सहमति से बने शारीरिक संबंधों को खराब चरित्र का आधार नहीं माना जा सकता: सुप्रीम कोर्ट ने पुलिस भर्ती में चयन रद्द करने का फैसला पलटा

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि दो वयस्कों के बीच सहमति से बने शारीरिक संबंधों को किसी व्यक्ति के चरित्र पर प्रतिकूल प्रभाव डालने या उसे सरकारी नौकरी से वंचित करने का आधार नहीं बनाया जा सकता। सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस मनोज मिश्रा और जस्टिस मनमोहन की खंडपीठ ने तेलंगाना हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच के उस फैसले को खारिज कर दिया, जिसमें पुलिस कांस्टेबल पद के लिए एक उम्मीदवार के चयन को रद्द करने के निर्णय को सही ठहराया गया था। अपीलकर्ता के चयन को उसके अतीत में दर्ज धोखाधड़ी और आपराधिक धमकी के एक मामले के कारण रद्द कर दिया गया था, जो सहमति से बने एक प्रेम संबंध के टूटने के बाद दर्ज हुआ था और बाद में लोक अदालत के जरिए सुलझा लिया गया था।

मामले की पृष्ठभूमि

अपीलकर्ता को साल 2018 में तेलंगाना राज्य स्तरीय पुलिस भर्ती बोर्ड द्वारा जारी अधिसूचना के तहत ‘स्टिपेंडियरी कैडेट ट्रेनी पुलिस कांस्टेबल’ (SCTPC) के रूप में अस्थायी रूप से चुना गया था। अपने चरित्र सत्यापन फॉर्म में अपीलकर्ता ने पूरी ईमानदारी से खुलासा किया था कि धर्माराम थाने में उनके खिलाफ अतीत में भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 417 (धोखाधड़ी), 420 (धोखाधड़ी और संपत्ति की डिलीवरी के लिए प्रेरित करना) और 506 (criminal intimidation) के तहत एक मामला (अपराध संख्या 190/2014) दर्ज हुआ था।

यह मामला उनके पड़ोसी के साथ लगभग चार साल तक चले प्रेम संबंध से जुड़ा था। जब यह संबंध विवाह में नहीं बदल सका और अपीलकर्ता ने किसी अन्य महिला से शादी कर ली, तो शिकायतकर्ता ने पुलिस में शिकायत दर्ज कराई। शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया कि उसके साथ धोखाधड़ी की गई और अपीलकर्ता के माता-पिता ने उसे धमकी दी। जांच के बाद, पुलिस ने अपीलकर्ता और उसके माता-पिता के खिलाफ धारा 417, 420 और 506/34 के तहत चार्जशीट दायर की। उल्लेखनीय है कि इस मामले में आईपीसी की धारा 376 (दुष्कर्म) का कोई आरोप नहीं था। यह आपराधिक मामला कभी ट्रायल तक नहीं पहुंचा, बल्कि 31 मई, 2015 को पेद्दापल्ली में जेएफसीएम कोर्ट की लोक अदालत के सामने एक समझौते के बाद इसे आपसी सहमति से सुलझा लिया गया था।

इस पुराने मामले के आधार पर, भर्ती बोर्ड ने अपीलकर्ता को कारण बताओ नोटिस जारी किया और 17 अगस्त, 2020 को उनका चयन इस आधार पर रद्द कर दिया कि वह ‘नैतिक अधमता’ (मौरल टर्पीट्यूड) के अपराध में शामिल थे। अपीलकर्ता ने इस निर्णय को तेलंगाना हाईकोर्ट में चुनौती दी। हाईकोर्ट की सिंगल जज बेंच ने 20 नवंबर, 2020 को उनकी रिट याचिका स्वीकार कर ली और चयन रद्द करने का फैसला खारिज करते हुए बोर्ड को निर्देश दिया कि वे अवतार सिंह बनाम यूनियन ऑफ इंडिया व अन्य मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले के प्रकाश में इस मामले पर दोबारा विचार करें।

इस निर्देश के बाद, भर्ती बोर्ड ने 29 जनवरी, 2021 को एक नया आदेश जारी किया और दोबारा अपीलकर्ता का चयन रद्द कर दिया। बोर्ड का दावा था कि लोक अदालत में समझौता होने से आपराधिक इतिहास समाप्त नहीं हो जाता और पुलिस बल जैसी अनुशासित सेवा में आने के लिए उम्मीदवार का चरित्र बेदाग होना चाहिए। अपीलकर्ता ने इस दूसरे आदेश को भी हाईकोर्ट में चुनौती दी। सिंगल जज ने 3 जून, 2024 को रिट याचिका मंजूर की और माना कि आज के युवाओं के बीच शादी से पहले आपसी सहमति से संबंध बनना आम बात है और यह मामला भी सहमति का ही प्रतीत होता है। उन्होंने निर्देश दिया कि यदि अपीलकर्ता का अन्य रिकॉर्ड साफ है, तो उन्हें नियुक्त किया जाए।

