ट्रायल कोर्ट नंबरिंग के स्तर पर ‘मिनी-ट्रायल’ नहीं कर सकते; आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट ने ‘ऑर्डर XXI रूल 58’ के तहत क्लेम पिटीशन दर्ज करने का निर्देश दिया

आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि क्लेम पिटीशन (दावा याचिका) का पंजीकरण एक लिपिकीय कार्य (ministerial act) है और ट्रायल कोर्ट नंबरिंग के चरण में ‘मिनी-ट्रायल’ या मालिकाना हक के सबूत की मांग नहीं कर सकते। जस्टिस रवि नाथ तिलहारी ने अनाकापल्ली के ‘X एडिशनल डिस्ट्रिक्ट एंड सेशंस जज’ द्वारा एक बिना नंबर वाली क्लेम पिटीशन को बार-बार लौटाए जाने के आदेश को रद्द कर दिया। कोर्ट ने निचली अदालत के इस रवैये को न्यायिक अनुशासन के विपरीत करार दिया।

कानूनी मुद्दा इस बात पर केंद्रित था कि क्या ट्रायल कोर्ट की रजिस्ट्री सिविल प्रक्रिया संहिता (CPC) के ‘ऑर्डर XXI रूल 58’ के तहत दायर याचिका को उसकी योग्यता (merits), जैसे कि स्वामित्व का प्रमाण या ‘कॉज़ ऑफ एक्शन’ के आधार पर पंजीकरण से पहले ही बार-बार लौटा सकती है।

हाईकोर्ट ने सिविल रिवीजन पिटीशन को स्वीकार करते हुए ट्रायल कोर्ट को याचिका पंजीकृत करने का निर्देश दिया और जोर दिया कि न्यायिक प्रश्नों का निर्णय पंजीकरण के बाद न्यायिक पक्ष (judicial side) पर होना चाहिए, न कि प्रशासनिक आपत्तियों के रूप में।

मामले की पृष्ठभूमि

याचिकाकर्ताओं ने अनाकापल्ली कोर्ट में E.P.No.57/2019 (जो O.S.No.302/2017 से उत्पन्न हुआ था) के तहत एक क्लेम पिटीशन (G.R.No.360/2026) दायर की थी। वे उन संपत्तियों की कुर्की को हटवाना चाहते थे जिन्हें उन्होंने पैतृक और संयुक्त स्वामित्व वाली बताया था। उनका तर्क था कि उनके पिता (चौथे प्रतिवादी) का संपत्ति में केवल 1/3 हिस्सा था, और कुर्की से उनके अधिकारों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा।

ट्रायल कोर्ट की रजिस्ट्री ने जनवरी और फरवरी 2026 के बीच तीन बार याचिका लौटाई। रजिस्ट्री ने संपत्ति के मालिकाना हक के दस्तावेज, बिना टाइटल के याचिका दायर करने का आधार, कुर्की के संबंध में स्पष्ट ‘कॉज़ ऑफ एक्शन’ की तारीख और पिता के खिलाफ बंटवारे का मुकदमा न करने जैसे सवाल उठाए थे।

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याचिकाकर्ताओं के तर्क

याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश वकील श्री गोली जीवीएस साई ने तर्क दिया कि याचिका को बार-बार लौटाना “दिमाग का इस्तेमाल न करने” (non-application of mind) का परिणाम है। उन्होंने कहा कि ‘ऑर्डर XXI रूल 58 CPC’ के तहत क्लेम याचिका को न स्वीकार करने की केवल दो ही शर्तें हैं: यदि संपत्ति पहले ही बेची जा चुकी हो या यदि अदालत को लगे कि याचिका जानबूझकर देरी करने के लिए दायर की गई है।

वकील ने आगे कहा कि पंजीकरण एक प्रशासनिक प्रक्रिया है और अदालत को इस स्तर पर तथ्यों को साबित करने के लिए नहीं कहना चाहिए था। उन्होंने इस बात पर भी जोर दिया कि टुकड़ों में आपत्तियां उठाने से उनके हितों को नुकसान हुआ क्योंकि निष्पादन अदालत (execution court) ने 22 अप्रैल, 2026 को नीलामी की घोषणा तय कर दी थी।

