सुप्रीम कोर्ट ने कृष्णा गोदावरी (KG) बेसिन में प्राकृतिक गैस के कथित अवैध दोहन को लेकर केंद्र सरकार और रिलायंस इंडस्ट्रीज लिमिटेड (RIL) के नेतृत्व वाले कंसोर्टियम के बीच चल रहे विवाद को मध्यस्थता के लिए भेज दिया है। कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट की पूर्व न्यायाधीश जस्टिस रंजना प्रकाश देसाई को मध्यस्थ नियुक्त किया है।
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस विपुल एम. पंचोली की तीन सदस्यीय पीठ ने शुक्रवार को यह आदेश दिया। दोनों पक्षों ने कोर्ट को बताया कि आपसी बातचीत के बावजूद विवाद का कोई समाधान नहीं निकल सका है।
यह मामला रिलायंस और उसकी साझेदार कंपनियों बीपी पीएलसी तथा निको रिसोर्सेज से लगभग 1.5 अरब डॉलर और अतिरिक्त 17.4 करोड़ डॉलर ब्याज की वसूली की सरकारी मांग से जुड़ा है। आरोप है कि रिलायंस ने ऑयल एंड नेचुरल गैस कॉरपोरेशन (ONGC) के क्षेत्रों से अपने ब्लॉक में पहुंची प्राकृतिक गैस का दोहन किया।
पूर्व न्यायाधीश जस्टिस रंजना प्रकाश देसाई करेंगी मध्यस्थता
केंद्र सरकार की ओर से अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणी और रिलायंस कंसोर्टियम की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने सुप्रीम कोर्ट से विवाद को मध्यस्थता के जरिए सुलझाने का अनुरोध किया।
इस पर मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने कहा कि व्यावसायिक विवादों को सुलझाने का व्यापक अनुभव होने के कारण जस्टिस देसाई इस जिम्मेदारी के लिए उपयुक्त हैं।
पीठ ने निर्देश दिया कि मध्यस्थता प्रक्रिया में जस्टिस देसाई दो विषय विशेषज्ञों की सहायता भी ले सकती हैं, जिनके नाम पक्षकार सुझा सकते हैं।
कोर्ट ने अपने आदेश में दर्ज किया कि समझौते की संभावनाएं तलाशने के लिए पहले भी कई बार सुनवाई स्थगित की गई थी, लेकिन दोनों पक्ष किसी व्यावहारिक समाधान तक नहीं पहुंच सके।
दिल्ली हाईकोर्ट ने रद्द किया था रिलायंस के पक्ष में मध्यस्थता फैसला
यह विवाद दिल्ली हाईकोर्ट के उस फैसले के बाद सुप्रीम कोर्ट पहुंचा, जिसमें रिलायंस कंसोर्टियम के पक्ष में दिए गए मध्यस्थता न्यायाधिकरण के फैसले को रद्द कर दिया गया था।
जुलाई 2018 में मध्यस्थता न्यायाधिकरण ने केंद्र सरकार की मांग खारिज करते हुए रिलायंस के पक्ष में फैसला सुनाया था। न्यायाधिकरण का निष्कर्ष था कि उत्पादन साझेदारी अनुबंध (PSC) में ऐसी कोई रोक नहीं थी, जो ठेकेदारों को दूसरे क्षेत्र से उनके ब्लॉक में पहुंची प्राकृतिक गैस निकालने और बेचने से प्रतिबंधित करती हो।
केंद्र सरकार ने इस फैसले को दिल्ली हाईकोर्ट में चुनौती दी। मई 2024 में हाईकोर्ट की एकल पीठ ने सरकार की याचिका खारिज कर दी।
इसके बाद केंद्र सरकार ने अपील की। दिल्ली हाईकोर्ट की खंडपीठ ने एकल पीठ के आदेश और मध्यस्थता न्यायाधिकरण के फैसले को रद्द कर दिया। खंडपीठ ने कहा कि दोनों फैसले कानून की स्थापित स्थिति के विपरीत थे।
इस आदेश के खिलाफ रिलायंस कंसोर्टियम ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया।
2009 से 2013 के बीच गैस निकालने को लेकर विवाद
विवाद की शुरुआत वर्ष 2000 में केंद्र सरकार और रिलायंस के नेतृत्व वाले कंसोर्टियम के बीच हुए उत्पादन साझेदारी अनुबंध से हुई थी। इस समझौते के तहत आंध्र प्रदेश तट के पास कृष्णा गोदावरी बेसिन में प्राकृतिक गैस की खोज और उत्पादन के अधिकार दिए गए थे।
अप्रैल 2009 में रिलायंस कंसोर्टियम ने ONGC के गोदावरी पेट्रोलियम एवं माइनिंग लीज क्षेत्र और KG-DWN-98/2 ब्लॉक से सटे क्षेत्रों में व्यावसायिक उत्पादन शुरू किया।
उस समय संबंधित KG-D6 ब्लॉक में रिलायंस की 60 प्रतिशत, बीपी पीएलसी की 30 प्रतिशत और निको रिसोर्सेज की 10 प्रतिशत हिस्सेदारी थी।
वर्ष 2013 में ONGC ने आरोप लगाया कि रिलायंस ने उसके गैस क्षेत्रों के पास कुएं खोदकर प्राकृतिक गैस का अवैध दोहन किया। ONGC के अनुसार, वर्ष 2009 से 2013 के बीच उसके क्षेत्रों से गैस रिलायंस के KG-D6 ब्लॉक में पहुंची, जिससे रिलायंस को अनुचित आर्थिक लाभ हुआ।
इन आरोपों के बाद केंद्र सरकार ने रिलायंस और उसकी साझेदार कंपनियों से लगभग 1.5 अरब डॉलर तथा 17.4 करोड़ डॉलर ब्याज की वसूली की मांग की।
रिलायंस कंसोर्टियम ने इस मांग का विरोध करते हुए अनुबंध में मौजूद मध्यस्थता प्रावधान का सहारा लिया।
अब सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद दोनों पक्ष जस्टिस रंजना प्रकाश देसाई की मध्यस्थता में विवाद का आपसी सहमति से समाधान तलाशेंगे।