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हालांकि, हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच ने 22 नवंबर, 2024 को सिंगल जज के इस फैसले को पलट दिया और निर्णय दिया कि समझौता होने को बेदाग बरी होना नहीं माना जा सकता और अनुशासित बल में उपयुक्तता तय करने का अंतिम अधिकार नियोक्ता (एम्प्लॉयर) के पास ही होता है। इसके बाद अपीलकर्ता ने इस फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर की।

दोनों पक्षों की दलीलें

अपीलकर्ता की ओर से पेश वकील ने तर्क दिया कि उम्मीदवार ने अपने अतीत की पूरी और सच-सच जानकारी दी थी, इसलिए उन पर जानकारी छिपाने का कोई आरोप नहीं लगाया जा सकता। दलील दी गई कि यह शिकायत दो वयस्कों के बीच कई सालों तक चले आपसी सहमति के प्रेम संबंध के टूटने के कारण दर्ज कराई गई थी। धोखाधड़ी के इन आरोपों की कभी भी अदालत में ट्रायल के जरिए जांच नहीं की गई, इसलिए इन्हें चरित्र को खराब मानने का आधार नहीं बनाया जा सकता। इसके अतिरिक्त, धमकी देने के आरोप अपीलकर्ता के माता-पिता पर थे, न कि खुद उन पर। वकील ने जोर दिया कि इस बात का कोई सबूत नहीं है कि लोक अदालत में समझौता करने के लिए शिकायतकर्ता पर कोई दबाव डाला गया था, और बोर्ड ने इस समझौते को अपराध की स्वीकारोक्ति मानकर बड़ी गलती की है।

दूसरी ओर, प्रतिवादियों (राज्य सरकार और भर्ती बोर्ड) ने दलील दी कि पुलिस भर्ती नियमों के तहत नैतिक अधमता के अपराधों में शामिल उम्मीदवार नौकरी के योग्य नहीं होते। राज्य के वकील ने कहा कि पुलिस जांच में अपीलकर्ता और उसके माता-पिता के खिलाफ आरोपों में दम पाया गया था, जो यह दिखाता है कि आरोप गंभीर थे। ओडिशा हाईकोर्ट के कृष्णा जेना व सात अन्य बनाम ओडिशा राज्य मामले के फैसले का हवाला देते हुए प्रतिवादियों ने कहा कि समझौते का मतलब यह नहीं है कि अपराध कभी हुआ ही नहीं था, बल्कि इसका केवल यह अर्थ है कि पीड़िता किसी समाधान पर राजी हो गई। अवतार सिंह मामले का संदर्भ देते हुए उन्होंने कहा कि उम्मीदवार की उपयुक्तता जांचने का अंतिम अधिकार नियोक्ता के पास सुरक्षित है।

उन्होंने कमिश्नर ऑफ पुलिस बनाम मेहर सिंह, स्टेट (यूटी चंडीगढ़) बनाम प्रदीप कुमार व अन्य, और स्टेट ऑफ मध्य प्रदेश व अन्य बनाम अभिजीत सिंह पवार के फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि पुलिस बल एक अनुशासित इकाई है, जहां चरित्र पर मामूली संदेह भी उम्मीदवार को बाहर रखने के लिए काफी है। इसके अलावा उन्होंने सतीश चंद्र यादव बनाम यूनियन ऑफ इंडिया व अन्य मामले का हवाला देकर इस तरह के मामलों में उदार या सहानुभूतिपूर्ण दृष्टिकोण अपनाने का विरोध किया।

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सुप्रीम कोर्ट का विश्लेषण और निष्कर्ष

मामले का विश्लेषण करते हुए, सुप्रीम कोर्ट ने माना कि यद्यपि नियोक्ता को बरी होने के बाद भी उम्मीदवार की उपयुक्तता तय करने का अधिकार है, लेकिन राज्य और उसके अधिकारियों द्वारा इस शक्ति का उपयोग मनमाने ढंग से नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी निर्णय को न्यायिक समीक्षा के दायरे में सही साबित करने और उसे मनमाना न ठहराने के लिए कुछ मानकों का होना जरूरी है:

“राज्य और उसके अधिकारी मनमाने ढंग से काम नहीं कर सकते। इसलिए, जब ऐसे निर्णय की न्यायिक समीक्षा की जाती है, तो यह सुनिश्चित करने के लिए कि इसे मनमाना न माना जाए, हमारी राय में यह प्रदर्शित किया जाना चाहिए कि: (क) रिकॉर्ड पर ऐसी सामग्री मौजूद है जो दर्शाती है कि नैतिक अधमता से जुड़ा अपराध वास्तव में किया गया था; और (ख) बरी होने या बरी किए जाने के बावजूद उम्मीदवार के खिलाफ ठोस सामग्री मौजूद है, भले ही वह तकनीकी खामी, संदेह का लाभ, या गवाहों के मुकर जाने (चाहे उन्हें अपने पक्ष में कर लिया गया हो या डरा-धमकाकर समझौते के लिए मजबूर किया गया हो) जैसे कारणों से बरी होने में सफल रहा हो।”

