हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने चेक बाउंस के एक मामले में दोषसिद्धि को बरकरार रखते हुए कहा है कि यदि आरोपी ने शिकायतकर्ता से जिरह के दौरान यह सवाल नहीं उठाया कि चेक में लिखी गई जानकारी शिकायतकर्ता ने स्वयं भरी थी, तो वह पुनरीक्षण याचिका में पहली बार इस दलील के आधार पर राहत नहीं मांग सकता। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि केवल इस आधार पर आरोपी अपनी जिम्मेदारी से मुक्त नहीं हो सकता कि चेक पर हस्ताक्षर उसके हैं, लेकिन बाकी विवरण किसी दूसरे व्यक्ति ने भरे हैं।
जस्टिस राकेश कैंथला ने 14 अक्टूबर 2026 को ₹75,000 के चेक बाउंस मामले में आरोपी की आपराधिक पुनरीक्षण याचिका खारिज कर दी। हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट और सेशन कोर्ट के फैसलों को बरकरार रखते हुए कहा कि आरोपी चेक से जुड़ी कानूनी धारणा को गलत साबित करने के लिए पर्याप्त साक्ष्य प्रस्तुत नहीं कर सका।
क्या था पूरा मामला?
शिकायतकर्ता के अनुसार, उसकी और आरोपी की पिछले करीब दस वर्षों से दोस्ती थी। अक्टूबर 2010 में आरोपी ने अपने कारोबार के लिए ₹75,000 उधार मांगे और एक महीने के भीतर रकम लौटाने का वादा किया।
शिकायतकर्ता ने भरोसा करते हुए उसे पैसे दे दिए। हालांकि, निर्धारित समय बीतने के बाद जब रकम वापस मांगी गई, तो आरोपी ने यूको बैंक की राजगढ़ शाखा का ₹75,000 का चेक दिया।
चेक बैंक में जमा करने पर पर्याप्त राशि नहीं होने के कारण बाउंस हो गया।
इसके बाद शिकायतकर्ता ने आरोपी को रजिस्टर्ड डाक से कानूनी नोटिस भेजा, लेकिन आरोपी ने नोटिस लेने से इनकार कर दिया और लिफाफा वापस लौट आया।
मामले की सुनवाई के बाद सिरमौर जिले के राजगढ़ स्थित न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी ने 28 नवंबर 2013 को आरोपी को नेगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स एक्ट की धारा 138 के तहत दोषी ठहराया।
ट्रायल कोर्ट ने आरोपी को छह महीने के साधारण कारावास की सजा सुनाई और शिकायतकर्ता को ₹75,000 मुआवजा देने का आदेश दिया। मुआवजा नहीं देने पर तीन महीने के अतिरिक्त साधारण कारावास का प्रावधान भी किया गया।
आरोपी ने इस फैसले को चुनौती दी, लेकिन नाहन स्थित सिरमौर के सेशन जज ने 30 जुलाई 2014 को उसकी अपील खारिज कर दी।
इसके बाद आरोपी ने हाईकोर्ट में आपराधिक पुनरीक्षण याचिका दाखिल की।
आरोपी की दलील: खाली चेक का गलत इस्तेमाल हुआ
हाईकोर्ट में आरोपी की ओर से एडवोकेट एन.के. तोमर ने दलील दी कि शिकायतकर्ता ने यह साबित नहीं किया कि उसके पास ₹75,000 उधार देने की आर्थिक क्षमता थी।
उन्होंने कहा कि चेक पर किए गए हस्ताक्षर और चेक में भरी गई अन्य जानकारी की लिखावट अलग-अलग थी।
आरोपी का पक्ष था कि इससे स्पष्ट होता है कि खाली चेक का गलत इस्तेमाल किया गया था।
दूसरी ओर, शिकायतकर्ता की ओर से एडवोकेट सी.एस. ठाकुर ने कहा कि जिरह के दौरान शिकायतकर्ता के बयान की विश्वसनीयता पर कोई असर नहीं पड़ा।
