखना और उनके नियमितीकरण की दिशा में कोई कदम नहीं उठाना संविधान के अनुच्छेद 23 के तहत प्रतिबंधित जबरन श्रम के समान है।
जस्टिस पंकज भाटिया की एकल पीठ ने उत्तर प्रदेश सरकार को चार महीने के भीतर KGBV शिक्षकों के पद सृजित करने का निर्देश दिया है। तब तक सभी KGBV शिक्षकों को फैसले की तारीख से 17,000 रुपये प्रतिमाह देने का आदेश दिया गया है।
कोर्ट ने शिक्षकों को मिलने वाली रकम को ‘मानदेय’ कहे जाने पर भी टिप्पणी करते हुए इसे “क्रूर मजाक” बताया।
15 साल से अधिक समय से संविदा पर काम कर रहे शिक्षक
मामला कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालयों में पूर्णकालिक और अंशकालिक संविदा शिक्षकों की नियुक्ति और वेतन से जुड़ा है।
ये आवासीय विद्यालय लड़कियों की शिक्षा के लिए सर्व शिक्षा अभियान के तहत स्थापित किए गए थे। अब यह योजना समग्र शिक्षा अभियान का हिस्सा है।
तीन संबंधित याचिकाओं में से एक में 377 शिक्षक शामिल थे। कुछ याचिकाकर्ता 15 साल से अधिक समय से सेवाएं दे रहे हैं।
उन्होंने नियमितीकरण और राज्य के नियमित शिक्षकों के समान वेतन की मांग की थी।
रिकॉर्ड के अनुसार, KGBV के अंशकालिक शिक्षकों को 12,790 रुपये मासिक मानदेय मिलता है। कर्मचारी भविष्य निधि (EPF) की कटौती के बाद उनके हाथ में केवल 9,592 रुपये आते हैं।
उनका अनुबंध 11 महीने और 29 दिन का होता है, जिसके बाद एक दिन का अंतर रखा जाता है। एक महीने का नोटिस देकर अनुबंध समाप्त किया जा सकता है, जबकि विशेष परिस्थितियों में बिना नोटिस भी सेवा समाप्त करने का प्रावधान है।
समान काम के बावजूद वेतन में अंतर पर सवाल
याचिकाकर्ताओं की ओर से अधिवक्ता राज कुमार सिंह सूर्यवंशी और सक्षम अग्रवाल ने दलील दी कि KGBV शिक्षक नियमित सरकारी शिक्षकों के समान कार्य करते हैं, लेकिन उन्हें पर्याप्त वेतन और नौकरी की सुरक्षा नहीं मिलती।
उन्होंने कहा कि कई शिक्षक दूसरी नौकरियों के लिए निर्धारित अधिकतम आयु सीमा पार कर चुके हैं।
याचिकाकर्ताओं ने यह भी तर्क दिया कि नौकरी की असुरक्षा से संविधान के अनुच्छेद 21-A के तहत शिक्षा की गुणवत्ता प्रभावित होती है।
उन्होंने 9 अप्रैल 2026 के सरकारी आदेश का उल्लेख किया, जिसके तहत राज्य के विद्यालयों में अंशकालिक शिक्षकों का मानदेय 9,000 रुपये से बढ़ाकर 17,000 रुपये किया गया था।
साथ ही सुप्रीम कोर्ट के U.P. Junior High School Council Instructor Welfare Association vs. State of U.P. फैसले पर भरोसा किया गया।
समग्र शिक्षा अभियान की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता अनुज कुदेसिया और अधिवक्ता सर्वेश दुबे ने कहा कि योजना का वित्तपोषण केंद्र और राज्य सरकार मिलकर करती हैं। इसके लिए स्वीकृत पद नहीं हैं और शिक्षकों की नियुक्ति योजना की अवधि तक सीमित है।
राज्य सरकार की ओर से अपर मुख्य स्थायी अधिवक्ता पी.के. सिंह और सहर्ष श्रीवास्तव उपस्थित हुए। केंद्र सरकार की ओर से कोई अधिवक्ता पेश नहीं हुआ।
दो दशक से चल रही योजना में पद न होने का तर्क अस्वीकार
हाईकोर्ट ने पाया कि रिकॉर्ड में ऐसा कोई तथ्य नहीं था जिससे यह साबित हो कि KGBV शिक्षकों का काम नियमित सरकारी शिक्षकों से अलग है।
बेंच ने स्वीकृत पद नहीं होने की दलील भी अस्वीकार कर दी।
