3 साल का बेड रेस्ट मेडिकल सर्टिफिकेट “असत्य”: आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट ने 1,037 दिनों की देरी माफी याचिका को किया खारिज

आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट ने 1,037 दिनों की देरी से दायर एक अपील को खारिज कर दिया है। हाईकोर्ट ने पाया कि तीन साल के निरंतर “बेड रेस्ट” की सलाह देने वाला मेडिकल सर्टिफिकेट “सत्य नहीं” था और इसे विशेष रूप से कानून के प्रावधानों से बचने के लिए तैयार किया गया था। जस्टिस रवि नाथ तिलहारी और जस्टिस बालाजी मेडमल्ली की खंडपीठ ने न्याय प्रशासन में हस्तक्षेप करने के प्रयास के लिए अपीलकर्ता पर ₹25,000 का जुर्माना भी लगाया है।

मामले की पृष्ठभूमि

यह विवाद एक रिकवरी सूट (O.S. No. 556 of 2015) से शुरू हुआ था, जिसे प्रतिवादी ‘श्री गिरी कॉटन ट्रेडर्स’ ने अपीलकर्ता ‘श्री वेंकटेश्वर कॉटन कंपनी’ के खिलाफ दायर किया था। प्रतिवादी ने ₹26,18,552/- की बकाया राशि और ब्याज की वसूली की मांग की थी।

22 दिसंबर, 2022 को गुंटूर के चौथे अतिरिक्त जिला न्यायाधीश की अदालत ने प्रतिवादी के पक्ष में डिक्री पारित की थी। अदालत ने अपीलकर्ता को मूल राशि के साथ वाद की तिथि से डिक्री तक 12% और उसके बाद वसूली होने तक 6% वार्षिक ब्याज देने का आदेश दिया था। अपीलकर्ता ने इस फैसले को 2026 में हाईकोर्ट में चुनौती दी, जिसके कारण 1,037 दिनों की देरी हुई।

देरी माफी के पक्ष में तर्क

देरी माफी के आवेदन (I.A. No. 1 of 2026) में अपीलकर्ता ने तर्क दिया कि वह अपनी रीढ़ की हड्डी की गंभीर समस्या के कारण वकील से संपर्क नहीं कर सकीं। दावा किया गया कि वह 10 जनवरी, 2023 से बीमार थीं और डॉक्टर ने उन्हें पूर्ण बेड रेस्ट की सलाह दी थी।

इस दावे के समर्थन में डॉक्टर कोगांती रविंद्र बाबू द्वारा जारी 4 फरवरी, 2026 का एक मेडिकल सर्टिफिकेट पेश किया गया। इसमें कहा गया था कि अपीलकर्ता को 10 जनवरी, 2023 से सर्टिफिकेट जारी होने की तारीख (4 फरवरी, 2026) तक यानी लगभग तीन साल तक बेड रेस्ट की सलाह दी गई थी।

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हाईकोर्ट का विश्लेषण और मेडिकल दावों का सत्यापन

खंडपीठ ने मेडिकल सलाह पर तुरंत संदेह व्यक्त किया। हाईकोर्ट ने उल्लेख किया, “प्रथम दृष्टया, देरी की माफी के लिए दिखाए गए कारण पर्याप्त हैं या नहीं, इस पर विचार करने से पहले यह अदालत उक्त मेडिकल सर्टिफिकेट की प्रामाणिकता को सत्यापित करना आवश्यक समझती है।”

हाईकोर्ट ने संबंधित डॉक्टर को नोटिस जारी कर हलफनामा दाखिल करने और मेडिकल रिकॉर्ड पेश करने का निर्देश दिया। अपने हलफनामे में डॉक्टर ने कहा कि अपीलकर्ता को जनवरी 2023 में रीढ़ की टीबी (Tuberculosis) का पता चला था। उन्होंने आगे बताया कि जब मरीज फरवरी 2026 में पीठ दर्द की शिकायत लेकर फिर से आई, तो उन्होंने उनके अनुरोध पर सर्टिफिकेट जारी कर दिया। डॉक्टर ने यह भी कहा कि उन्हें इसकी जानकारी नहीं थी कि इसका उपयोग कानूनी कार्यवाही में किया जाएगा।

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पीठ ने डॉक्टर की गवाही में कई विसंगतियों को रेखांकित किया:

  1. डॉक्टर ने दावा किया कि वह विस्तृत मेडिकल रिकॉर्ड नहीं रखते, फिर भी उन्हें तीन साल पहले की तारीखें और दवाएं सटीक रूप से याद थीं।
  2. अपीलकर्ता या डॉक्टर द्वारा निदान या तीन साल के बेड रेस्ट के समर्थन में कोई प्रिस्क्रिप्शन या मेडिकल रिपोर्ट दाखिल नहीं की गई।
  3. डॉक्टर ने स्वीकार किया कि उन्होंने फरवरी 2026 में कोई नई दवा नहीं दी, बल्कि केवल आराम की सलाह दी थी।

हाईकोर्ट ने टिप्पणी की:

“इस अदालत की चिंता उस तरीके को लेकर है जिस तरह से मेडिकल सर्टिफिकेट जारी किया गया है। हमारे मन में कोई संदेह नहीं है कि मेडिकल सर्टिफिकेट केवल वर्तमान मामले में अपील दायर करने में हुई देरी से बचने के उद्देश्य से तैयार किया गया दस्तावेज है, और यह आवेदक द्वारा न्याय के प्रशासन में हस्तक्षेप करने का एक प्रयास है।”

पीठ ने आगे कहा कि डॉक्टर के अपने हलफनामे के आधार पर यह सर्टिफिकेट सत्य नहीं था और 1,037 दिनों की अत्यधिक देरी को माफ करने के लिए इस पर भरोसा नहीं किया जा सकता।

अदालत का फैसला

आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट ने पाया कि देरी का कारण न तो पर्याप्त था और न ही इसे संतोषजनक ढंग से स्थापित किया गया था। परिणामस्वरूप, अदालत ने आई.ए. नंबर 1 ऑफ 2026 को खारिज कर दिया और अपील को समय-सीमा (Limitation) द्वारा वर्जित होने के कारण खारिज कर दिया।

अदालत ने झूठे सर्टिफिकेट के आधार पर देरी माफी मांगने के प्रयास के लिए अपीलकर्ता पर ₹25,000 का जुर्माना लगाया, जिसे आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट कानूनी सेवा समिति में जमा करने का निर्देश दिया गया है।

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हाईकोर्ट ने 75 वर्षीय डॉक्टर के खिलाफ औपचारिक कार्यवाही शुरू करने से परहेज किया, लेकिन एक चेतावनी जारी करते हुए कहा:

“हमारा यह मानना है कि डॉक्टर को मेडिकल सर्टिफिकेट जारी करने में बहुत सावधान और सतर्क रहना चाहिए था, क्योंकि ऐसे सर्टिफिकेट न्याय के प्रशासन और वितरण में प्रतिकूल प्रभाव डाल सकते हैं।”

केस विवरण

केस का शीर्षक: श्री वेंकटेश्वर कॉटन कंपनी बनाम श्री गिरी कॉटन ट्रेडर्स

केस नंबर: अपील सूट नंबर 82 ऑफ 2026

पीठ: जस्टिस रवि नाथ तिलहारी और जस्टिस बालाजी मेडमल्ली

तारीख: 9 अप्रैल, 2026

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