उन्होंने यह भी दलील दी कि आरोपी ने चेक से जुड़ी कानूनी धारणा को गलत साबित करने के लिए कोई साक्ष्य पेश नहीं किया।
राज्य सरकार की ओर से अतिरिक्त महाधिवक्ता जितेंद्र शर्मा ने कहा कि विवाद निजी पक्षों के बीच है, इसलिए राज्य की ओर से कोई दलील प्रस्तुत नहीं की जानी है।
जिरह में नहीं उठाई गई दलील पुनरीक्षण में स्वीकार नहीं की जा सकती
हाईकोर्ट ने मामले की जांच करते हुए सबसे पहले पुनरीक्षण अदालत के अधिकार क्षेत्र पर विचार किया।
सुप्रीम कोर्ट के कुंटेगौड़ा बनाम थुरुबैया मामले के फैसले का उल्लेख करते हुए कोर्ट ने कहा कि पुनरीक्षण अदालत अपीलीय अदालत की तरह काम नहीं करती।
कोर्ट ने पाया कि शिकायतकर्ता ने अपने बयान में स्पष्ट कहा था कि आरोपी ने उसे चेक दिया था। जिरह के दौरान उसके इस बयान को चुनौती नहीं दी गई।
जस्टिस कैंथला ने टिप्पणी की,
“आरोपी ने पुनरीक्षण याचिका में यह दलील दी कि चेक में अन्य विवरण शिकायतकर्ता ने स्वयं भरे थे, लेकिन जिरह के दौरान शिकायतकर्ता के सामने यह बात रखी ही नहीं गई थी।”
हाईकोर्ट ने रविंद्र कुमार शर्मा बनाम असम राज्य और मुद्दसानी वेंकट नरसैया बनाम मुद्दसानी सरोजना के फैसलों का उल्लेख करते हुए कहा कि ऐसी स्थिति में इस दलील को पुनरीक्षण के स्तर पर स्वीकार नहीं किया जा सकता।
चेक पर हस्ताक्षर स्वीकार हों तो कानूनी धारणा लागू होगी
हाईकोर्ट ने कहा कि आरोपी ने चेक पर अपने हस्ताक्षर होने से इनकार नहीं किया था।
ऐसी स्थिति में नेगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स एक्ट की धारा 118 और 139 के तहत यह कानूनी धारणा लागू होती है कि चेक किसी वैध देनदारी के भुगतान के लिए जारी किया गया था।
कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के बीर सिंह बनाम मुकेश कुमार मामले के फैसले का उल्लेख करते हुए कहा,
“केवल यह तथ्य कि चेक आरोपी ने स्वयं नहीं भरा था, उसे कानूनी जिम्मेदारी से मुक्त करने के लिए पर्याप्त नहीं है।”
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि चेक पर हस्ताक्षर स्वीकार करने के बाद केवल अलग लिखावट का हवाला देकर आरोपी चेक बाउंस की जिम्मेदारी से नहीं बच सकता।
शिकायतकर्ता की आर्थिक क्षमता पर सवाल भी खारिज
आरोपी ने शिकायतकर्ता की आर्थिक स्थिति पर भी सवाल उठाया था।
उसका कहना था कि शिकायतकर्ता ने स्वयं स्वीकार किया था कि हिमाचल प्रदेश राज्य सहकारी बैंक से लिया गया उसका ₹5 लाख का ऋण खाता अनियमित हो गया था।
आरोपी के अनुसार, इस तथ्य से शिकायतकर्ता की ₹75,000 उधार देने की क्षमता पर संदेह पैदा होता है।
हालांकि, हाईकोर्ट ने यह दलील स्वीकार नहीं की।
कोर्ट ने कहा कि रिकॉर्ड से यह स्पष्ट नहीं होता कि शिकायतकर्ता का बैंक खाता कब अनियमित हुआ था। इसलिए केवल इस आधार पर यह नहीं माना जा सकता कि उसके पास आरोपी को ₹75,000 देने की आर्थिक क्षमता नहीं थी।
