अभियोजन स्वीकृति की वैधता का परीक्षण ट्रायल के दौरान होगा, धारा 482 के तहत नहीं: इलाहाबाद हाईकोर्ट

इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने अभियोजन स्वीकृति (प्रॉसिक्यूशन सैंक्शन) को चुनौती देने के मामले में एक महत्वपूर्ण निर्णय दिया है। जस्टिस सुभाष विद्यार्थी की एकल पीठ ने स्पष्ट किया कि अभियोजन स्वीकृति में विवेक का इस्तेमाल न होने (नॉन-एप्लिकेशन ऑफ माइंड) या प्रक्रियात्मक देरी के आधार पर उसकी कथित अवैधता से जुड़े मुद्दों का निपटारा मुकदमे (ट्रायल) के दौरान पेश किए गए साक्ष्यों के आधार पर ही होना चाहिए। ऐसे मामलों को दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की धारा 482 या भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस) की धारा 528 के तहत बार-बार नहीं उठाया जा सकता।

सीबीआई अभियोजन का सामना कर रहे भारतीय स्टेट बैंक (एसबीआई) के एक पूर्व बैंक शाखा प्रबंधक की याचिका खारिज करते हुए हाईकोर्ट ने उस पर 50,000 रुपये का जुर्माना (कॉस्ट) भी लगाया। कोर्ट ने कहा कि डिवीजन बेंच द्वारा याचिका खारिज किए जाने के बाद उसी आदेश को दोबारा चुनौती देने की याचिकाकर्ता की कोशिश ‘फोरम शॉपिंग’ और ‘कानून की प्रक्रिया का घोर दुरुपयोग’ है।

मामले की पृष्ठभूमि

इस आपराधिक मामले की शुरुआत 12 फरवरी 2018 को भारतीय स्टेट बैंक, वाराणसी के क्षेत्रीय प्रबंधक प्रकाश चौधरी द्वारा दर्ज कराई गई एक लिखित शिकायत से हुई थी। शिकायत में आरोप लगाया गया था कि मेसर्स शिवांग कारपेट प्राइवेट लिमिटेड (शत-प्रतिशत निर्यात उन्मुख कालीन विनिर्माता इकाई) और उसके निदेशकों—रंजीत सिंह और अभिषेक सिंह—ने बैंक के साथ धोखाधड़ी की और 15 निर्यात बिलों के एवज में 7,40,07,994 रुपये की धनराशि का गबन किया।

सीबीआई द्वारा 30 सितंबर 2021 को दाखिल आरोप-पत्र (चार्जशीट) के अनुसार, कंपनी ने वर्ष 2015-16 और 2016-17 के दौरान तत्कालीन स्टेट बैंक ऑफ बीकानेर एंड जयपुर (जिसका बाद में एसबीआई में विलय हो गया) से 19 निर्यात बिलों के बदले 6,56,38,093 रुपये की बिल खरीद सीमा हासिल की थी। इनमें से 12 बिलों के संबंध में जरूरी दस्तावेज और बिल ऑफ लैडिंग बैंक में जमा नहीं किए गए थे। बैंक की आंतरिक जांच में शिपिंग कंपनी ने खुलासा किया कि उन्होंने वे 12 बिल ऑफ लैडिंग कभी जारी ही नहीं किए थे। जांच में यह सामने आया कि बैंक से अग्रिम धनराशि लेने के लिए फर्जी दस्तावेजों का इस्तेमाल किया गया और बैंक की मंजूरी के बिना माल किसी अन्य खरीदार को भेज दिया गया। 15 अप्रैल 2017 को यह ऋण खाता एनपीए (गैर-निष्पादित परिसंपत्ति) घोषित कर दिया गया।

याचिकाकर्ता हेमंत कुमार प्रसाद, जो 1 फरवरी 2013 से 19 जुलाई 2016 तक शाखा प्रबंधक के पद पर तैनात थे, को तत्कालीन उप-प्रबंधक राजीव कुमार सहित पांच अन्य लोगों के साथ आरोपी बनाया गया। सीबीआई का आरोप था कि शाखा प्रबंधक रहते हुए याचिकाकर्ता ने केवल फोटोकॉपी के आधार पर 12 फर्जी निर्यात बिलों का निस्तारण किया और बैंकिंग चैनल के माध्यम से विदेशी खरीदारों तक निर्यात दस्तावेज पहुंचाना सुनिश्चित नहीं किया। याचिकाकर्ता के खिलाफ मुकदमा चलाने की अभियोजन स्वीकृति 29 सितंबर 2021 को एसबीआई के महाप्रबंधक (नेटवर्क-3) एवं नियुक्ति प्राधिकारी द्वारा प्रदान की गई थी।