कोर्ट ने कहा कि योजना दो दशक से अधिक समय से चल रही है और शिक्षकों का काम स्थायी प्रकृति का है। शिक्षा का अधिकार अधिनियम (RTE Act) की धारा 8(d) के तहत राज्य की जिम्मेदारी शिक्षकों की व्यवस्था करना है।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले के आधार पर हाईकोर्ट ने माना कि ऐसी परिस्थितियों में पद सृजित माने जाएंगे।
केंद्र से धन नहीं मिलने की दलील पर कोर्ट ने ‘पहले भुगतान करो, फिर वसूली करो’ के सिद्धांत का उल्लेख किया।
KGBV छात्राओं के साथ भी भेदभाव: हाईकोर्ट
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि KGBV शिक्षा का अधिकार अधिनियम की धारा 2(n) के तहत विद्यालय की श्रेणी में आते हैं।
कोर्ट ने सरकारी और सहायता प्राप्त विद्यालयों के शिक्षकों के वेतन की तुलना KGBV शिक्षकों के कम मानदेय से की।
बेंच ने कहा:
“यह KGBV में पढ़ने वाली वंचित वर्ग की छात्राओं के साथ स्पष्ट भेदभाव है।”
हाईकोर्ट ने Minerva Mills के फैसले और साधनों की शुद्धता के सिद्धांत का उल्लेख करते हुए कहा कि योजना का उद्देश्य सराहनीय हो सकता है, लेकिन उसे लागू करने का तरीका संविधान के अनुच्छेद 14 और 23 का उल्लंघन नहीं कर सकता।
कोर्ट ने शिक्षकों की लगातार संविदा नियुक्ति को “अनुच्छेद 23 के तहत प्रतिबंधित जबरन श्रम के एक रूप के अलावा कुछ नहीं” बताया।
बेंच ने कहा कि इन शिक्षकों को मिलने वाला भुगतान अर्धकुशल श्रमिकों के लिए निर्धारित वेतन से भी कम है और इसे मानदेय कहना “क्रूर मजाक है।”
चार महीने में पद सृजित करने और नियमितीकरण पर विचार का आदेश
हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार को चार महीने के भीतर KGBV शिक्षकों के लिए शिक्षा का अधिकार अधिनियम की अनुसूची के अनुसार पद स्वीकृत या सृजित करने का निर्देश दिया।
राज्य सरकार को इंटरमीडिएट स्तर तक नियमित रूप से नियुक्त शिक्षकों के समान KGBV शिक्षकों की सेवा शर्तें निर्धारित करनी होंगी।
कोर्ट ने याचिकाकर्ताओं और समान स्थिति वाले अन्य शिक्षकों की योग्यता तथा सेवाकाल के आधार पर नियमितीकरण के दावों पर विचार करने का भी आदेश दिया।
इसके अतिरिक्त शिक्षकों के वेतन में समय-समय पर संशोधन कर उसे सरकारी और सहायता प्राप्त विद्यालयों के शिक्षकों के वेतन के बराबर लाने का निर्देश दिया गया।
तब तक सभी शिक्षकों को 17,000 रुपये प्रतिमाह
हाईकोर्ट ने आदेश दिया कि उपरोक्त प्रक्रिया पूरी होने तक सभी KGBV शिक्षकों को फैसले की तारीख से 17,000 रुपये मासिक भुगतान किया जाए।
उन्हें शिक्षा का अधिकार अधिनियम की धारा 24(2) के तहत संरक्षण भी मिलेगा।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि केंद्र सरकार सहमति के अनुसार खर्च में अपना हिस्सा देगी, लेकिन केंद्र से धन प्राप्त नहीं होने के आधार पर राज्य सरकार आदेश का पालन टाल नहीं सकती।
राज्य सरकार पहले भुगतान करके केंद्र के हिस्से की रकम बाद में प्राप्त कर सकती है।
केस डिटेल्स
केस टाइटल: Smt. Archana Boodh vs. State of U.P. Thru. Addl. Chief Secy./Prin. Secy. Basic Edu. Lko. and 3 others (संबंधित याचिकाओं सहित)
केस नंबर: Writ-A No. 7335 of 2026, साथ में Writ-A Nos. 8381 और 9015 of 2026
पीठ: जस्टिस पंकज भाटिया
फैसले की तारीख: 29 अक्टूबर 2026
