‘किसी समुदाय को निशाना नहीं बनाया’—विवादित इंस्टाग्राम पोस्ट मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने युवक को दी जमानत

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सोशल मीडिया पर विवादित पोस्ट करने के आरोपी मुजफ्फरनगर के एक युवक को बड़ी राहत दी है। अदालत ने आरोपी को जमानत देते हुए महत्वपूर्ण टिप्पणी की कि युवक द्वारा सोशल मीडिया पर इस्तेमाल किए गए नारों में किसी विशेष जाति या समुदाय का नाम नहीं लिया गया था और न ही उन्हें निशाना बनाया गया था।

न्यायमूर्ति राजीव लोचन शुक्ला की पीठ ने 4 मई को नदीम नामक युवक की जमानत याचिका पर यह आदेश पारित किया। नदीम 17 अक्टूबर, 2025 से जेल में बंद था। मामला उसके इंस्टाग्राम हैंडल से जुड़ी एक पोस्ट का था, जिसमें उसने कथित तौर पर पैगंबर मोहम्मद के प्रति अपनी आस्था व्यक्त करते हुए “सिर कटाने” और “सिर काटने” जैसी बातें लिखी थीं।

मामले की सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति शुक्ला ने स्पष्ट किया कि हालांकि उत्तर प्रदेश पुलिस ने इन टिप्पणियों को ‘संवेदनशील’ और ‘आपत्तिजनक’ माना था, लेकिन पोस्ट की सामग्री में किसी स्पष्ट लक्ष्य (Target) का अभाव था। अदालत ने रेखांकित किया कि पोस्ट में लिखा गया पाठ—“I love Mohammed ke liye gardan katwa bhi sakte hain aur kaat bhi sakte hain”—किसी ऐसे समूह का उल्लेख नहीं करता जिसे सीधे खतरे या उकसावे के रूप में देखा जा सके।

बचाव पक्ष के वकील ने दलील दी कि जांच पूरी हो चुकी है और चार्जशीट दाखिल कर दी गई है। उन्होंने यह भी तर्क दिया कि निकट भविष्य में मुकदमा समाप्त होने की संभावना कम है और आरोपी का कोई पुराना आपराधिक इतिहास नहीं है।

दूसरी ओर, सरकारी वकील ने जमानत का कड़ा विरोध किया। अभियोजन पक्ष का कहना था कि इस तरह के नारे “असंवेदनशील” और भड़काऊ हैं। उन्होंने बरेली जिले में हुए पिछले दंगों और संपत्ति के नुकसान का हवाला देते हुए तर्क दिया कि इस तरह की बयानबाजी असामाजिक तत्वों को हिंसा के लिए उकसा सकती है।

कार्यवाही में एक महत्वपूर्ण मोड़ तब आया जब अभियोजन पक्ष ने आरोपी को पिछली हिंसा से जोड़ने की कोशिश की। हालांकि, बाद में राज्य के वकील ने यह स्वीकार किया कि बरेली दंगों में शामिल ‘नदीम खान’ और वर्तमान आवेदक ‘नदीम’ दो अलग-अलग व्यक्ति हैं।

अदालत ने आरोपी के लंबे समय से जेल में होने और उसके साफ रिकॉर्ड को ध्यान में रखते हुए उसे जमानत पर रिहा करने का आदेश दिया। अदालत ने अपने आदेश में कहा, “जांच के दौरान एकत्र की गई सामग्री, आरोपी की भूमिका और इस तथ्य को देखते हुए कि आवेदक 17 अक्टूबर, 2025 से जेल में है और उसका कोई आपराधिक इतिहास नहीं है, उसे जमानत पर रिहा करना उचित समझा जाता है।”

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यह फैसला स्पष्ट करता है कि अदालतें “आपत्तिजनक” सामग्री की विशिष्टता और पिछले मामलों से आरोपी के संबंध की सटीकता को जमानत देने के लिए महत्वपूर्ण आधार मानती हैं।

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