अनुच्छेद 227 के तहत हाईकोर्ट अपीलीय अदालत के रूप में कार्य नहीं कर सकता: सुप्रीम कोर्ट ने NICE भूमि मुआवजे को कम करने वाले आदेश को पलटा

सुप्रीम कोर्ट ने कर्नाटक हाईकोर्ट के उस फैसले को रद्द कर दिया है जिसमें नंदी इंफ्रास्ट्रक्चर कॉरिडोर एंटरप्राइजेज (N.I.C.E.) द्वारा भूस्वामियों को दिए जाने वाले मुआवजे को 1,000 रुपये प्रति वर्ग फुट से घटाकर 500 रुपये प्रति वर्ग फुट कर दिया गया था। जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस एन.वी. अंजारिया की पीठ ने कहा कि हाईकोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 227 के तहत अपने पर्यवेक्षी क्षेत्राधिकार (supervisory jurisdiction) का उल्लंघन किया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि हाईकोर्ट एक अपीलीय अदालत की तरह कार्य नहीं कर सकता और निष्पादन न्यायालय (Executing Court) के एक उचित दृष्टिकोण को बदलकर सरकारी दिशानिर्देशों की अपनी व्याख्या नहीं थोप सकता।

मामले की पृष्ठभूमि

यह विवाद बेंगलुरु के केंगेरी गांव में 3 एकड़ 6 गुंटा भूमि से संबंधित है, जो बेंगलुरु मैसूर इंफ्रास्ट्रक्चर कॉरिडोर प्रोजेक्ट (BMICP) का हिस्सा थी। 1997 में N.I.C.E. और कर्नाटक सरकार के बीच एक समझौता हुआ था। विवादित भूमि मूल रूप से कृषि भूमि थी, जिसे 2004 में औद्योगिक उपयोग के लिए परिवर्तित किया गया था।

2006 में N.I.C.E. द्वारा दायर एक मुकदमे के बाद, 2007 में दोनों पक्षों के बीच एक समझौता ज्ञापन (MOS) हुआ। इस समझौते की धारा (xiii) के तहत, N.I.C.E. ने सहमति व्यक्त की कि यदि वह निर्धारित समय के भीतर भूस्वामियों (डिक्री धारकों) को वैकल्पिक भूमि देने में विफल रहता है, तो वह उस भूमि के लिए “तत्कालीन सरकारी दिशानिर्देश मूल्य” (guideline value) का भुगतान करेगा।

N.I.C.E. द्वारा वैकल्पिक भूमि न दे पाने पर भूस्वामियों ने निष्पादन याचिका दायर की। निष्पादन न्यायालय ने 31 मई, 2012 को 2007 की सरकारी अधिसूचना के आधार पर भूमि का मूल्य 1,000 रुपये प्रति वर्ग फुट निर्धारित किया। हालांकि, N.I.C.E. द्वारा अनुच्छेद 227 के तहत दायर रिट याचिका में हाईकोर्ट ने इसे घटाकर 500 रुपये प्रति वर्ग फुट कर दिया, जिसके बाद दोनों पक्ष सुप्रीम कोर्ट पहुंचे।

पक्षों की दलीलें

भूस्वामियों (डिक्री धारकों) की ओर से: वरिष्ठ अधिवक्ता श्री पी. विश्वनाथ शेट्टी ने तर्क दिया कि निष्पादन न्यायालय ने 2007 की अधिसूचना का सख्ती से पालन किया था। चूंकि भूमि नगर पालिका सीमा के भीतर थी और औद्योगिक उपयोग के लिए परिवर्तित थी, इसलिए इस पर 800 रुपये का आधार मूल्य और स्टेट हाईवे से सटे होने के कारण 25% अतिरिक्त वृद्धि लागू होती थी। उन्होंने कहा कि हाईकोर्ट ने मुआवजे को 50% कम करने के लिए “विशेष निर्देश संख्या 6” का गलत इस्तेमाल किया और सरकारी अधिसूचना की व्याख्या के लिए देरी से राज्य सरकार को पक्षकार बनाया।

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N.I.C.E. (निर्णय ऋणी) की ओर से: वरिष्ठ अधिवक्ता श्री अनिल कौशिक ने तर्क दिया कि यह भूमि अविकसित कृषि भूमि थी और इसका मूल्य “विशेष निर्देश संख्या 1” के अनुसार लगभग 350 रुपये प्रति वर्ग फुट (1.56 करोड़ रुपये प्रति एकड़) होना चाहिए। N.I.C.E. ने तर्क दिया कि हाईकोर्ट ने भूमि को “विकसित” मानकर गलती की और विकास लागतों के लिए इसमें कटौती की जानी चाहिए थी।

