डर के कारण दुष्कर्म पीड़िता के हाथ-पैर न हिलना सहमति नहीं माना जा सकता: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 1987 की सजा बरकरार रखी

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा है कि दुष्कर्म के दौरान डर के कारण पीड़िता के हाथ-पैर न हिल पाने को उसकी सहमति नहीं माना जा सकता। कोर्ट ने इस आधार सहित अन्य साक्ष्यों पर विचार करते हुए वर्ष 1987 में दुष्कर्म के मामले में सुनाई गई सात साल की कठोर कैद की सजा बरकरार रखी है।

जस्टिस अब्दुल शाहिद की एकल पीठ ने मंगल सिंह की लगभग 39 साल पुरानी आपराधिक अपील खारिज करते हुए उसे शेष सजा काटने के लिए तत्काल ट्रायल कोर्ट के सामने आत्मसमर्पण करने का निर्देश दिया।

1986 की घटना, 1987 में सुनाई गई थी सजा

मामला 28 मई 1986 की घटना से जुड़ा है। अभियोजन के अनुसार, दो बच्चों की मां और विधवा पीड़िता दोपहर के समय अपने छोटे बेटे के साथ घर लौट रही थी, जब उसके साथ दुष्कर्म किया गया।

पीड़िता की मौखिक शिकायत पर उसी दिन शाम 6:15 बजे एफआईआर दर्ज की गई। पुलिस ने 17 जून 1986 को आरोपपत्र दाखिल किया।

18 मार्च 1987 को बांदा के द्वितीय अपर सत्र न्यायाधीश ने मंगल सिंह को भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 376 के तहत दोषी ठहराते हुए सात साल के कठोर कारावास और 1,000 रुपये जुर्माने की सजा सुनाई थी।

दोषी ने इस फैसले के खिलाफ वर्ष 1987 में हाईकोर्ट में अपील दाखिल की थी।

बचाव पक्ष ने एफआईआर में देरी और चोट न होने का तर्क दिया

अपीलकर्ता की ओर से अधिवक्ता श्रियांश सिंह ने कहा कि पुलिस थाना घटनास्थल से केवल 12 किलोमीटर दूर था, फिर भी एफआईआर दर्ज कराने में देरी हुई।

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उन्होंने तर्क दिया कि पीड़िता के शरीर पर चोट के निशान नहीं थे और अभियोजन के पास पर्याप्त पुष्टि करने वाले साक्ष्य भी नहीं थे।

बचाव पक्ष ने गवाह PW-2 को संयोगवश मौजूद गवाह बताया। यह भी कहा कि घटना के समय पीड़िता के साथ मौजूद बच्चे की गवाही नहीं कराई गई।

इसके अलावा जांच को जल्दबाजी में की गई और अनुचित बताते हुए आरोप लगाया गया कि ट्रायल कोर्ट ने बचाव पक्ष के गवाह DW-1 द्वारा प्रस्तुत घटनास्थल पर मौजूद न होने के साक्ष्य पर उचित विचार नहीं किया।

राज्य सरकार की ओर से अपर शासकीय अधिवक्ता विनय कुमार पांडेय ने इन दलीलों का विरोध किया।

उन्होंने कहा कि पीड़िता ग्रामीण परिवेश की अशिक्षित महिला थी और उसके पास आवागमन का साधन नहीं था। घर पर अपनी तीन वर्षीय बेटी की देखभाल की व्यवस्था करने के बाद उसने छह घंटे के भीतर शिकायत दर्ज कराई थी।

सरकारी अधिवक्ता ने कहा कि पीड़िता की गवाही विश्वसनीय थी और प्रत्यक्षदर्शी PW-2 ने भी उसकी पुष्टि की थी। उन्होंने तर्क दिया कि प्रत्यक्ष साक्ष्य को चिकित्सकीय साक्ष्य पर प्राथमिकता दी जाती है।

डर से शरीर का न हिलना सहमति का प्रमाण नहीं

हाईकोर्ट ने पाया कि पीड़िता घटना के दौरान लगातार शोर मचा रही थी। उसने बताया था कि डर के कारण उसके हाथ-पैर नहीं हिल रहे थे।

कोर्ट ने कहा:

