जल निकायों पर नहीं दिया जा सकता रैयतवारी पट्टा; सुप्रीम कोर्ट का आदेश- निर्दोष फ्लैट खरीदारों को ढहाने की कार्रवाई से पहले वैकल्पिक जमीन दे सरकार

पर्यावरण संरक्षण के सख्त कानूनी प्रावधानों और निर्दोष घर खरीदारों के हितों के बीच संतुलन साधते हुए सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि ‘तमिलनाडु एस्टेट्स (उन्मूलन और रैयतवारी में रूपांतरण) अधिनियम, 1948’ के तहत जल निकायों और सार्वजनिक पोरम्बोक भूमि पर किसी भी स्थिति में रैयतवारी पट्टा जारी नहीं किया जा सकता। जस्टिस एस.वी.एन. भट्टी और जस्टिस एन. वी. अंजारिया की पीठ ने तमिलनाडु के तिरुवल्लूर जिले में स्थित एक तालाब की जमीन पर फर्जी तरीके से दिए गए पट्टे को रद्द करने के फैसले को बरकरार रखते हुए अपीलों को खारिज कर दिया। इसके साथ ही अदालत ने राज्य सरकार को कड़ा निर्देश दिया कि निर्दोष फ्लैट खरीदारों के आशियाने ढहाने से पहले उन्हें समान आकार की वैकल्पिक जमीन आवंटित की जाए।

मामले की पृष्ठभूमि

यह पूरा विवाद तिरुवल्लूर जिले के अंबात्तूर तालुक (वर्तमान में आवाड़ी तालुक) स्थित तिरुमुल्लईवोयल गांव के सर्वे नंबर 572 की 1.68 एकड़ में से 0.72 एकड़ भूमि से जुड़ा है। वर्ष 1911 के पुनर्सर्वेक्षण और पुनर्निरूपण (आरएसआर) ‘ए’ रजिस्टर में यह भूमि स्पष्ट रूप से “सरकारी पोरम्बोक – कनकन कुट्टई” (तालाब) के रूप में दर्ज थी। टाइटल डीड नंबर 300 के तहत पास के एक माइनर इनाम से जुड़ी होने के कारण इसे स्थानीय तौर पर कनककु पिल्लई कुट्टई कहा जाता था।

वर्ष 1980 से 1988 के बीच निजी बैनामे (सेल डीड) के जरिए इस जमीन की खरीद-फरोख्त हुई और 2004 में कानूनी वारिसों द्वारा अधिकार छोड़ने के बाद यह पी. रामदास के पास पहुंच गई। रामदास ने 2005 में आवाड़ी नगर पालिका से टिम्बर मार्ट के लिए परमिट हासिल किया। इसके बाद, 1948 के अधिनियम और संबंधित सरकारी आदेशों के तहत तय समय-सीमा बीत जाने के दशकों बाद, रामदास ने 18 अक्टूबर 2010 को रैयतवारी पट्टे के लिए जिला राजस्व अधिकारी (डीआरओ), तिरुवल्लूर के समक्ष आवेदन दाखिल किया। 21 जनवरी 2011 को डीआरओ ने वर्तमान जमीनी उपयोग का हवाला देते हुए और यह कहते हुए पट्टा जारी कर दिया कि गांव के नक्शे में इस सर्वे नंबर पर कोई तालाब नहीं दिखता।

पट्टा मिलते ही टाउन सर्वे लैंड रजिस्टर में बदलाव किए गए। इसके बाद रामदास ने इस 0.72 एकड़ जमीन को तमिलनाडु मर्केंटाइल बैंक लिमिटेड के पास गिरवी रखकर 3.40 करोड़ रुपये का ऋण ले लिया। साथ ही, उन्होंने 0.22 एकड़ जमीन अपनी पत्नी आर. उमा के नाम ट्रांसफर कर दी। पत्नी से मुख्तारनामा (पावर ऑफ अटॉर्नी) लेकर मेसर्स एमवीएम बिल्डर्स एंड प्रमोटर्स ने आवाड़ी नगर पालिका से नक्शा पास कराया और चार ब्लॉकों में 20 आवासीय फ्लैटों (एमवीएम अपराजितापुरी) का निर्माण कर उन्हें व्यक्तिगत खरीदारों को बेच दिया।

वर्ष 2014 में एक तीसरे पक्ष द्वारा आपत्ति जताए जाने के बाद, अतिरिक्त मुख्य सचिव-सह-भूमि प्रशासन आयुक्त (सीएलए) ने जांच शुरू की और 26 दिसंबर 2019 को पट्टा रद्द कर दिया। जांच में बड़े प्रशासनिक फर्जीवाड़े का खुलासा हुआ: पट्टा आवेदन तय मियाद खत्म होने के कई दशकों बाद दाखिल हुआ था, फाइल नंबर में हेराफेरी की गई थी, फाइल रिकॉर्ड रूम से गायब थी और राजस्व कर्मचारियों ने एक संरक्षित जल निकाय की स्थिति को बदलने में गैरकानूनी मिलीभगत की थी। सीएलए ने जल निकाय को बहाल करने, रिकॉर्ड को ठीक करने और दोषी अधिकारियों के खिलाफ अनुशासनात्मक व आपराधिक कार्रवाई करने के आदेश दिए।