न्यायालय का विश्लेषण

सुप्रीम कोर्ट ने मुख्य रूप से इस बात पर विचार किया कि क्या हाईकोर्ट ने अनुच्छेद 227 के तहत अपने अधिकार क्षेत्र का उल्लंघन किया। स्थापित कानूनों का हवाला देते हुए न्यायालय ने कहा:

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“हाईकोर्ट के पास अधीनस्थ अदालतों या न्यायाधिकरणों के अधिकार क्षेत्र की सीमाओं के भीतर लिए गए सभी प्रकार के कठिन या गलत निर्णयों को सुधारने का कोई असीमित विशेषाधिकार नहीं है। इस शक्ति का प्रयोग केवल कर्तव्य के गंभीर उल्लंघन और कानून या न्याय के मौलिक सिद्धांतों के घोर उल्लंघन के मामलों तक ही सीमित है…”

पीठ ने कहा कि हाईकोर्ट ने अनिवार्य रूप से एक अपीलीय अदालत की तरह व्यवहार किया है। फैसले में उल्लेख किया गया है:

“हाईकोर्ट ने वर्तमान मामले में जो किया है उसे स्पष्ट रूप से एक अपीलीय अदालत की क्षमता में कार्य करने के रूप में परिभाषित किया जा सकता है, जो अनुच्छेद 227 के तहत पर्यवेक्षी क्षेत्राधिकार के प्रयोग में अस्वीकार्य है… हाईकोर्ट ने वास्तव में एक अपीलीय अदालत के रूप में कार्य किया, जिसकी कानून में अनुमति नहीं है।”

न्यायालय ने मुकदमे के दौरान अधिसूचना पर स्पष्टीकरण मांगने के लिए राज्य सरकार को पक्षकार बनाने के हाईकोर्ट के निर्णय की भी आलोचना की। कोर्ट ने टिप्पणी की:

“हमारी सुविचारित राय में, इस तरह से पक्षकार बनाने का सहारा नहीं लिया जाना चाहिए था, क्योंकि यह विवाद पूरी तरह से निजी पक्षों के बीच था और एक समझौते पर आधारित था। राज्य को एक ही समय में नियम बनाने वाले, व्याख्या करने वाले और अपने ही अधिसूचना के निर्णायक की स्थिति में रखा गया… इस तरह का दृष्टिकोण हमारी नजर में अनुचित है।”

2007 की अधिसूचना की व्याख्या के संबंध में, सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि निष्पादन न्यायालय का दृष्टिकोण उचित था। कोर्ट ने कहा:

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“मौजूदा तथ्यों में निर्देश संख्या 6 को लागू करने से एक विसंगतिपूर्ण और बेतुका परिणाम निकलेगा, जिसके तहत नगर पालिका (BBMP) सीमा के भीतर परिवर्तित शहरी भूमि का मूल्य कृषि भूमि से भी कम हो जाएगा, जबकि अदालतों ने हमेशा ऐसे परिणामों के खिलाफ चेतावनी दी है।”

अंतिम निर्णय

सुप्रीम कोर्ट ने N.I.C.E. द्वारा दायर अपील को खारिज कर दिया और भूस्वामियों की अपील को स्वीकार कर लिया। न्यायालय ने आदेश दिया:

  1. 12 सितंबर, 2012 के हाईकोर्ट के फैसले को रद्द किया जाता है।
  2. निष्पादन न्यायालय के आदेश को बहाल किया जाता है, जिसके तहत भूमि का मूल्य 1,000 रुपये प्रति वर्ग फुट निर्धारित है, जो कुल 13,72,14,000 रुपये होता है।
  3. N.I.C.E. को शेष राशि, यानी 8,79,95,250 रुपये (पहले जमा किए गए 4.92 करोड़ रुपये के समायोजन के बाद) का भुगतान करने का निर्देश दिया जाता है।
  4. इस शेष राशि पर 20 अगस्त, 2007 से भुगतान तक 6% प्रति वर्ष की दर से ब्याज देय होगा।

मामले का विवरण:

  • केस का शीर्षक: नंदी इंफ्रास्ट्रक्चर कॉरिडोर एंटरप्राइजेज लिमिटेड और अन्य बनाम बी. गुरप्पा नायडू और अन्य
  • केस संख्या: सिविल अपील संख्या 1388/2013 (सिविल अपील संख्या 1354/2013 के साथ)
  • पीठ: जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस एन.वी. अंजारिया
  • दिनांक: 30 अप्रैल, 2026

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