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इसके बाद, विशेष न्यायाधीश सीबीआई कोर्ट संख्या 2, लखनऊ ने 12 दिसंबर 2022 को भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 120-बी सहपठित धारा 420, 467, 468, 471 तथा भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 की धारा 13(2) सहपठित धारा 13(1)(डी) के तहत संज्ञान लिया। ट्रायल कोर्ट ने 23 जनवरी 2026 को याचिकाकर्ता की उन्मोचन (डिस्चार्ज) अर्जी खारिज कर दी और 20 फरवरी 2026 को आरोप तय कर दिए। इसके बाद, याचिकाकर्ता ने अभियोजन स्वीकृति को अवैध घोषित करने के लिए 10 जुलाई 2026 को अर्जी दी, जिसे ट्रायल कोर्ट ने 2 सितंबर 2026 को खारिज करते हुए माना कि स्वीकृति की वैधता और उससे याचिकाकर्ता को हुए नुकसान की जांच ट्रायल के दौरान साक्ष्यों के आधार पर अंतिम फैसले के समय की जाएगी।

पक्षों की दलीलें

हाईकोर्ट के समक्ष याचिकाकर्ता के वकील ने दलील दी कि 29 सितंबर 2021 का अभियोजन स्वीकृति आदेश बिना विवेक का इस्तेमाल किए पारित किया गया था। यह आदेश 27 महीने की भारी देरी के बाद जारी हुआ, जबकि कानूनी तौर पर इसके लिए अधिकतम चार महीने की सीमा तय है। याचिकाकर्ता के वकील ने ट्रायल कोर्ट में अभियोजन स्वीकृति प्राधिकारी (पीडब्लू-1) के बयान और जिरह का हवाला देते हुए कहा कि फाइल विजिलेंस विभाग के जरिए आई थी और आदेश उनके निजी कंप्यूटर पर टाइप नहीं हुआ था। इससे यह स्पष्ट होता है कि उन्होंने केवल एक पूर्व-तैयार आदेश पर हस्ताक्षर किए थे। इसके अलावा, याचिकाकर्ता ने यह भी तर्क दिया कि ट्रायल कोर्ट ने अभियोजन स्वीकृति से जुड़े मूल रिकॉर्ड तलब करने की उसकी मांग को नजरअंदाज कर दिया।

दूसरी तरफ, स्टेट बैंक ऑफ इंडिया और सीबीआई के वकीलों ने याचिका की पोषणीयता (मेंटेनेबिलिटी) पर प्रारंभिक आपत्ति जताई। उन्होंने बताया कि याचिकाकर्ता ने पहले भी इसी अभियोजन स्वीकृति आदेश को आपराधिक विविध रिट याचिका संख्या 5368/2026 के जरिए चुनौती दी थी, जिसे हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच 16 जून 2026 को ही खारिज कर चुकी है। प्रतिवादियों ने एसबीआई की विजिलेंस नियमावली और डीओपीटी (कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग) के कार्यालय ज्ञापनों का हवाला देते हुए कहा कि स्वीकृति का निर्णय पूरी तरह से निर्धारित सतर्कता नियमों और केंद्रीय सतर्कता आयोग (सीवीसी) की सलाह के अनुरूप लिया गया था।

हाईकोर्ट का विश्लेषण

अभियोजन स्वीकृति में देरी के आधार पर आदेश रद्द करने की याचिकाकर्ता की मांग को खारिज करते हुए जस्टिस सुभाष विद्यार्थी ने सुप्रीम कोर्ट के विजय राजमोहन बनाम सीबीआई (2023) मामले के फैसले का हवाला दिया:

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“39. …तीन महीने की अवधि, जिसे कानूनी परामर्श के लिए एक महीने और बढ़ाया जा सकता है, अनिवार्य है। हालांकि, इस अनिवार्य आवश्यकता का पालन न होने का परिणाम केवल इसी आधार पर आपराधिक कार्यवाही को रद्द करना नहीं होगा। देरी के लिए सक्षम प्राधिकारी जवाबदेह होगा और सीवीसी अधिनियम की धारा 8(1)(एफ) के तहत सीवीसी द्वारा की जाने वाली न्यायिक समीक्षा और प्रशासनिक कार्रवाई के अधीन होगा।”

अभियोजन स्वीकृति को चुनौती देने से जुड़े कानूनी ढांचे का विश्लेषण करते हुए हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों का संदर्भ दिया। प्रकाश सिंह बादल बनाम पंजाब राज्य (2007) मामले का उल्लेख करते हुए कोर्ट ने उद्धृत किया:

“48. इस मामले में स्वीकृति अधिनियम से संबंधित अपराधों से जुड़ी थी। अभियोजन स्वीकृति के अभाव और विवेक का इस्तेमाल न करने के कारण उसकी कथित अवैधता के बीच स्पष्ट अंतर है। पहला सवाल शुरुआती चरण में ही उठाया जा सकता है, लेकिन दूसरा सवाल ऐसा है जिसे ट्रायल के दौरान ही उठाया जाना चाहिए।”

इस सिद्धांत की पुष्टि करते हुए कोर्ट ने दिनेश कुमार बनाम अध्यक्ष, एयरपोर्ट अथॉरिटी ऑफ इंडिया (2012) मामले का भी उल्लेख किया:

“10. हमारे विचार में, जहां स्वीकृति आदेश मौजूद है, वहां उसकी अवैधता को विभिन्न आधारों पर उठाया जा सकता है, जैसे कि स्वीकृति प्राधिकारी के समक्ष सामग्री की अनुपलब्धता, स्वीकृति प्राधिकारी का पूर्वाग्रह, या ऐसी स्वीकृति किसी ऐसे प्राधिकारी द्वारा दिया जाना जो सक्षम या अधिकृत नहीं था। उपरोक्त आधार केवल उदाहरण स्वरूप हैं, संपूर्ण नहीं। स्वीकृति की अवैधता के ऐसे सभी आधार उसी श्रेणी में आएंगे जैसे कि विवेक का इस्तेमाल न करने के कारण स्वीकृति की अवैधता का आधार—एक ऐसी श्रेणी जिसे इस न्यायालय द्वारा प्रकाश सिंह बादल, (2007) 1 एससीसी 1 में प्रतिपादित किया गया था, जिसकी चुनौती हमेशा ट्रायल के दौरान ही उठाई जा सकती है।”

इसके साथ ही कोर्ट ने निदेशक, केंद्रीय जांच ब्यूरो बनाम अशोक कुमार असवाल (2015) के फैसले को रेखांकित किया:

“15. …इस न्यायालय ने यह निर्धारित किया है कि स्वीकृति आदेश की वैधता, यदि आदेश मौजूद है, तो उसे आरोपी को हुई हानि या नुकसान (प्रेजुडिस) की कसौटी पर परखा जाना चाहिए, जो कि अनिवार्य रूप से एक तथ्यात्मक प्रश्न है। इसलिए, इसे ट्रायल के दौरान निर्धारित करने के लिए छोड़ दिया जाना चाहिए, न कि दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 की धारा 482 के क्षेत्राधिकार के तहत या संविधान के अनुच्छेद 226/227 के तहत कार्यवाही में।”

एसबीआई विजिलेंस मैनुअल और डीओपीटी के 1 मार्च 2019 तथा 2 दिसंबर 2020 के कार्यालय ज्ञापनों का परीक्षण करते हुए हाईकोर्ट ने माना कि जहां नियुक्ति प्राधिकारी सीवीसी की सलाह के विरुद्ध जाकर स्वीकृति देने से इनकार करना चाहता है, वहां वह खुद ऐसा निर्णय नहीं ले सकता; उसे असहमति का मामला अंतिम निर्णय के लिए डीओपीटी को भेजना अनिवार्य होता है। इसलिए, सक्षम प्राधिकारी द्वारा सतर्कता विभाग और सीवीसी की सलाह के आधार पर कार्य करना बिना विवेक के आदेश पारित करना नहीं माना जा सकता।

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हाईकोर्ट ने इस बात पर कड़ी आपत्ति जताई कि 16 जून 2026 को डिवीजन बेंच द्वारा रिट याचिका खारिज किए जाने के बाद याचिकाकर्ता ने वही मांग ट्रायल कोर्ट और फिर एकल पीठ के समक्ष दोहराई। कोर्ट ने कहा कि ट्रायल कोर्ट डिवीजन बेंच के आदेश से बंधा था और उसने यह तय करके कोई गलती नहीं की कि इस सवाल का निपटारा ट्रायल के अंत में साक्ष्यों के आधार पर होगा।

कोर्ट का निर्णय

हाईकोर्ट ने माना कि डिवीजन बेंच के आदेश के खिलाफ याचिकाकर्ता के पास केवल सुप्रीम कोर्ट जाने का विकल्प था। उसी मांग को पहले ट्रायल कोर्ट और फिर एकल पीठ के समक्ष उठाना स्पष्ट तौर पर फोरम शॉपिंग और कानूनी प्रक्रिया का दुरुपयोग है।

इन टिप्पणियों के साथ हाईकोर्ट ने याचिका खारिज कर दी और याचिकाकर्ता पर 50,000 रुपये का जुर्माना लगाया। यह राशि 30 दिनों के भीतर हाईकोर्ट की रजिस्ट्री में जमा कराने का निर्देश दिया गया है। तय समय में राशि जमा न करने पर संबंधित जिलाधिकारी (कलेक्टर) इसे भू-राजस्व के बकाए की तरह तीन महीने के भीतर वसूल करेंगे। हाईकोर्ट के सीनियर रजिस्ट्रार को यह राशि उत्तर प्रदेश सरकार के महिला एवं बाल विकास विभाग द्वारा संचालित राजकीय बालिका गृह (चिल्ड्रन्स होम गर्ल्स), लखनऊ को भेजने का निर्देश दिया गया है।

मामले का विवरण

मामले का शीर्षक: हेमंत कुमार प्रसाद बनाम प्रॉसिक्यूशन सैंक्शनिंग अथॉरिटी जरिए जनरल मैनेजर एसबीआई लखनऊ एवं 3 अन्य

वाद संख्या: धारा 528 बीएनएसएस संख्या 6813/2026

पीठ: जस्टिस सुभाष विद्यार्थी

निर्णय की तिथि: 13 अक्टूबर 2026

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