सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि महाराष्ट्र में बिना लाइसेंस के साहूकारी करने वाले व्यक्ति द्वारा प्रॉमिसरी नोट (Pronote) के आधार पर दिए गए कर्ज की वसूली के लिए नेगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स एक्ट की धारा 138 के तहत कार्यवाही चल सकती है या नहीं, इसका निर्णय संबंधित अदालत करेगी।
जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस एन.वी. अंजारिया की बेंच ने M/s Mansi Finance (Chennai) Ltd. v. M. Lalitha मामले में 26 मई 2026 को दिए गए फैसले पर स्पष्टीकरण देने से इनकार कर दिया।
कोर्ट ने कहा कि उस फैसले में तमिलनाडु और महाराष्ट्र के साहूकारी कानूनों के प्रावधानों पर विचार नहीं किया गया था। इसलिए इन कानूनों के तहत किसी कर्ज की कानूनी वसूली संभव है या नहीं, यह प्रश्न संबंधित मामले के तथ्यों के आधार पर तय होगा।
क्या था मामला?
सुप्रीम कोर्ट ने 26 मई 2026 को क्रिमिनल अपील संख्या 2849/2026 में नेगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स एक्ट की धारा 138 और 141 से संबंधित विवाद का निर्णय किया था।
उस मामले में प्रॉमिसरी नोट के आधार पर कर्ज दिया गया था और भुगतान के लिए जारी चेक बाउंस हो गए थे।
हाईकोर्ट ने चार आरोपियों के खिलाफ शिकायत रद्द कर दी थी, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने उनमें से तीन के खिलाफ कार्यवाही बहाल कर दी थी।
इसके बाद व्योमेश महिपात्राय शाह ने सुप्रीम कोर्ट में विविध आवेदन दाखिल कर मई 2026 के फैसले पर स्पष्टीकरण मांगा।
महाराष्ट्र और तमिलनाडु के कानूनों में अंतर का सवाल
आवेदक ने दलील दी कि तमिलनाडु मनी-लेंडर्स एक्ट, 1957 के तहत नेगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स के आधार पर दिए गए अग्रिम धन को कानून के दायरे से बाहर रखा गया है। इसलिए वहां ऐसे कर्ज की कानूनी वसूली संभव है।
हालांकि, महाराष्ट्र मनी-लेंडिंग (रेगुलेशन) एक्ट, 2014 में ब्याज पर प्रॉमिसरी नोट के आधार पर दिए गए कर्ज को ऐसी छूट नहीं दी गई है।
आवेदक के अनुसार, महाराष्ट्र कानून की धारा 4 बिना लाइसेंस साहूकारी पर रोक लगाती है। इसलिए मई 2026 का फैसला महाराष्ट्र में बिना लाइसेंस वाले साहूकारों द्वारा दाखिल धारा 138 की कार्यवाहियों पर लागू नहीं होना चाहिए।
उन्होंने यह भी कहा कि ऐसे मामलों में सुप्रीम कोर्ट का 6 अप्रैल 2026 का आदेश, जो विविध आवेदन संख्या 1176/2026 में पारित हुआ था, लागू रहना चाहिए।
वहीं, हस्तक्षेपकर्ता अशोक कमर्शियल एंटरप्राइजेज ने आवेदन की विचारणीयता का विरोध किया। उसका तर्क था कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले में निर्धारित कानूनी सिद्धांत को अलग-अलग मामलों में लागू करना संबंधित अदालतों का काम है।
महाराष्ट्र में प्रॉमिसरी नोट पर दिए गए कर्ज के लिए लाइसेंस जरूरी
सुप्रीम कोर्ट ने महाराष्ट्र कानून की धारा 2(13)(j) का उल्लेख करते हुए कहा कि इसमें प्रॉमिसरी नोट को छोड़कर अन्य नेगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स के आधार पर दिए गए अग्रिम धन को छूट दी गई है।
बेंच ने कहा कि महाराष्ट्र में बिना लाइसेंस प्रॉमिसरी नोट के आधार पर ब्याज पर कर्ज देना धारा 4 के तहत प्रतिबंधित है और धारा 13 के तहत ऐसे कर्ज की वसूली नहीं की जा सकती।
कोर्ट ने कहा:
“चेक बाउंस या वसूली से संबंधित किसी भी कार्यवाही में महाराष्ट्र राज्य के साहूकार को प्रारंभिक चरण में ही अदालत के समक्ष लाइसेंस प्रस्तुत करना होगा।”
सुप्रीम कोर्ट ने अपने 6 अप्रैल 2026 के आदेश का भी उल्लेख किया, जिसमें कहा गया था कि निजी साहूकार द्वारा लाइसेंस प्रस्तुत नहीं किए जाने पर ऐसी कार्यवाही को शुरुआती चरण में ही समाप्त कर दिया जाना चाहिए।
मई 2026 के फैसले पर स्पष्टीकरण देने से इनकार
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि 26 मई 2026 के फैसले में तमिलनाडु मनी-लेंडर्स एक्ट, 1957 या महाराष्ट्र मनी-लेंडिंग (रेगुलेशन) एक्ट, 2014 की लागू होने की स्थिति पर विचार करने का अवसर नहीं आया था।
बेंच ने स्पष्ट किया कि यदि किसी मामले में महाराष्ट्र कानून की धारा 13 के तहत वसूली पर रोक का प्रश्न उठाया जाता है, तो संबंधित अदालत उसके गुण-दोष के आधार पर निर्णय करेगी।
कोर्ट ने कहा:
“चूंकि 26 मई 2026 के फैसले में तमिलनाडु मनी-लेंडर्स एक्ट, 1957 या महाराष्ट्र मनी-लेंडिंग (रेगुलेशन) एक्ट, 2014 के प्रावधानों पर विचार नहीं किया गया है, इसलिए मांगा गया स्पष्टीकरण आवश्यक नहीं है। पक्षकारों को संबंधित ट्रायल कोर्ट या उच्चतर अदालतों के समक्ष यह मुद्दा उठाने की स्वतंत्रता होगी।”
इन टिप्पणियों के साथ सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्टीकरण मांगने वाले आवेदन का निपटारा कर दिया।
केस डिटेल्स
केस टाइटल: M/s Mansi Finance (Chennai) Ltd. v. M. Lalitha & Ors.
केस नंबर: Miscellaneous Application No. 3002 of 2026 in Criminal Appeal No. 2849 of 2026
पीठ: जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस एन.वी. अंजारिया
फैसले की तारीख: 29 अक्टूबर 2026
