कनाडा में जीवित मिली कथित मृत महिला, हाईकोर्ट ने हत्या की जांच वाली याचिका खारिज की

पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट ने एक महिला की कथित गुमशुदगी और हत्या की नए सिरे से जांच कराने की मांग वाली याचिका को खारिज कर दिया है। पुलिस की जांच में यह साफ हो गया है कि महिला पूरी तरह सुरक्षित है और इस समय कनाडा में रह रही है।

जस्टिस सूर्य प्रताप सिंह ने महिला के मामा द्वारा दायर इस याचिका को खारिज करते हुए उनके दावों को “कोरी कल्पना” करार दिया। याचिका में आरोप लगाया गया था कि जर्मनी में रहने वाले एनआरआई पिता ने अपनी बेटी की हत्या कर दी है। हाईकोर्ट ने कहा कि जब महिला जीवित है, तो किसी पर भी हत्या का मुकदमा चलाने या जांच को आगे बढ़ाने का सवाल ही नहीं उठता।

पुलिस जांच और वीडियो कॉल से हुई पुष्टि

अदालत का यह फैसला पुलिस द्वारा की गई गहन जांच के बाद आया है। राज्य सरकार की तरफ से पेश डिप्टी एडवोकेट जनरल जे एस थिंड ने कोर्ट को बताया कि पुलिस ने पासपोर्ट रिकॉर्ड और इमिग्रेशन डेटा के जरिए महिला के सफर की पूरी जानकारी जुटाई। इससे साबित हुआ कि महिला ने खुद अपने नाम से पासपोर्ट बनवाया था और वह भारत से कनाडा गई थी।

इसके अलावा, पुलिस अधिकारियों की मौजूदगी में एक वीडियो कॉल भी आयोजित की गई थी, जिसमें महिला के दो बेहद करीबी रिश्तेदारों ने उससे बात की और उसकी पहचान की पुष्टि की।

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पारिवारिक विवाद और गायब होने का आरोप

यह कानूनी विवाद तब शुरू हुआ जब महिला के मामा ने हाईकोर्ट का रुख किया। याचिका में मांग की गई थी कि लुधियाना जिले से बाहर के वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों की एक विशेष जांच टीम (SIT) बनाई जाए। याचिकाकर्ता का दावा था कि जनवरी 2013 में उसकी बहन और भांजी रहस्यमयी परिस्थितियों में लापता हो गई थीं। आरोप था कि इससे कुछ महीने पहले, अक्टूबर 2012 में उसके जीजा ने परिवार को सूचित किए बिना उसकी भांजी की शादी कर दी थी।

याचिकाकर्ता के अनुसार, उसकी बहन की शादी 1978 में हुई थी और बाद में उनकी एक बेटी हुई। साल 1985 में उसका जीजा जर्मनी जाकर बस गया, जहां उसने पहली पत्नी और बेटी को बताए बिना दूसरी शादी कर ली। जब इस दूसरी शादी का पता चला, तो पति-पत्नी के रिश्तों में कड़वाहट आ गई। साल 2013 में मां-बेटी के लापता होने के बाद, याचिकाकर्ता के पिता ने एक शिकायत दर्ज कराई, जिसे बाद में हत्या की एफआईआर (FIR) में बदल दिया गया।

पुलिस की निष्क्रियता के आरोप खारिज

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याचिकाकर्ता की तरफ से पेश वरिष्ठ वकील जसदीप एस गिल ने दलील दी कि बीते 13 वर्षों में पुलिस का रवैया बेहद ढीला रहा है। उन्होंने आरोप लगाया कि चूंकि आरोपी अमीर एनआरआई हैं, इसलिए पुलिस ने उनके खिलाफ कोई कड़ी कार्रवाई नहीं की। आरोपी पिछले नौ साल से पुलिस की गिरफ्त से बाहर रहे और उन्हें घोषित अपराधी भी करार दे दिया गया था।

हालांकि, हाईकोर्ट ने पुलिस की कार्रवाई में किसी भी तरह की कोताही या पक्षपात की बात से इनकार किया। जस्टिस सिंह ने कहा कि जांच एजेंसी ने महिला का पता लगाने के लिए हर संभव और जरूरी कदम उठाए हैं। जब यह साबित हो चुका है कि महिला जीवित है और कनाडा में है, तो हत्या के सभी आरोप पूरी तरह आधारहीन हो जाते हैं। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि अब इस मामले में किसी नई जांच या एसआईटी के गठन की कोई जरूरत नहीं है।

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