पेंशन एरियर पर तीन साल की सीमा नहीं थोप सकती केंद्र सरकार, पूर्व सैनिकों के हक में हाईकोर्ट का फैसला

जम्मू-कश्मीर और लद्दाख हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि यदि किसी सेवानिवृत्त सैनिक की डिसेबिलिटी पेंशन (दिव्यांगता पेंशन) की पात्रता कानूनी रूप से स्वीकार कर ली जाती है, तो केंद्र सरकार उसके पिछले बकाए (एरियर) को केवल तीन साल तक सीमित नहीं रख सकती है।

जस्टिस सिंधु शर्मा और जस्टिस शहजाद अज़ीम की खंडपीठ ने आर्म्ड फोर्सेज ट्रिब्यूनल (एएफटी) के एक पुराने फैसले को बरकरार रखा है, जिसमें सेना के एक पूर्व नायक को जीवनभर के लिए 20 प्रतिशत के बजाय 50 प्रतिशत डिसेबिलिटी पेंशन दिए जाने को मंजूरी दी गई थी। हालांकि, हाईकोर्ट ने अपने 4 जून के निर्णय में एएफटी के 10 नवंबर 2022 के आदेश में आंशिक संशोधन किया है। अदालत ने निर्देश दिया है कि सैनिक को इस बढ़ी हुई पेंशन का लाभ 1 जनवरी 1996 के बजाय 1 अक्टूबर 2001 से दिया जाए।

यह पूरा मामला पूर्व नायक रंजित सिंह से जुड़ा है। रंजित सिंह सितंबर 1984 में भारतीय सेना में शामिल हुए थे और सेवा का निर्धारित कार्यकाल पूरा करने के बाद साल 2001 में सेवानिवृत्त हुए थे। सेवानिवृत्ति के समय रिलीज मेडिकल बोर्ड ने उन्हें ‘बायलेटरल सेंसरी न्यूरल डेफनेस’ (सुनने की क्षमता प्रभावित होना) से पीड़ित पाया था। बोर्ड ने उनकी दिव्यांगता को दो साल के लिए 20 प्रतिशत आंका था, जिसके बाद उन्हें डिसेबिलिटी पेंशन प्रदान की जा रही थी।

केंद्र सरकार की आपत्तियां और सुप्रीम कोर्ट के फैसले

केंद्र सरकार ने ट्रिब्यूनल के इस निर्णय को अदालत में चुनौती दी थी। सरकार का मुख्य तर्क यह था कि चूंकि रंजित सिंह अपनी सेवा अवधि पूरी करने के बाद सेवानिवृत्त हुए थे और उन्हें चिकित्सा आधार पर समय से पहले बाहर नहीं किया गया था, इसलिए वे फरवरी 2018 के नीतिगत सर्कुलर के अनुसार केवल 1 जनवरी 2016 से ही बढ़ी हुई पेंशन के पात्र हैं। इसके साथ ही केंद्र ने यह दलील भी दी कि एरियर का भुगतान ट्रिब्यूनल में आवेदन दायर करने की तारीख से किया जाना चाहिए, न कि उनकी सेवानिवृत्ति की तारीख से।

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हाईकोर्ट ने केंद्र की इन सभी दलीलों को खारिज कर दिया। अदालत ने कहा कि सेवाकाल पूरा करने वाले जवानों को राउंडिंग ऑफ (डिसेबिलिटी पेंशन की दर को पूर्णांकित करने) का लाभ मिलने का अधिकार सुप्रीम कोर्ट के ‘यूनियन ऑफ इंडिया बनाम राम अवतार’ मामले में पहले ही तय किया जा चुका है।

इसके अतिरिक्त, खंडपीठ ने सुप्रीम कोर्ट के एक अन्य अहम फैसले ‘यूनियन ऑफ इंडिया बनाम सार्जेंट गिरीश कुमार’ का हवाला दिया। इस फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया था कि एक बार डिसेबिलिटी पेंशन या उसकी पुनर्गणना का अधिकार मिलने के बाद, याचिका दायर करने से ठीक पहले के केवल तीन साल तक ही एरियर को सीमित नहीं किया जा सकता है। शीर्ष अदालत ने यह भी माना था कि ऐसे मामलों में देरी या समय-सीमा से जुड़ी आपत्तियां बेबुनियाद हैं।

पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट का भी इसी तरह का कड़ा रुख

इसी तरह के पेंशन मामलों में पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट ने भी केंद्र सरकार की अपीलों को खारिज करते हुए सेवानिवृत्त सैनिकों के पक्ष में ट्रिब्यूनल के आदेशों को सही ठहराया है।

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बीते 25 मई को जस्टिस हरसिमरन सिंह सेठी और जस्टिस दीपक मनचंदा की खंडपीठ ने सेना के एक पूर्व जवान को जीवनभर के लिए 30 प्रतिशत के बजाय 50 प्रतिशत डिसेबिलिटी पेंशन देने के एएफटी के फैसले पर मुहर लगाई। यह पूर्व जवान सेवा के दौरान ‘प्राइमरी हाइपरटेंशन’ (उच्च रक्तचाप) से पीड़ित हो गया था। हाईकोर्ट ने कहा कि चूंकि भर्ती के समय सैनिक पूरी तरह स्वस्थ था, इसलिए सेवा के दौरान हुई इस बीमारी को सैन्य सेवा का ही परिणाम माना जाएगा। कोर्ट ने जोर देकर कहा कि मेडिकल बोर्ड की अपुष्ट रिपोर्ट किसी सैनिक के पेंशन अधिकारों को नहीं छीन सकती।

इसके बाद, 29 मई को इसी खंडपीठ ने एक अन्य सेवानिवृत्त सार्जेंट के पक्ष में फैसला सुनाया, जो सेना में 27 साल की सेवा के बाद ‘डायबिटीज मेलिटस टाइप-II’ से ग्रसित हो गए थे। अदालत ने उनके पेंशन लाभ को भी 20 प्रतिशत से बढ़ाकर 50 प्रतिशत करने के आदेश को सुरक्षित रखा। कोर्ट ने अपने इस फैसले में फिर दोहराया कि यदि कोई सैनिक भर्ती के समय चिकित्सकीय रूप से फिट था, तो सेवा के दौरान विकसित होने वाली किसी भी बीमारी को सैन्य सेवा से ही जुड़ा हुआ माना जाएगा।

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