सेल्फ-ड्रॉ में प्रक्रियात्मक कमियां संपत्ति के अधिकारों को नहीं छीन सकतीं: दिल्ली हाईकोर्ट ने 77 वर्षीय बुजुर्ग महिला को फ्लैट आवंटन की प्रक्रिया पूरी करने का RCS को दिया निर्देश

दिल्ली हाईकोर्ट ने रजिस्ट्रार ऑफ कोऑपरेटिव सोसाइटीज (RCS) को एक 77 वर्षीय बुजुर्ग महिला के पक्ष में फ्लैट के नियमितीकरण (रेगुलराइजेशन) और आवंटन पर निर्णय लेने का निर्देश दिया है । जस्टिस प्रतिभा एम. सिंह और जस्टिस मधु जैन की खंडपीठ ने RCS को संबंधित दस्तावेजों का सत्यापन करने और दो महीने के भीतर दिल्ली विकास प्राधिकरण (DDA) को अपनी सिफारिशें भेजने का आदेश दिया है । यह फैसला उन स्थापित न्यायिक मिसालों पर आधारित है जहां हाउसिंग सोसायटियों द्वारा खुद से कराए गए लॉटरी ड्रॉ (सेल्फ-ड्रॉ) से जुड़ी प्रक्रियात्मक तकनीकी कमियों को दरकिनार कर दिया गया था, ताकि वैध सदस्यों के कानूनी संपत्ति अधिकारों की रक्षा की जा सके ।

मामले की पृष्ठभूमि

याचिकाकर्ता श्रीमती निर्मला देवी, जो कि एक 77 वर्षीय वरिष्ठ नागरिक हैं, उन्होंने पीतमपुरा, दिल्ली में स्थित वीनस अपार्टमेंट्स (जाटव कोऑपरेटिव ग्रुप हाउसिंग सोसाइटी लिमिटेड) के फ्लैट संख्या E-209 (दूसरी मंजिल) के नियमितीकरण और आवंटन की मांग को लेकर हाईकोर्ट का रुख किया था ।

इस फ्लैट का इतिहास 14 जून, 1998 से जुड़ा है, जब सोसाइटी ने लॉटरी का ड्रॉ आयोजित किया था और श्री शिव राज सिंह कर्दम के पक्ष में शेयर सर्टिफिकेट जारी किया था, जिन्होंने बाद में संपत्ति का कब्जा ले लिया था । 4 अगस्त, 2003 को श्री कर्दम ने याचिकाकर्ता के पक्ष में एक पावर ऑफ अटॉर्नी निष्पादित की, जिससे उन्हें फ्लैट का प्रबंधन करने की अनुमति मिली और इसमें बिक्री के अधिकार सहित कई अन्य नियम व शर्तें शामिल थीं ।

हालांकि सोसाइटी ने याचिकाकर्ता को फ्लैट को लीजहोल्ड से फ्रीहोल्ड में बदलने के लिए DDA के समक्ष आवेदन करने के लिए ‘अनापत्ति प्रमाण पत्र’ (NOC) जारी कर दिया था, लेकिन उनका औपचारिक आवंटन अब तक रुका हुआ था । 12 जून, 2018 और 17 नवंबर, 2025 को अभ्यावेदन देने के बावजूद उन्हें RCS से शुरुआत में कोई जवाब नहीं मिला । आखिरकार, 27 अप्रैल, 2026 को RCS से एक पत्र प्राप्त हुआ जिसमें कहा गया कि फ्लैट उन्हें आवंटित नहीं किया जा सकता क्योंकि लॉटरी का शुरुआती ड्रॉ एक ‘सेल्फ-ड्रॉ’ था, जिसे RCS की वैधानिक मंजूरी के बिना आयोजित किया गया था ।

पक्षों की दलीलें

याचिकाकर्ता के वकील ने तर्क दिया कि उनकी सदस्यता पर कोई संदेह नहीं है और सोसाइटी पहले ही ट्रांसफर के लिए NOC जारी कर चुकी है । आगे यह दलील दी गई कि लॉटरी के सेल्फ-ड्रॉ का मुद्दा दिल्ली के तत्कालीन उपराज्यपाल द्वारा 20 सितंबर, 2011 को लिए गए एक नीतिगत निर्णय द्वारा पहले ही नियमित किया जा चुका है । इस बात के समर्थन में याचिकाकर्ता ने हाईकोर्ट द्वारा राजीव सक्सेना व अन्य बनाम रजिस्ट्रार ऑफ कोऑपरेटिव सोसाइटीज व अन्य (2025) और श्रीमती जनक कुमारी गांधी व अन्य बनाम रजिस्ट्रार ऑफ कोऑपरेटिव सोसाइटीज व अन्य के मामलों में दिए गए पिछले फैसलों पर गहरा भरोसा जताया ।

