सुप्रीम कोर्ट ने भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 498A के तहत एक ससुर की सजा को रद्द कर दिया है। जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस एन.वी. अंजारिया की पीठ ने कहा कि अभियोजन पक्ष स्वतंत्र साक्ष्यों के माध्यम से दहेज की मांग के आरोप को साबित करने में विफल रहा। अदालत ने स्पष्ट किया कि जब दहेज जैसी गंभीर शिकायतों का उल्लेख शुरुआती पुलिस बयानों में नहीं होता, तो ऐसे में ‘स्वार्थ रखने वाले गवाहों’ (interested witnesses) के विरोधाभासी बयानों पर भरोसा करना “असुरक्षित” है।
यह मामला मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के उस फैसले के खिलाफ दायर तीन आपराधिक अपीलों से जुड़ा है, जिसमें हाईकोर्ट ने पति और सास-ससुर को हत्या (धारा 302 IPC) के आरोपों से बरी कर दिया था, लेकिन क्रूरता (धारा 498A IPC) के लिए उनकी सजा बरकरार रखी थी।
मामले की पृष्ठभूमि
मृतका का विवाह 12 जुलाई 2000 को नगेंद्र सिंह के साथ हुआ था। विवाह के नौ महीने के भीतर ही, 15 अप्रैल 2001 को, वह अपने ससुराल की रसोई में गंभीर रूप से झुलस गई थी। अभियोजन पक्ष का आरोप था कि दहेज में कार की मांग को लेकर उसे प्रताड़ित किया गया और घटना के दिन उसके पति ने उसके मुंह में कपड़ा ठूंसकर, केरोसिन डालकर आग लगा दी।
इलाज के दौरान दो मृत्युपूर्व बयान (Dying Declarations) दर्ज किए गए। पहले बयान में, जो एक कार्यकारी मजिस्ट्रेट द्वारा दर्ज किया गया था, पीड़िता ने ससुराल वालों पर आग लगाने का आरोप लगाया। वहीं, दूसरे बयान में, जो पुलिस उपाधीक्षक द्वारा दर्ज किया गया, उसने कहा कि उसने घरेलू कलह के कारण खुद को आग लगाकर आत्महत्या का प्रयास किया था।
पक्षों की दलीलें
अपीलकर्ता नरेंद्र सिंह (ससुर): उनके वकील ने तर्क दिया कि आरोप सामान्य प्रकृति के थे और पहला मृत्युपूर्व बयान माता-पिता द्वारा सिखाया (tutoring) गया था। उन्होंने यह भी बताया कि वह 32 वर्षों तक सरकारी सेवा में रहे और सजा बरकरार रहने से उन्हें सेवानिवृत्ति के लाभों से हाथ धोना पड़ेगा, जिससे “अपूरणीय क्षति” होगी।
राज्य और शिकायतकर्ता: उन्होंने हाईकोर्ट द्वारा हत्या की धारा 302 के तहत दी गई रिहाई को चुनौती दी। उनका तर्क था कि पहला बयान बिना किसी प्रभाव के दिया गया था और चूंकि मृत्यु शादी के नौ महीने के भीतर हुई थी, इसलिए साक्ष्य अधिनियम की धारा 113B के तहत दहेज मृत्यु का अनुमान लागू होता है।
अदालत का विश्लेषण और टिप्पणियां
पीठ ने साक्ष्यों की जांच करते हुए अभियोजन पक्ष की कहानियों में कई खामियां पाईं:
- विरोधाभासी मृत्युपूर्व बयान: पीठ ने दो अलग-अलग बयानों पर गौर किया। पहले बयान के बारे में अदालत ने कहा: “क्रॉस-एग्जामिनेशन (जिरह) में तहसीलदार ने स्वीकार किया कि अस्पताल में पीड़िता के पास 4-5 लोग मौजूद थे, और उनमें से एक ने पीड़िता को एक खास तरीके से बयान देने के लिए कहा था… यह मृत्युपूर्व बयान की विश्वसनीयता पर संदेह पैदा करता है।”
- पुलिस बयानों में चूक: अदालत ने पाया कि मृतका के परिजनों (PW-1 से PW-5) ने धारा 161 CrPC के तहत दिए गए अपने शुरुआती पुलिस बयानों में दहेज की मांग का जिक्र नहीं किया था। पीठ ने टिप्पणी की: “दहेज की मांग जैसा महत्वपूर्ण तथ्य, जो इतना कष्टदायक हो कि एक युवती की मृत्यु का कारण बन जाए, उसे पहली बार में पुलिस के सामने बयान देते समय नहीं छोड़ा जा सकता था।”
- स्वतंत्र गवाहों का अभाव: पड़ोसी (PW-7 से PW-9) कोर्ट में मुकर गए और उन्होंने संबंधों को मधुर बताया। एक पड़ोसी (PW-10) ने ससुर का पक्ष लेते हुए कहा कि घटना के समय वह बाहर टहल रहे थे।
- धारा 498A का दुरुपयोग: अदालत ने परिवार के सभी सदस्यों को मामले में घसीटने की प्रवृत्ति पर चिंता व्यक्त की। पीठ ने कहा: “ऐसा प्रतीत होता है कि इस मामले में ससुर को केवल इसलिए लपेटा गया क्योंकि वह पति का पिता है, जैसा कि धारा 498A के कुछ मामलों में देखा जाता है।”
अदालत का निर्णय
शरद बिरधीचंद सारदा बनाम महाराष्ट्र राज्य के ‘पंचशील’ सिद्धांतों का हवाला देते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यदि साक्ष्यों से दो निष्कर्ष निकलते हैं, तो आरोपी के पक्ष में जाने वाले निष्कर्ष को ही स्वीकार किया जाना चाहिए।
पीठ ने निष्कर्ष निकाला: “ऐसी स्थिति में, पति या ससुराल वालों को सजा देने के लिए स्वार्थ रखने वाले गवाहों के विरोधाभासी बयानों पर भरोसा करना असुरक्षित है… दहेज की मांग साबित नहीं हुई है।”
सुप्रीम कोर्ट ने राज्य और शिकायतकर्ता की अपीलों को खारिज कर दिया, जबकि ससुर की अपील स्वीकार करते हुए उनकी धारा 498A के तहत सजा रद्द कर दी।
मामले का विवरण
- मामले का शीर्षक: नरेंद्र सिंह बनाम मध्य प्रदेश राज्य (और संबंधित अपीलें)
- केस संख्या: आपराधिक अपील संख्या 302/2014
- पीठ: जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस एन.वी. अंजारिया
- दिनांक: 30 अप्रैल, 2026

