सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को केरल के पूर्व मुख्यमंत्री पिनराई विजयन और अन्य के खिलाफ CMRL-Exalogic भ्रष्टाचार मामले में चल रही जांच पर एक सप्ताह के लिए रोक लगा दी। कोर्ट ने विजयन और अन्य आरोपियों को एफआईआर दर्ज करने के आदेश के खिलाफ केरल हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच में अपील करने की अनुमति भी दे दी।
जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की अवकाशकालीन बेंच ने केरल हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें विजयन और अन्य लोगों को सिंगल जज के फैसले के खिलाफ अपील आगे बढ़ाने की अनुमति देने से इनकार किया गया था।
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि मामले में दर्ज एफआईआर बनी रहेगी, लेकिन अगले एक सप्ताह तक उसके आधार पर कोई जांच नहीं की जाएगी। इस दौरान याचिकाकर्ता हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच के समक्ष अपनी अपील और अंतरिम राहत की मांग कर सकते हैं।
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने इस बात पर भी सवाल उठाया कि जब राज्य सरकार पहले ही प्रारंभिक जांच के लिए विशेष जांच दल (SIT) गठित कर चुकी थी, तब हाईकोर्ट ने प्रवर्तन निदेशालय (ED) की ओर से भेजी गई जानकारी के आधार पर तत्काल एफआईआर दर्ज करने का आदेश क्यों दिया।
बिना सुनवाई का मौका दिए एफआईआर दर्ज करने के आदेश पर सवाल
सुप्रीम कोर्ट ने इस बात पर नाराजगी जताई कि हाईकोर्ट के सिंगल जज ने पिनराई विजयन और अन्य प्रभावित लोगों का पक्ष सुने बिना उनके खिलाफ एफआईआर दर्ज करने का निर्देश दे दिया।
बेंच ने कहा कि ईडी से जानकारी मिलने के बाद राज्य सरकार ने मामले की प्रारंभिक जांच के लिए एसआईटी गठित की थी। ऐसे में जांच दल की रिपोर्ट का इंतजार किए बिना एफआईआर दर्ज कराने के लिए हाईकोर्ट का रुख करना और तत्काल आदेश पारित किया जाना सवाल खड़े करता है।
कोर्ट ने इस कानूनी प्रश्न पर भी विचार किया कि क्या धन शोधन निवारण अधिनियम (PMLA) की धारा 66(2) के तहत ईडी द्वारा किसी राज्य की जांच एजेंसी को जानकारी भेजे जाने पर एफआईआर दर्ज करना अनिवार्य हो जाता है।
जस्टिस बागची ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के विजय मदनलाल चौधरी फैसले को इस तरह नहीं समझा जा सकता कि ईडी की ओर से जानकारी मिलते ही राज्य की एजेंसी हर स्थिति में एफआईआर दर्ज करने के लिए बाध्य हो जाए।
बेंच ने स्पष्ट किया कि ईडी द्वारा भेजी गई सामग्री भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत जांच का आधार बनती है या नहीं, इसका परीक्षण संबंधित जांच एजेंसी को कानून के अनुसार करना होगा।
सुप्रीम कोर्ट ने ईडी को दूसरी जांच एजेंसियों के अधिकार क्षेत्र में दखल नहीं देने की चेतावनी भी दी।
कोर्ट ने कहा कि ईडी को मनी लॉन्ड्रिंग से जुड़े अपराधों की जांच करने का पूरा अधिकार है। वह पूर्व मुख्यमंत्रियों के खिलाफ भी जांच कर सकती है। हालांकि, उसे अपनी वैधानिक शक्तियों की सीमाओं में रहकर काम करना होगा और दूसरी एजेंसियों के अधिकार क्षेत्र में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए।
बेंच ने यह भी स्पष्ट किया कि उसे एफआईआर दर्ज किए जाने या किसी मामले की जांच से आपत्ति नहीं है। सवाल यह है कि क्या निर्धारित कानूनी प्रक्रिया का पालन किया गया और क्या मौजूदा परिस्थितियों में हाईकोर्ट का तत्काल एफआईआर दर्ज करने का निर्देश देना उचित था।
सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट में अपील का रास्ता खोला
सुप्रीम कोर्ट के सामने एक महत्वपूर्ण सवाल यह भी था कि क्या विजयन और अन्य आरोपी सिंगल जज के आदेश को चुनौती दे सकते हैं, जबकि वे उस मूल याचिका में पक्षकार नहीं थे जिसमें एफआईआर दर्ज करने का निर्देश दिया गया था।
इससे पहले केरल हाईकोर्ट की जस्टिस के. नटराजन और जस्टिस जॉनसन जॉन की डिवीजन बेंच ने 15 अक्टूबर को विजयन और अन्य लोगों को अपील आगे बढ़ाने की अनुमति देने से इनकार कर दिया था।
डिवीजन बेंच ने कहा था कि संबंधित लोग एफआईआर दर्ज करने के न्यायिक आदेश को चुनौती देने के बजाय एफआईआर को ही चुनौती दे सकते हैं।
हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने इस आधार से असहमति जताई।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यह ऐसा मामला नहीं है जिसमें राज्य की जांच एजेंसी ने अपने स्तर पर एफआईआर दर्ज की हो। यहां एफआईआर दर्ज करने का निर्देश हाईकोर्ट के आदेश पर दिया गया था और वह आदेश प्रभावित लोगों को सुने बिना पारित किया गया था।
इसलिए विजयन और अन्य याचिकाकर्ताओं को उस आदेश के खिलाफ अपील करने का अवसर मिलना चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच का आदेश रद्द करते हुए याचिकाकर्ताओं को अपनी अपील के गुण-दोष के आधार पर सुनवाई कराने और अंतरिम राहत मांगने की अनुमति दी।
साथ ही स्पष्ट किया कि सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियां केवल अपील करने के अधिकार तक सीमित हैं। इन्हें भ्रष्टाचार के आरोपों के गुण-दोष पर कोई राय नहीं माना जाएगा।
क्या है CMRL-Exalogic मामला?