कोर्ट ने रवींद्र कुमार बनाम उत्तर प्रदेश राज्य व अन्य मामले में दिए गए फैसले का हवाला देते हुए दोहराया कि उपयुक्तता का मूल्यांकन करते समय पद की प्रकृति, मामले के समय और संदर्भ, और बरी होने की पूरी परिस्थितियों का समग्र विश्लेषण किया जाना चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट ने भर्ती बोर्ड के इस दावे को पूरी तरह खारिज कर दिया कि समझौते के जरिए मामले का निस्तारण अपराध की स्वीकारोक्ति है। खंडपीठ ने टिप्पणी की:

“यह कहना कि समझौता करना अपराध स्वीकार करने के समान है, पूरी तरह निराधार है। इसके अलावा, यह कहना कि अपीलकर्ता ने इसलिए समझौता किया क्योंकि वह दोषी था, पूरी तरह से विकृत और तर्कहीन है।”

अदालत ने शादी से पहले आपसी सहमति से बनने वाले संबंधों के सामाजिक संदर्भ को रेखांकित करते हुए स्पष्ट किया कि इसे किसी के चरित्र पर कीचड़ उछालने का जरिया नहीं बनाया जाना चाहिए:

“इसके अतिरिक्त, अधिकारियों को शादी से पहले के संबंधों के बदलते समय और संदर्भ के प्रति संवेदनशील होना चाहिए। आज के समय में ऐसे शादी से पहले के संबंध आम हैं। इसके अलावा, दो सहमति देने वाले अविवाहित वयस्कों के बीच शारीरिक संबंध को अपने आप में उस रिश्ते में शामिल व्यक्ति के चरित्र पर प्रतिकूल राय बनाने का आधार नहीं बनाया जा सकता और न ही बनाया जाना चाहिए। ऐसा कोई कानून नहीं है जो दो सहमति देने वाले अविवाहित वयस्कों को अपनी पसंद का संबंध रखने से रोकता हो।”

खंडपीठ ने यह भी स्पष्ट किया कि जहां कोई प्रेम संबंध कई वर्षों (जैसे इस मामले में चार साल) तक चलता है, वहां कानूनन आपसी सहमति की धारणा मजबूत होती है, जैसा कि सोनू उर्फ सुभाष कुमार बनाम उत्तर प्रदेश राज्य, दीपक गुलाटी बनाम हरियाणा राज्य, और रवीश सिंह राणा बनाम उत्तराखंड राज्य व अन्य जैसे फैसलों में प्रतिपादित किया गया है।

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खंडपीठ ने जोर देकर कहा:

“प्रस्तुत मामले में, अपीलकर्ता और पीड़िता पड़ोसी थे और लगभग चार साल से संबंध में थे। हर प्रेम संबंध शादी में तब्दील नहीं होता। इसलिए, केवल इसलिए कि संबंध विवाह तक नहीं पहुंच सका, यह मानने का कोई आधार नहीं है कि एक पक्ष ने दूसरे को धोखा दिया है।”

सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले के तथ्यों को प्रतिवादियों द्वारा पेश किए गए कमिश्नर ऑफ पुलिस बनाम मेहर सिंह मामले से भी अलग बताया। कमिश्नर ऑफ पुलिस बनाम मेहर सिंह मामले में उम्मीदवार पर लाठी, डंडों और जंजीरों से लैस होकर बस कंडक्टर पर हमला करने और सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने का आरोप था। इसके विपरीत, इस मामले में आरोप पूरी तरह से शादी के वादे से जुड़े प्रेम संबंध तक सीमित थे। चूंकि धोखाधड़ी के आरोपों में पीड़िता का यह बयान सबसे महत्वपूर्ण होता है कि उसे धोखा दिया गया, और पीड़िता ने बिना किसी दबाव या धमकी के खुद लोक अदालत में समझौता कर लिया था, इसलिए बोर्ड के पास अपीलकर्ता के चरित्र पर संदेह करने की कोई ठोस वजह नहीं थी।

सुप्रीम कोर्ट का निर्णय

सुप्रीम कोर्ट ने माना कि स्क्रीनिंग कमेटी द्वारा अपीलकर्ता को नियुक्ति देने से इनकार करने का निर्णय पूरी तरह से मनमाना था। कोर्ट ने हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच के फैसले को खारिज करते हुए सिंगल जज के आदेश को बहाल कर दिया। सुप्रीम कोर्ट ने भर्ती बोर्ड को निर्देश दिया कि वे अपीलकर्ता के मामले पर पुनर्विचार करें और यदि उनका अन्य रिकॉर्ड साफ है, तो उन्हें कांस्टेबल के अगले बैच के साथ ट्रेनिंग के लिए भेजें। इस मामले में किसी भी पक्ष को कोई अदालती खर्च (कॉस्ट) नहीं देने का निर्देश दिया गया।

मामले का विवरण

मामले का शीर्षक: गजुल तिरुपति बनाम तेलंगाना राज्य स्तरीय पुलिस भर्ती बोर्ड और अन्य
वाद संख्या: सिविल अपील संख्या 8059/2026 (एसएलपी (सी) संख्या 018626/2026 से उत्पन्न)
पीठ: जस्टिस मनोज मिश्रा, जस्टिस मनमोहन
निर्णय की तिथि: 21 मई, 2026

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