अपुष्ट वीडियो, बिना अनिवार्य हलफनामे की शिकायत और अस्पष्ट आरोपों के आधार पर निलंबन सही नहीं: इलाहाबाद हाईकोर्ट

इलाहाबाद हाईकोर्ट (लखनऊ पीठ) के जस्टिस पंकज भाटिया ने अधिशासी अधिकारी नीलव शल्या के निलंबन आदेश को रद्द करते हुए कहा कि बिना अनिवार्य हलफनामे (अफेडेविट) के दर्ज शिकायत, सोशल मीडिया के अपुष्ट वीडियो और बिना किसी विशिष्ट आरोप के विभागीय निलंबन की कार्रवाई कायम नहीं रखी जा सकती। कोर्ट ने याची की रिट याचिका को स्वीकार करते हुए निर्देश दिया कि विभागीय जांच को नियमानुसार जल्द से जल्द पूरा किया जाए।

मामले की पृष्ठभूमि

याची नीलव शल्या की शुरुआती नियुक्ति नगर पंचायत, जिला मेरठ में अधिशासी अधिकारी के पद पर हुई थी। इसके बाद उन्हें नगर पंचायत, हरदोई में तैनात किया गया और बाद में पदोन्नति भी दी गई। 17 जून 2026 को सोशल मीडिया पर वायरल एक वीडियो के आधार पर अनुशासनात्मक कार्रवाई लंबित रखते हुए उन्हें निलंबित कर दिया गया था।

वायरल वीडियो में कथित तौर पर भूसा और चारे की आपूर्ति के टेंडर के सिलसिले में रिश्वत लेते हुए दिखाया गया था। याची का तर्क था कि जिस टेंडर का जिक्र किया जा रहा है, वह साल 2024 में जारी हुआ था, जबकि उन्होंने हरदोई में अधिशासी अधिकारी के रूप में कार्यभार इसके काफी बाद में संभाला था।

यह शिकायत 6 अप्रैल 2026 को मुख्यमंत्री पोर्टल पर प्रतिवादी संख्या 4 अजय कुमार द्वारा दर्ज कराई गई थी। याची के अनुसार, अजय कुमार नगर पंचायत, अलीगढ़ में पूर्व लिपिक था, जिसकी सेवाएं फर्जी मार्कशीट के आधार पर नियुक्ति पाने के मामले में खुद याची ने अनुशासनिक प्राधिकारी के रूप में कार्रवाई करते हुए समाप्त की थीं।

शिकायत के बाद उप-जिलाधिकारी (एसडीएम) द्वारा एक प्रारंभिक जांच कराई गई, जिसमें कहा गया कि प्रथम दृष्टया वीडियो में दिखता व्यक्ति याची जैसा प्रतीत होता है और वीडियो की सत्यता की जांच कराई जानी चाहिए। इसी रिपोर्ट के आधार पर विभागीय कार्रवाई शुरू करने के निर्देश दिए गए और 2 जुलाई 2026 को याची को चार्जशीट दी गई, जिसमें एकमात्र आरोप यह लगाया गया कि वह वायरल वीडियो में दिखाई दे रहे हैं।

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पक्षों की दलीलें

याची की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता गौरव मेहरोत्रा और अधिवक्ता अकबर अहमद ने तर्क दिया कि राज्य सरकार के 1 अगस्त 1997 और 29 जनवरी 2024 के शासनादेशों के तहत किसी भी सरकारी कर्मचारी के खिलाफ शिकायत के साथ हलफनामा देना अनिवार्य है। इस मामले में शिकायतकर्ता की ओर से कोई हलफनामा जमा नहीं किया गया था। इसके अलावा, चार्जशीट में रिश्वत लेने का कोई स्पष्ट या विशिष्ट आरोप शामिल नहीं था, जिससे आरोप पूरी तरह अस्पष्ट हो जाता है।

राज्य सरकार के स्थायी अधिवक्ता ने जिलाधिकारी और निदेशक (स्थानीय निकाय) से प्राप्त लिखित अनुदेश प्रस्तुत किए। इसमें प्रारंभिक जांच और निलंबन की प्रक्रिया का तो ब्योरा दिया गया था, लेकिन इस पर चुप्पी साधी गई कि शिकायतकर्ता से अनिवार्य हलफनामा लिया गया था या नहीं।

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मामले में नगर पालिका परिषद द्वारा एक इमलीडमेंट (पक्षकार बनाने) की अर्जी भी दाखिल की गई थी। कोर्ट ने माना कि चूंकि याची केंद्रीयकृत सेवा (सेंट्रलाइज्ड सर्विसेज) का कर्मचारी है, इसलिए आवेदनकर्ता न तो आवश्यक पक्षकार है और न ही उचित पक्षकार। हालांकि, मामले में देरी से बचने के लिए कोर्ट ने उनके वकील को भी सुन लिया।

हाईकोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणियां

हाईकोर्ट ने पाया कि सरकारी कर्मचारियों के खिलाफ शिकायत दर्ज कराने के संबंध में लागू शासनादेशों के तहत हलफनामा प्रस्तुत करने की वैधानिक आवश्यकता का पालन नहीं किया गया था। इसके साथ ही कोर्ट ने रेखांकित किया कि एसडीएम और जिलाधिकारी दोनों की रिपोर्ट में वीडियो की सत्यता का स्वतंत्र सत्यापन करने की बात कही गई थी, लेकिन नियमों के अनुसार ऐसा कोई सत्यापन कभी किया ही नहीं गया।

याची को दी गई चार्जशीट की समीक्षा करते हुए कोर्ट ने टिप्पणी की:

“याची को दिए गए चार्जशीट पर विचार करते हुए, जिसमें याची पर रिश्वत लेने का कोई विशिष्ट या स्पष्ट आरोप नहीं लगाया गया है, प्रथम दृष्टया निलंबन का कारण ही गायब है। साथ ही, यह निलंबन एक ऐसी शिकायत पर आधारित है जिसके साथ शासनादेशों के तहत निर्धारित हलफनामा भी संलग्न नहीं था। इस प्रकार, याची के खिलाफ पारित निलंबन आदेश प्रथम दृष्टया वैधानिक दिशानिर्देशों के विपरीत है और बिना किसी विशिष्ट आरोप के जारी किया गया है।”

कोर्ट का निर्णय

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 17 जून 2026 के निलंबन आदेश को रद्द करते हुए रिट याचिका को स्वीकार कर लिया। कोर्ट ने निर्देश दिया कि अनुशासनात्मक कार्रवाई जारी रहेगी और याची के सहयोग के अधीन इसे शीघ्रता से समाप्त किया जाएगा।

कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि इस अवधि के दौरान याची से काम लिया जाए या नहीं, इसका निर्णय लेना उत्तर प्रदेश सरकार और संबंधित अधिकारियों के क्षेत्राधिकार में है। इसके अलावा, कोर्ट ने साफ किया कि उसकी इन टिप्पणियों का विभागीय जांच के अंतिम परिणाम पर गुण-दोष के आधार पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा।

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मामले का विवरण

मामले का शीर्षक: नीलव शल्या बनाम उत्तर प्रदेश राज्य, अतिरिक्त मुख्य सचिव/प्रमुख सचिव, नगर विकास विभाग व 3 अन्य
वाद संख्या: रिट ए संख्या 6758/2026
पीठ: जस्टिस पंकज भाटिया
निर्णय की तिथि: 21 जुलाई 2026

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