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हाईकोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणियां

जस्टिस तिलहारी ने पाया कि ट्रायल कोर्ट की कार्रवाई ‘गोररिपति वीरा वेंकट राव बनाम एथलापाका वनजा’ (2025 SCC OnLine AP 50) मामले में दिए गए सिद्धांतों का उल्लंघन थी।

आपत्तियों की प्रकृति पर: हाईकोर्ट ने कहा कि नंबरिंग के स्तर पर मालिकाना हक के दस्तावेज मांगना अनुचित था। कोर्ट ने कहा, “पंजीकरण के समय दावेदार से क्लेम पिटीशन दायर करने की पात्रता दिखाने या अपने अधिकार और शीर्षक स्थापित करने के लिए दस्तावेज जमा करने के लिए नहीं कहा जा सकता।” कोर्ट ने यह भी गौर किया कि ऐसी आपत्तियां उठाकर रजिस्ट्री ने प्रभावी रूप से यह निष्कर्ष निकाल लिया था कि याचिकाकर्ताओं का कोई अधिकार नहीं है, जो कि कानूनन गलत है।

‘मिनी-ट्रायल’ पर: मद्रास हाईकोर्ट के सेलवाराज बनाम कुडनकुलम न्यूक्लियर पावर प्लांट मामले का हवाला देते हुए कोर्ट ने दोहराया:

“यह अदालत पाती है कि इन सभी मामलों में, संबंधित अदालतों ने वाद की नंबरिंग के स्तर पर ‘मिनी-ट्रायल’ आयोजित किए हैं, जो स्पष्ट रूप से ऊपर निर्धारित मापदंडों के साथ असंगत है।”

प्रक्रियात्मक औचित्य पर: हाईकोर्ट ने जोर दिया कि यदि रजिस्ट्री स्पष्टीकरण से संतुष्ट नहीं है, तो उसे याचिका बार-बार लौटाने के बजाय मामले को न्यायिक निर्णय के लिए न्यायाधीश के समक्ष रखना चाहिए। जस्टिस तिलहारी ने टिप्पणी की:

“न्याय चाहने वाले वादी को प्रवेश बिंदु (entry point) पर ही… सीपीसी के प्रावधानों में शामिल न की गई आपत्तियां उठाकर रोकना, उसे अदालत से दूर रखने जैसा है, जिसका परिणाम निश्चित रूप से न्याय वितरण में देरी है।”

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हाईकोर्ट ने इस बात पर गंभीर चिंता व्यक्त की कि ट्रायल कोर्ट ने गोररिपति वीरा वेंकट राव मामले में दिए गए निर्देशों की अनदेखी की।

अदालत का निर्णय

हाईकोर्ट ने सिविल रिवीजन पिटीशन को मंजूर करते हुए निम्नलिखित निर्देश जारी किए:

  1. अनाकापल्ली के ‘X एडिशनल डिस्ट्रिक्ट एंड सेशंस जज’ की अदालत ‘ऑर्डर 21 रूल 58 CPC’ के तहत याचिका को तुरंत पंजीकृत करे।
  2. विशाखापत्तनम के प्रधान जिला न्यायाधीश (Principal District Judge) यह सुनिश्चित करें कि पंजीकरण हो और मामला शीघ्र संबंधित अदालत के समक्ष रखा जाए।
  3. प्रधान जिला न्यायाधीश को जिला अदालत की रजिस्ट्री को “संवेदनशील बनाने” (sensitize) का निर्देश दिया गया ताकि भविष्य में गोररिपति वीरा वेंकट राव के फैसले का पालन सुनिश्चित हो सके।

मामले का विवरण:

  • केस टाइटल: कुमारी कुंद्रापु प्रियंका और अन्य बनाम श्रीमती बंडारू वरलक्ष्मी और 3 अन्य
  • केस नंबर: सिविल रिवीजन पिटीशन नंबर 798/2026 (CIVIL REVISION PETITION No.798 of 2026)
  • पीठ: जस्टिस रवि नाथ तिलहारी
  • दिनांक: 30.04.2026

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