यह मामला कोचीन मिनरल्स एंड रूटाइल लिमिटेड (CMRL) और एक्सालॉजिक सॉल्यूशंस प्राइवेट लिमिटेड के बीच हुए वित्तीय लेनदेन में कथित अनियमितताओं से जुड़ा है।
एक्सालॉजिक सॉल्यूशंस पूर्व मुख्यमंत्री पिनराई विजयन की बेटी वीणा थैक्कंडियिल की कंपनी है।
ईडी ने दावा किया था कि उसकी जांच में कुछ ऐसी सामग्री सामने आई है जिससे वित्तीय लेनदेन में कथित अनियमितताओं का संकेत मिलता है। ईडी ने यह जानकारी केरल पुलिस को भेजी थी।
राज्य सरकार ने तत्काल एफआईआर दर्ज करने के बजाय सामग्री की प्रारंभिक जांच के लिए एसआईटी गठित कर दी।
इसके बाद वकील के.एम. शाजहान ने केरल हाईकोर्ट का रुख किया और एफआईआर दर्ज करने का निर्देश देने की मांग की।
शाजहान पूर्व मुख्यमंत्री वी.एस. अच्युतानंदन के विपक्ष के नेता रहने के दौरान उनके अतिरिक्त निजी सचिव भी रह चुके हैं।
9 अक्टूबर को हाईकोर्ट के सिंगल जज ने शाजहान की याचिका स्वीकार करते हुए राज्य के सतर्कता एवं भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो (VACB) को विजयन, उनकी बेटी वीणा, दामाद मोहम्मद रियास और अन्य लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने का आदेश दिया।
इस आदेश में कथित भ्रष्टाचार में संदिग्ध अन्य लोगों में निखिल पी., हसन वारिश, शैजल मुहम्मद और नंदूलाल एम. भी शामिल थे।
विजयन और अन्य प्रभावित लोगों ने आदेश के खिलाफ हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच में अपील की, लेकिन उन्हें अपील आगे बढ़ाने की अनुमति नहीं मिली। इसके बाद उन्होंने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
सुप्रीम कोर्ट में क्या दलीलें दी गईं?
पिनराई विजयन की ओर से पेश सीनियर एडवोकेट सिद्धार्थ लूथरा ने दलील दी कि हाईकोर्ट के सिंगल जज ने उनके मुवक्किल को सुनवाई का अवसर दिए बिना एफआईआर दर्ज करने का आदेश पारित कर दिया।
उन्होंने सवाल उठाया कि क्या PMLA की धारा 66(2) के तहत ईडी द्वारा भेजी गई जानकारी राज्य की जांच एजेंसी के लिए एफआईआर दर्ज करने का अनिवार्य निर्देश बन जाती है।
दूसरी ओर, शिकायतकर्ता के.एम. शाजहान के वकील ने तर्क दिया कि सुप्रीम कोर्ट के विजय मदनलाल चौधरी फैसले के अनुसार, ईडी की ओर से संबंधित जानकारी मिलने पर राज्य की एजेंसी एफआईआर दर्ज करने के लिए बाध्य है।
ईडी की ओर से पेश वकील जोहेब हुसैन ने कहा कि एजेंसी द्वारा भेजी गई सामग्री से संज्ञेय अपराध होने का पता चलता है।
सुप्रीम कोर्ट ने इस दलील पर गौर करते हुए कहा कि सामग्री में संज्ञेय अपराध का संकेत होना और उस आधार पर एफआईआर दर्ज करने की कानूनी बाध्यता होना दो अलग प्रश्न हैं।
बेंच ने कहा कि भ्रष्टाचार के मामले में ईडी की सूचना के आधार पर एफआईआर दर्ज करना अनिवार्य है या नहीं, इस कानूनी सवाल की जांच आवश्यक है।
कोर्ट ने यह भी सवाल उठाया कि जब राज्य सरकार ने प्रारंभिक जांच के लिए एसआईटी गठित कर दी थी, तब शिकायतकर्ता ने उसकी रिपोर्ट का इंतजार किए बिना हाईकोर्ट में एफआईआर दर्ज कराने की मांग क्यों की।
एक सप्ताह तक जांच पर रोक, हाईकोर्ट करेगा अपील पर सुनवाई
सुप्रीम कोर्ट ने अपने अंतिम निर्देश में विजयन और अन्य याचिकाकर्ताओं को केरल हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच के समक्ष अपील आगे बढ़ाने की अनुमति दे दी।
बेंच ने कहा कि याचिकाकर्ता कानून के अनुसार अंतरिम राहत की मांग भी कर सकते हैं।
उन्हें यह अवसर देने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने संबंधित एफआईआर के आधार पर होने वाली जांच पर एक सप्ताह की रोक लगा दी।
हालांकि, कोर्ट ने स्पष्ट किया कि उसने भ्रष्टाचार के आरोपों की सत्यता या ईडी द्वारा भेजी गई जानकारी से जुड़े मूल कानूनी विवाद का अंतिम फैसला नहीं किया है।
इस मामले में विजयन, वीणा और रियास की ओर से सीनियर एडवोकेट सिद्धार्थ लूथरा और एन. हरिहरन के साथ एडवोकेट मयंक जैन, गिल्बर्ट जॉर्ज कोरिया, मधुर जैन और अर्पित गोयल पेश हुए।