सुप्रीम कोर्ट के टेढ़ी सिंह बनाम नारायण दास महंत मामले के फैसले का उल्लेख करते हुए हाईकोर्ट ने कहा,
“आरोपी ने कानूनी नोटिस का कोई जवाब देकर शिकायतकर्ता की आर्थिक क्षमता पर सवाल नहीं उठाया था। इसलिए अब वह यह नहीं कह सकता कि शिकायतकर्ता के पास उधार देने की आर्थिक क्षमता नहीं थी।”
कोर्ट ने यह भी पाया कि आरोपी ने दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 313 के तहत दर्ज अपने बयान में यह नहीं बताया कि उसके हस्ताक्षर वाला चेक शिकायतकर्ता के पास कैसे पहुंचा।
कानूनी नोटिस लेने से इनकार करना भी नोटिस की तामील माना जाएगा
हाईकोर्ट ने आरोपी द्वारा कानूनी नोटिस स्वीकार नहीं किए जाने के मुद्दे पर भी विचार किया।
रिकॉर्ड के अनुसार, शिकायतकर्ता ने रजिस्टर्ड डाक से नोटिस भेजा था, लेकिन आरोपी ने उसे लेने से इनकार कर दिया था।
कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के एन. परमेश्वरन उन्नी बनाम जी. कन्नन मामले के फैसले का उल्लेख करते हुए कहा कि ऐसी स्थिति में नोटिस की तामील कानूनी रूप से हुई मानी जाएगी।
इसलिए आरोपी नोटिस प्राप्त नहीं होने का लाभ नहीं ले सकता।
छह महीने की जेल की सजा को हाईकोर्ट ने उचित माना
हाईकोर्ट ने आरोपी को सुनाई गई छह महीने के साधारण कारावास की सजा पर भी विचार किया।
कोर्ट ने कहा कि नेगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स एक्ट की धारा 138 का उद्देश्य ऐसे मामलों में रोकथाम का प्रभाव पैदा करना भी है। इस दृष्टि से छह महीने की सजा अत्यधिक नहीं कही जा सकती।
हाईकोर्ट ने यह भी माना कि केवल चेक की मूल राशि के बराबर ₹75,000 मुआवजा देना पर्याप्त नहीं था।
हालांकि, सजा की अपर्याप्तता को चुनौती देते हुए कोई अपील दाखिल नहीं की गई थी। इसलिए हाईकोर्ट ने इस मुद्दे पर हस्तक्षेप नहीं किया।
आरोपी ने मुआवजा नहीं देने पर अतिरिक्त कारावास के आदेश को भी चुनौती दी थी।
इस संबंध में हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के के.ए. अब्बास बनाम साबू जोसेफ और आर. मोहन बनाम ए.के. विजय कुमार के फैसलों का उल्लेख करते हुए कहा कि मुआवजा नहीं देने की स्थिति में कारावास का आदेश देना कानून के विरुद्ध नहीं है।
हाईकोर्ट ने पुनरीक्षण याचिका खारिज की
सभी तथ्यों और कानूनी पहलुओं पर विचार करने के बाद हाईकोर्ट ने पाया कि ट्रायल कोर्ट और सेशन कोर्ट के निष्कर्षों में हस्तक्षेप करने का कोई आधार नहीं है।
जस्टिस राकेश कैंथला ने आरोपी की आपराधिक पुनरीक्षण याचिका खारिज करते हुए चेक बाउंस मामले में दोषसिद्धि और सजा को बरकरार रखा।
कोर्ट ने संबंधित रिकॉर्ड निचली अदालतों को वापस भेजने का भी निर्देश दिया।
केस डिटेल्स
- केस टाइटल: कृष्ण कुमार बनाम विजेंद्र कुमार एवं अन्य
- केस नंबर: आपराधिक पुनरीक्षण याचिका संख्या 364/2014
- बेंच: जस्टिस राकेश कैंथला
- फैसले की तारीख: 14 अक्टूबर 2026
