गिरफ्तारी के लिखित कारण न देना अपने आप में जमानत का आधार नहीं, यदि आरोपी को कोई नुकसान नहीं हुआ: सुप्रीम कोर्ट ने जमानत रद्द की

सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि गिरफ्तारी के कारण लिखित रूप में नहीं दिए जाने मात्र से किसी आरोपी को नियमित जमानत पाने का स्वतः अधिकार नहीं मिल जाता, यदि कानूनी प्रावधानों का पर्याप्त पालन हुआ हो और आरोपी यह नहीं दिखा सके कि इससे उसे कोई नुकसान पहुंचा है।

जस्टिस एम.एम. सुंदरेश और जस्टिस प्रसन्ना बी. वराले की बेंच ने पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी के संपर्कों को संवेदनशील सैन्य जानकारी भेजने के आरोपी की जमानत रद्द करते हुए राजस्थान हाईकोर्ट का आदेश निरस्त कर दिया।

हाईकोर्ट ने केवल इस आधार पर जमानत दी थी कि आरोपी को गिरफ्तारी के कारण लिखित रूप में उपलब्ध नहीं कराए गए थे।

क्या था मामला?

30 जनवरी 2026 को जयपुर के विशेष पुलिस थाना, जिला सीआईडी (सुरक्षा) में आधिकारिक गोपनीयता अधिनियम, 1923 की धारा 3 और 9 तथा भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 152 और 238(b) के तहत एफआईआर संख्या 01/2026 दर्ज की गई थी।

अभियोजन पक्ष का आरोप था कि झाबरा राम पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी के संपर्कों से जुड़ा था और पैसे के बदले पोखरण तथा जैसलमेर से संबंधित तस्वीरें, वीडियो और सैनिकों की आवाजाही की जानकारी भेजता था।

एफआईआर दर्ज होने से पहले 23 और 26 जनवरी 2026 को उसे आधिकारिक गोपनीयता अधिनियम की धारा 8(1) के तहत नोटिस दिए गए थे।

उसे 30 जनवरी 2026 को शाम चार बजे गिरफ्तार किया गया। गिरफ्तारी मेमो में आरोपों का विवरण दर्ज था, जिसे दो गवाहों के सामने पढ़कर सुनाया गया और आरोपी ने उस पर हस्ताक्षर किए। शाम 4:10 बजे उसके भाई को फोन पर गिरफ्तारी की जानकारी दी गई।

अगले दिन जयपुर महानगर-I के अतिरिक्त मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट संख्या 5 के सामने पेशी के दौरान आरोपी के वकील ने रिमांड का गुण-दोष के आधार पर विरोध किया, लेकिन गिरफ्तारी के कारणों की जानकारी को लेकर कोई आपत्ति नहीं उठाई।

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सत्र न्यायालय ने 10 मार्च 2026 को उसकी जमानत याचिका खारिज कर दी।

हालांकि, राजस्थान हाईकोर्ट ने 18 मई 2026 को भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 483 के तहत नियमित जमानत दे दी। हाईकोर्ट ने Mihir Rajesh Shah v. State of Maharashtra के आधार पर माना कि मौखिक जानकारी देना या केस डायरी में उल्लेख करना धारा 47 की आवश्यकता पूरी नहीं करता।

राजस्थान सरकार ने इस आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी।

राज्य सरकार ने राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े आरोपों का हवाला दिया

राजस्थान सरकार की ओर से अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल राजकुमार भास्कर ने दलील दी कि हाईकोर्ट ने राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े गंभीर आरोपों पर विचार किए बिना अत्यधिक तकनीकी आधार पर जमानत दे दी।

उन्होंने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 22(1) और BNSS की धारा 47 का पर्याप्त पालन किया गया था, क्योंकि गिरफ्तारी के तथ्यात्मक आधार हस्ताक्षरित गिरफ्तारी मेमो में दर्ज थे।

उन्होंने Kasireddy Upender Reddy v. State of Andhra Pradesh और State of Karnataka v. Sri Darshan के फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि आरोपी को कोई नुकसान नहीं होने की स्थिति में पर्याप्त अनुपालन को मान्यता दी जानी चाहिए।

वहीं, आरोपी की ओर से तर्क दिया गया कि गिरफ्तारी के लिखित कारण देना अनिवार्य है और आरोपों की गंभीरता इस आवश्यकता के उल्लंघन को उचित नहीं ठहरा सकती।