“उसके हाथ-पैर नहीं हिल रहे थे। ऐसा डर के कारण हो सकता है। इसे उसकी सहमति नहीं माना जाना चाहिए।”

बेंच ने यह भी कहा कि यदि पीड़िता की सहमति होती, तो वह घटना के छह घंटे के भीतर शिकायत दर्ज नहीं कराती।

एफआईआर में हर विवरण होना जरूरी नहीं

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एफआईआर दर्ज कराने में देरी के सवाल पर हाईकोर्ट ने पीड़िता का स्पष्टीकरण स्वीकार किया।

कोर्ट ने ध्यान दिया कि वह विधवा और अशिक्षित थी तथा उसके पास परिवहन का साधन नहीं था। शिकायत दर्ज कराने से पहले उसे घर पर अपनी छोटी बेटी की व्यवस्था करनी पड़ी थी।

इसलिए एफआईआर में हुई देरी का पर्याप्त स्पष्टीकरण मौजूद था और इससे अभियोजन का मामला प्रभावित नहीं होता।

एफआईआर में कुछ विवरण न होने पर कोर्ट ने कहा:

“यह स्थापित कानून है कि एफआईआर कोई विश्वकोश नहीं है। इसमें केवल अभियोजन के मामले की बुनियादी जानकारी होती है।”

पीड़िता की गवाही विश्वसनीय, मामूली विरोधाभास महत्वपूर्ण नहीं

हाईकोर्ट ने Mohd. Imran Khan vs. State (NCT of Delhi) और State of Punjab vs. Gurmit Singh सहित सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का उल्लेख किया।

बेंच ने पाया कि पीड़िता की गवाही की पुष्टि प्रत्यक्षदर्शी ने की थी और बयानों में मामूली अंतर मामले की जड़ को प्रभावित नहीं करते थे।

कोर्ट ने पीड़िता की गवाही को “निर्णायक, भरोसेमंद और अत्यंत विश्वसनीय प्रकृति की” बताया।

जांच में कथित खामियों पर State of Karnataka vs. K. Yarappa Reddy के फैसले का हवाला देते हुए कोर्ट ने कहा कि जांच संदिग्ध होने पर भी अन्य साक्ष्यों की स्वतंत्र रूप से जांच की जा सकती है।

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हाईकोर्ट ने आरोपी के घटनास्थल पर मौजूद न होने के बचाव को भी अस्वीकार कर दिया।

कोर्ट ने पाया कि बचाव पक्ष का गवाह DW-1 शाम लगभग चार बजे कुछ मिनट के लिए आरोपी के घर गया था, जबकि घटना दोपहर में हुई थी। इसलिए उसकी गवाही से आरोपी का घटना के समय कहीं और होना साबित नहीं होता।

बचाव पक्ष द्वारा लगाया गया दुश्मनी का आरोप भी साबित नहीं हुआ। इसके अतिरिक्त, बचाव पक्ष ने चिकित्सकीय रिपोर्ट की प्रामाणिकता स्वीकार की थी।

सात साल की सजा बरकरार, जमानत रद्द

सभी साक्ष्यों और दलीलों पर विचार करने के बाद हाईकोर्ट ने कहा:

“ट्रायल कोर्ट द्वारा दर्ज दोषसिद्धि और सजा के निष्कर्ष में कोई त्रुटि या विकृति नहीं है।”

हाईकोर्ट ने मंगल सिंह की अपील खारिज करते हुए धारा 376 IPC के तहत दोषसिद्धि और सात साल के कठोर कारावास की सजा बरकरार रखी।

कोर्ट ने अपीलकर्ता की जमानत रद्द कर उसे तत्काल ट्रायल कोर्ट के समक्ष आत्मसमर्पण करने का निर्देश दिया।

पहले जेल में बिताई गई अवधि को उसकी सजा में समायोजित किया जाएगा।

हाईकोर्ट ने फैसले की प्रति और ट्रायल कोर्ट का रिकॉर्ड बांदा के जिला एवं सत्र न्यायाधीश को भेजने का भी आदेश दिया।

केस डिटेल्स

केस टाइटल: Mangal Singh vs. State

केस नंबर: Criminal Appeal No. 818 of 1987

पीठ: जस्टिस अब्दुल शाहिद

फैसले की तारीख: 28 अक्टूबर 2026

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