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बैंक ने सीएलए के इस आदेश को मद्रास हाईकोर्ट में चुनौती दी, लेकिन हाईकोर्ट ने 11 जुलाई 2024 और 2 जुलाई 2025 को याचिकाएं खारिज कर दीं। हाईकोर्ट ने सीएलए के निष्कर्षों को सही माना और अधिकारियों को 16 सप्ताह के भीतर सभी अवैध निर्माण ध्वस्त कर जल निकाय बहाल करने तथा दोषी अधिकारियों के खिलाफ सतर्कता जांच और आपराधिक मामले दर्ज करने का निर्देश दिया। इस फैसले के खिलाफ बैंक और एक फ्लैट खरीदार एस. गुरुराज ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया।

पक्षकारों की दलीलें

अपीलकर्ताओं की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता टी. राजा और अधिवक्ता के.एस. महादेवन ने तर्क दिया कि अधिकारियों ने बिना किसी औपचारिक न्यायिक निर्धारण के यह मान लिया कि विवादित भूमि एक तालाब थी। उन्होंने दलील दी कि चेन्नई मेट्रोपॉलिटन डेवलपमेंट अथॉरिटी ने सर्वे नंबर 572 को “मिश्रित आवासीय क्षेत्र” (मिक्सड रेजिडेंशियल ज़ोन) घोषित कर रखा है, जिससे साबित होता है कि यह भूमि रैयतवारी है, न कि जल निकाय। उन्होंने यह भी कहा कि डीआरओ को पट्टा देने का पूरा अधिकार था और सीएलए ने बैंक या निर्दोष खरीदारों को अपनी बात रखने का अवसर दिए बिना एकतरफा आदेश पारित किया।

इसके विपरीत, प्रतिवादियों की ओर से पेश अधिवक्ता जयश्री नरसिम्हन ने दलील दी कि वर्ष 1911 के सबसे पुराने रिकॉर्ड में यह भूमि स्पष्ट रूप से “सरकारी पोरम्बोक – कनकन कुट्टई” दर्ज थी। निजी पक्षकारों के बीच हुए लेन-देन से जल निकायों पर सरकार या स्थानीय निकायों के अधिकारों पर कोई असर नहीं पड़ता। उन्होंने कहा कि 1948 के अधिनियम के तहत अधिकारियों को गैर-रैयती भूमि, सामुदायिक भूमि या तालाब पर पट्टा जारी करने का कोई अधिकार नहीं है। 1974 में जोड़ी गई धारा 14-ए स्पष्ट रूप से निजी तालाबों पर भी पट्टा देने पर रोक लगाती है और पहले से दिए गए पट्टों को भी शून्य घोषित करती है। उन्होंने यह भी कहा कि रिकॉर्डेड पट्टेदार रामदास को विधिवत नोटिस दिया गया था, इसलिए बैंक या खरीदारों द्वारा अवसर न मिलने की बात कहना अनुचित है।

सुप्रीम कोर्ट का कानूनी विश्लेषण

सुप्रीम कोर्ट ने 1948 के कानून और 1974 के संशोधन अधिनियम संख्या 49 द्वारा जोड़ी गई धारा 14-ए का बारीकी से परीक्षण किया। अदालत ने दोहराया कि सामुदायिक जल निकाय बिना किसी भार के राज्य में निहित होते हैं और उन पर किसी भी रैयत या पूर्व भूस्वामी को पट्टा नहीं दिया जा सकता।

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जमीन को तालाब घोषित करने के लिए पूर्व न्यायिक निर्धारण की आवश्यकता वाली दलील को खारिज करते हुए पीठ ने कहा:

“हमारे विचार में यह दलील पूरी तरह निराधार है, क्योंकि 1948 का अधिनियम सामुदायिक सरकारी पोरम्बोक आदि की सुरक्षा के लिए किसी औपचारिक न्यायिक निर्धारण की मांग नहीं करता। सीधे शब्दों में कहें तो 1948 के अधिनियम के तहत रैयतवारी व्यवस्था केवल उसी अधिनियम के दायरे में आने वाली रैयती भूमि पर लागू होती है। इस संबंध में की जाने वाली जांच केवल भूमि की प्रकृति, उसके उपयोग के प्रकार, उपयोग की अवधि और पट्टा पाने की पात्रता तय करने तक सीमित होती है।”

सलेम म्युनिसिपैलिटी बनाम पी. कुमार एवं अन्य (2019) के पूर्व फैसले का उल्लेख करते हुए अदालत ने रेखांकित किया कि रैयती भूमि की परिभाषा से तालाबों के तल, बांध, जल निकासी और सिंचाई नहरें पूरी तरह बाहर हैं। धारा 14-ए के तहत किसी निजी तालाब या ऊरानी के लिए दिया गया पट्टा भी कानूनी रूप से अमान्य और रद्द माना जाता है। पीठ ने आगे कहा:

“1948 के अधिनियम की धारा 14-ए अधिकारियों को गैर-रैयती भूमि के लिए रैयतवारी पट्टा देने या उस पर विचार करने से स्पष्ट रूप से रोकती है। विधायिका ने भूमि के वर्गीकरण में बदलाव को रोकने के लिए एक निषेधात्मक तंत्र तैयार किया है। यह धारा पहले से जारी किए गए आदेशों को भी शून्य घोषित करती है। ऐसी स्पष्ट वैधानिक व्यवस्था होने के बावजूद, तिरुवल्लूर के तत्कालीन डीआरओ ने कानून के प्रावधानों से परे जाकर बिना किसी आधार के पट्टा जारी कर दिया।”

अदालत ने यह दलील भी खारिज कर दी कि तमिलनाडु नगर एवं ग्राम नियोजन अधिनियम, 1971 के तहत आवासीय क्षेत्र घोषित होने से 1948 का कानून निष्प्रभावी हो जाता है। पीठ ने स्पष्ट किया कि जोनिंग नियम व्यक्तिगत विकास गतिविधियों पर लागू होते हैं, वे पोरम्बोक भूमि या जल निकायों पर सरकार के मालिकाना हक को खत्म नहीं कर सकते। इसके अलावा, प्राकृतिक न्याय के उल्लंघन की दलील भी खारिज कर दी गई क्योंकि नोटिस मूल पट्टेदार को दिया जा चुका था।

सरकारी तंत्र की गंभीर लापरवाही और मिलीभगत पर सख्त रुख अपनाते हुए अदालत ने टिप्पणी की:

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“अदालत यह दर्ज करने के लिए विवश है कि कोई भी वास्तविक और निर्दोष खरीदार संपत्ति खरीदते समय राजस्व प्रविष्टियों और टाउन सर्वे रिकॉर्ड्स की वैधानिक प्रामाणिकता पर ही भरोसा करता है। सरकार की सुविधा के अनुसार भूमि का स्वरूप बदल दिया जाता है। बिल्डर और जमीन मालिक के खिलाफ कानूनी उपाय अपनी जगह स्वतंत्र हैं, लेकिन राज्य के अधिकारियों द्वारा की गई इस मनमानी और अनुचित सुविधा के लिए राज्य और उसके अधिकारियों को बिना हर्जाना चुकाए यूं ही छूटने नहीं दिया जा सकता।”

सुप्रीम कोर्ट का निर्णय और निर्देश

सुप्रीम कोर्ट ने पट्टा रद्द करने और जल निकाय बहाल करने के फैसले पर मुहर लगाते हुए निर्दोष खरीदारों को बेघर होने से बचाने के लिए न्यायसंगत समाधान का निर्देश दिया:

“मामले की परिस्थितियों को देखते हुए और फ्लैट खरीदारों की संभावित कठिनाइयों को कम करने के उद्देश्य से, 1948 के अधिनियम की धारा 14-ए का उल्लंघन किए बिना, हम तमिलनाडु के मुख्य सचिव और जिला कलेक्टर, तिरुवल्लूर को निर्देश देते हैं कि वे आज से अधिमानतः 6 महीने के भीतर सोसाइटी द्वारा प्रतिनिधित्व किए जा रहे फ्लैट मालिकों को समान आकार की एक खाली वैकल्पिक जमीन आवंटित करें, और उसके बाद ही 0.22 एकड़ क्षेत्र में बने निर्माण को ढहाने की कार्रवाई की जाए।”

अदालत ने स्पष्ट किया कि विवादित भूमि के खाली और अनाधिकृत हिस्सों पर जल निकाय की बहाली और विकास का कार्य बिना किसी रुकावट के तुरंत जारी रखा जाए। फ्लैट मालिकों और बैंक को बिल्डर या मूल मालिक के खिलाफ दीवानी अदालत में कानूनी कदम उठाने की छूट दी गई है। साथ ही राज्य सरकार को लापरवाह और दोषी अधिकारियों के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई जारी रखने या पूरी करने की अनुमति दी गई है। इन निर्देशों के साथ सुप्रीम कोर्ट ने सभी सिविल अपीलें खारिज कर दीं।

मामले का विवरण

मामले का शीर्षक: एस. गुरुराज बनाम अतिरिक्त मुख्य सचिव/भूमि प्रशासन आयुक्त एवं अन्य (संबद्ध अपीलों के साथ)

वाद संख्या: सिविल अपील संख्या 13629 / 2026 (सिविल अपील संख्या 13630 और 13631 / 2026 के साथ) 

पीठ: जस्टिस एस.वी.एन. भट्टी और जस्टिस एन. वी. अंजारिया 

निर्णय की तिथि: 16 अक्टूबर 2026

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