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हाइब्रिड मोड के माध्यम से हुई सुनवाई के दौरान RCS, सोसाइटी और DDA सहित प्रतिवादियों का प्रतिनिधित्व उनके संबंधित वकीलों ने किया । RCS की प्रशासनिक कार्रवाई द्वारा उठाई गई मुख्य बाधा यह थी कि सोसाइटी द्वारा स्वतंत्र रूप से कराए गए लॉटरी ड्रॉ के लिए पहले से कोई आधिकारिक मंजूरी नहीं ली गई थी ।

कोर्ट का विश्लेषण

कोर्ट ने कानूनी ढांचे की समीक्षा की और राजीव सक्सेना मामले में स्थापित नजीर का विस्तार से उल्लेख किया । उस मामले में हाईकोर्ट ने टिप्पणी की थी कि जब RCS लंबे समय तक मंजूरी देने में विफल रहा, तो कई सहकारी समितियों ने खुद ही सेल्फ-ड्रॉ आयोजित कर लिए थे । कोर्ट ने तत्कालीन उपराज्यपाल श्री तेजेन्द्र खन्ना के 20 सितंबर, 2011 के निर्देश को रेखांकित किया, जिन्होंने स्पष्ट रूप से कई सोसायटियों के लिए सेल्फ-ड्रॉ के नियमितीकरण को मंजूरी दी थी और कहा था:

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“जाहिर तौर पर, प्रक्रियात्मक कमी के अलावा कोई अन्य अनियमितता शामिल नहीं थी।”

खंडपीठ ने राजीव सक्सेना के फैसले की टिप्पणियों को दोहराया, जिसमें इस बात पर जोर दिया गया था कि हाउसिंग सोसायटियों और नियामक के बीच प्रक्रियात्मक देरी के कारण सदस्यों को नुकसान नहीं भुगतना चाहिए:

“प्रस्तुत किए गए तथ्यों और रिकॉर्ड पर रखे गए दस्तावेजों से जो स्पष्ट तस्वीर उभरती है वह यह है कि याचिकाकर्ताओं को पिछले दो दशकों से उनके संपत्ति अधिकारों के वैध हक से वंचित रखा गया है। गलती, यदि कोई थी, तो वह केवल हाउसिंग सोसाइटी और RCS की हो सकती थी, याचिकाकर्ताओं की नहीं।”

कोर्ट ने आगे यह विचार अपनाया कि:

“RCS को बार-बार तकनीकी बारीकियों पर अड़े रहने के बजाय इस मामले में एक व्यावहारिक दृष्टिकोण अपनाना चाहिए था।”

कोर्ट का निर्णय

पुरानी मिसालों को वर्तमान तथ्यों पर लागू करते हुए और यह देखते हुए कि सोसाइटी को इस आवंटन पर कोई आपत्ति नहीं है, हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता और सोसाइटी को 4 जून, 2026 को सुबह 11:30 बजे RCS के समक्ष उपस्थित होने का निर्देश दिया ।

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RCS को दस्तावेजों का सत्यापन करने और उद्धृत फैसलों को ध्यान में रखते हुए दो महीने की अवधि के भीतर आवंटन पर अंतिम निर्णय लेने का आदेश दिया गया है । यदि दस्तावेजों या शुल्क आदि में कोई कमी पाई जाती है, तो याचिकाकर्ता और सोसाइटी को उसे सुधारने की अनुमति दी जानी चाहिए ।

निर्धारित दो महीने की समय सीमा के भीतर RCS द्वारा DDA को अपनी सिफारिश भेजने के बाद, याचिकाकर्ता को संपत्ति को लीजहोल्ड से फ्रीहोल्ड में बदलने के लिए DDA में आवेदन करने की अनुमति होगी । इसके बाद DDA के लिए आवश्यक औपचारिकताएं पूरी करने के बाद कन्वर्जन आवेदन पर आगे की प्रक्रिया बढ़ाना अनिवार्य है । कोर्ट ने याचिकाकर्ता को यह स्वतंत्रता भी दी है कि यदि प्रतिवादियों में से कोई भी निर्देशों को लागू करने में विफल रहता है, तो वह दोबारा अदालत का रुख कर सकती हैं ।

मामले का विवरण

मामले का शीर्षक: श्रीमती निर्मला देवी बनाम रजिस्ट्रार ऑफ कोऑपरेटिव सोसाइटीज व अन्य

वाद संख्या: डब्ल्यू.पी.(सी) 19351/2025 एवं सीएम अप्लिकेशन 33945/2026

पीठ: जस्टिस प्रतिभा एम. सिंह और जस्टिस मधु जैन

निर्णय की तिथि: 19 मई, 2026

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