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बचाव पक्ष ने Pankaj Bansal, Prabir Purkayastha, Vihaan Kumar और Mihir Rajesh Shah के फैसलों का उल्लेख करते हुए कहा कि रिमांड सुनवाई से कम से कम दो घंटे पहले लिखित कारण उपलब्ध कराना आवश्यक है।

गिरफ्तारी के कारण बताना महत्वपूर्ण संवैधानिक सुरक्षा

सुप्रीम कोर्ट ने स्वीकार किया कि गिरफ्तारी के कारणों की जानकारी देना महत्वपूर्ण संवैधानिक और वैधानिक सुरक्षा है। बेंच ने Pankaj Bansal, Prabir Purkayastha और Mihir Rajesh Shah में निर्धारित सिद्धांतों को भी स्वीकार किया।

हालांकि, कोर्ट ने पाया कि वर्तमान मामले में रिकॉर्ड से कानूनी आवश्यकताओं का पर्याप्त और प्रभावी पालन स्पष्ट होता है।

जमानत तय करते समय आरोपों की गंभीरता और राष्ट्रीय सुरक्षा पर उनके प्रभाव सहित प्रासंगिक पहलुओं का उल्लेख करते हुए बेंच ने कहा:

“गिरफ्तारी के कारण बताने के स्वरूप या तरीके से संबंधित अत्यधिक तकनीकी आपत्ति को नियमित जमानत दिलाने वाली ऐसी स्वतः लागू होने वाली सार्वभौमिक चाबी नहीं माना जा सकता, जो जमानत संबंधी न्यायिक सिद्धांतों के मूल मानदंडों को दरकिनार कर दे।”

आरोपी को कोई वास्तविक नुकसान होने का प्रमाण नहीं

सुप्रीम कोर्ट ने गिरफ्तारी से पहले दिए गए नोटिस, विस्तृत और हस्ताक्षरित गिरफ्तारी मेमो तथा आरोपी के भाई को फोन पर दी गई सूचना पर विचार किया।

बेंच ने यह भी ध्यान दिया कि रिमांड सुनवाई के दौरान आरोपी के वकील ने गिरफ्तारी के कारणों की जानकारी को लेकर आपत्ति नहीं की थी। मजिस्ट्रेट ने भी पाया था कि आरोपी को गिरफ्तारी के आधार बताए गए प्रतीत होते हैं।

Sri Darshan के फैसले में अपनाए गए नुकसान संबंधी परीक्षण को लागू करते हुए कोर्ट ने कहा:

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“इस प्रकार अनुच्छेद 22(1) की मूल आवश्यकता का सार्थक रूप से पालन हुआ है और आरोपी को कोई ऐसा नुकसान नहीं हुआ है जिसे प्रमाणित किया जा सके।”

Kasireddy Upender Reddy और Sri Darshan के फैसलों के आधार पर बेंच ने आगे कहा कि संवैधानिक व्यवस्था हर परिस्थिति में लिखित सूचना को ऐसी अनिवार्य औपचारिकता नहीं मानती, जिसके बिना अनुपालन संभव ही न हो।

कोर्ट ने पाया कि हाईकोर्ट ने कथित प्रक्रियागत अनियमितता को जमानत का स्वतः आधार मानकर गलती की और अपराधों की गंभीरता तथा जांच में जुटाई गई सामग्री पर विचार नहीं किया।

हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि उसने मामले के गुण-दोष पर कोई राय व्यक्त नहीं की है।

दो सप्ताह में आत्मसमर्पण करने का निर्देश

सुप्रीम कोर्ट ने राजस्थान सरकार की अपील स्वीकार करते हुए हाईकोर्ट का 18 मई 2026 का जमानत आदेश रद्द कर दिया।

बेंच ने आरोपी की जमानत निरस्त करते हुए उसे दो सप्ताह के भीतर ट्रायल कोर्ट या जांच एजेंसी के समक्ष आत्मसमर्पण करने का निर्देश दिया।

कोर्ट ने कहा कि निर्धारित अवधि में आत्मसमर्पण नहीं करने पर राज्य सरकार कानून के अनुसार उसे हिरासत में लेगी।

केस डिटेल्स

केस टाइटल: State of Rajasthan v. Jhabra Ram

केस नंबर: Criminal Appeal arising out of SLP (Crl.) No. 13374 of 2026

पीठ: जस्टिस एम.एम. सुंदरेश और जस्टिस प्रसन्ना बी. वराले

फैसले की तारीख: 28 अक्टूबर 2026

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