इलाहाबाद हाईकोर्ट ने तबादले के बावजूद चार साल से अधिक समय तक लखनऊ में सरकारी आवास खाली नहीं करने वाले एक अधिकारी से ₹7.69 लाख बाजार दर पर किराया वसूलने के फैसले को सही ठहराया है। कोर्ट ने अधिकारी की याचिका खारिज करते हुए उस पर ₹10,000 का जुर्माना भी लगाया है।
जस्टिस आलोक माथुर और जस्टिस अवधेश कुमार चौधरी की डिवीजन बेंच ने वाणिज्य कर विभाग के पूर्व सहायक आयुक्त वेदानंद ओझा की याचिका पर सुनवाई करते हुए उत्तर प्रदेश राज्य लोक सेवा अधिकरण के फैसले में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया।
12 अक्टूबर को दिए आदेश में हाईकोर्ट ने पाया कि अधिकारी ने फरवरी 2012 में जारी निर्देशों का पालन नहीं किया था। कोर्ट ने उन्हें 30 जून 2012 तक सरकारी आवास खाली करने का लिखित आश्वासन देने का निर्देश दिया था, लेकिन उन्होंने न तो ऐसा कोई आश्वासन दिया और न ही निर्धारित समय पर आवास खाली किया।
कोर्ट के आदेशों का सम्मान नहीं करने वाले को राहत नहीं
हाईकोर्ट ने अधिकारी के आचरण पर नाराजगी जताते हुए कहा कि पहले दिए गए निर्देशों की अवहेलना करने के बाद वह कोर्ट से किसी रियायत की मांग नहीं कर सकते।
बेंच ने टिप्पणी की, “जो व्यक्ति इस कोर्ट की गरिमा और प्रतिष्ठा का जरा भी सम्मान नहीं करता, वह कोर्ट से किसी हस्तक्षेप का हकदार नहीं है और न ही अपने पक्ष में किसी न्यायसंगत रियायत का दावा कर सकता है।”
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत राहत देना उसके विवेकाधिकार में आता है और इसका इस्तेमाल उचित मामलों में ही किया जाना चाहिए।
बेंच ने पाया कि ओझा ने साफ नीयत से कोर्ट का दरवाजा नहीं खटखटाया था। उन्होंने पहले जारी न्यायिक निर्देशों का उल्लंघन किया था। ऐसे में उन्हें राहत देने का कोई आधार नहीं था।
हाईकोर्ट ने यह भी माना कि राज्य लोक सेवा अधिकरण ने मामले से जुड़े सभी जरूरी पहलुओं पर विचार करने के बाद 1 जुलाई 2026 को उनकी याचिका सही तरीके से खारिज की थी।
पहले ही बाजार दर पर किराया देने की सहमति जता चुके थे अधिकारी
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में 2 फरवरी 2012 के उस आदेश को महत्वपूर्ण माना, जिसमें सरकारी आवास खाली करने और किराया चुकाने को लेकर दोनों पक्षों के बीच बनी सहमति दर्ज की गई थी।
उस समय ओझा ने 2008 में तबादले के बाद सरकारी आवास में रहने की अवधि के लिए बाजार दर से किराया देने पर सहमति जताई थी।
कोर्ट ने उन्हें वेतन से मकान किराया भत्ते के मद में पहले काटी गई राशि को समायोजित करने के बाद शेष किराया जमा करने की अनुमति दी थी।
मौजूदा सुनवाई में बेंच ने कहा कि पिछले आदेश में दर्ज सहमति से स्पष्ट है कि ओझा ने तबादले के बाद सरकारी आवास में रहने के लिए बाजार दर पर किराया लगाए जाने के खिलाफ अपनी आपत्ति छोड़ दी थी।
इसलिए वह दोबारा उसी मुद्दे को लेकर विवाद नहीं उठा सकते।
2008 में पीलीभीत तबादला, सितंबर 2012 में खाली किया आवास
वेदानंद ओझा को वर्ष 2005 में वाणिज्य कर विभाग में तैनाती के दौरान लखनऊ के गोमती नगर स्थित विराम खंड में सरकारी आवास आवंटित किया गया था। उन्होंने 28 अगस्त 2005 को आवास का कब्जा लिया था।
जून 2008 में उनका तबादला पीलीभीत हो गया, लेकिन वह लखनऊ स्थित सरकारी आवास में रहते रहे। विभाग के निर्देशों के बावजूद उन्होंने आवास खाली नहीं किया।
जब अधिकारियों ने आवास खाली कराने की कार्रवाई शुरू की, तो ओझा ने 2012 में हाईकोर्ट का रुख किया।
हाईकोर्ट ने 2 फरवरी 2012 को उनकी याचिका का निस्तारण करते हुए निर्देश दिया कि आदेश की प्रति मिलने के एक सप्ताह के भीतर वह लिखित आश्वासन दें कि 30 जून 2012 तक आवास खाली कर देंगे।
हालांकि, उन्होंने निर्धारित समय में आश्वासन नहीं दिया और समय सीमा समाप्त होने के बाद भी आवास पर कब्जा बनाए रखा।
आखिरकार 10 सितंबर 2012 को उन्होंने सरकारी आवास खाली किया। यह कोर्ट द्वारा निर्धारित समय सीमा से दो महीने से अधिक समय बाद था।
विभाग ने जुलाई 2008 से जून 2012 तक की अवधि के लिए बाजार दर के अनुसार ₹7.69 लाख किराया निर्धारित किया।
ग्रेच्युटी से रोकी गई रकम लौटाने की मांग भी खारिज
विभाग की वसूली के खिलाफ ओझा ने लखनऊ स्थित उत्तर प्रदेश राज्य लोक सेवा अधिकरण में दावा किया था। अधिकरण ने 1 जुलाई 2026 को उनकी मांग खारिज कर दी।
इसके बाद उन्होंने हाईकोर्ट में याचिका दाखिल कर अधिकरण के फैसले को चुनौती दी। उन्होंने 18 अक्टूबर 2012 के दंड आदेश और 12 फरवरी 2013 की चार्जशीट को भी चुनौती दी।
इसके अलावा, ओझा ने अपनी ग्रेच्युटी से रोकी गई ₹7.69 लाख की राशि निर्धारित ब्याज सहित वापस दिलाने की मांग की।
हाईकोर्ट ने माना कि तबादले के 30 दिन बाद भी बिना अनुमति सरकारी आवास में बने रहने के कारण अधिकारियों का बाजार दर पर किराया लगाने का निर्णय उचित था।
बेंच ने कहा कि अधिकारी के स्वेच्छा से आवास खाली करने तक जारी अनधिकृत कब्जे के लिए बाजार दर से किराया वसूलना उचित था।
इन निष्कर्षों के आधार पर हाईकोर्ट ने अधिकरण के आदेश में हस्तक्षेप करने से इनकार करते हुए वेदानंद ओझा की याचिका खारिज कर दी और उन पर ₹10,000 का जुर्माना लगाया।
