डीयू के सभी कॉलेजों में हॉस्टल की मांग: दिल्ली हाईकोर्ट ने केंद्र, दिल्ली सरकार और विश्वविद्यालय से मांगा जवाब

दिल्ली विश्वविद्यालय (डीयू) के सभी संबद्ध कॉलेजों में छात्रों के लिए हॉस्टल सुविधा उपलब्ध कराने की मांग को लेकर दायर एक जनहित याचिका पर दिल्ली हाईकोर्ट ने बुधवार को केंद्र सरकार, दिल्ली सरकार और दिल्ली विश्वविद्यालय को नोटिस जारी कर जवाब तलब किया है।

चीफ जस्टिस देवेंद्र कुमार उपाध्याय और जस्टिस तेजस कारिया की बेंच ने तीनों पक्षों को इस याचिका पर अपने-अपने जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया। अदालत ने इस मामले की अगली सुनवाई 25 सितंबर तय की है और याचिका को सत्य निकेतन में हुए हालिया इमारत हादसे से जुड़ी एक अन्य याचिका के साथ संबद्ध (टैग) कर दिया है।

सुनवाई के दौरान बेंच ने यह टिप्पणी भी की कि जनहित याचिका एक अत्यंत गंभीर विषय है। अदालत ने बिना किसी ठोस आधार के विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) को इस याचिका में पक्षकार बनाने पर सवाल उठाया और याचिकाकर्ता को पक्षकारों की सूची से आयोग का नाम हटाने का निर्देश दिया।

सत्य निकेतन इमारत हादसे के बाद अदालत में पहुंची याचिका

नेशनल स्टूडेंट्स यूनियन ऑफ इंडिया (एनएसयूआई) के अध्यक्ष विनोद जाखड़ द्वारा दायर यह याचिका साउथ कैंपस के पास सत्य निकेतन इलाके में 6 सितंबर को हुई घटना के मद्देनजर दाखिल की गई है। वहां मरम्मत कार्य के दौरान एक इमारत ढह गई थी, जिसका इस्तेमाल छात्र निजी पेइंग गेस्ट (पीजी) के तौर पर कर रहे थे। इस हादसे में सात लोगों की जान चली गई थी और कई अन्य गंभीर रूप से घायल हो गए थे।

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इससे पहले 7 सितंबर को हाईकोर्ट ने सत्य निकेतन हादसे की उच्च स्तरीय एमसीडी जांच का निर्देश दिया था। उस दौरान अदालत ने स्पष्ट किया था कि सरकार अपनी जवाबदेही से पल्ला नहीं झाड़ सकती। अदालत ने कहा था कि यह हादसा अत्यंत दुखद होने के साथ-साथ सरकारी व विश्वविद्यालय स्तर पर हॉस्टलों की कमी, छात्रों की सुरक्षा और निजी पीजी को नियंत्रित करने में एमसीडी व संबंधित प्राधिकरणों की अपर्याप्त निगरानी को लेकर गहरी चिंता पैदा करता है।

104 साल बाद भी आवासीय ढांचे में गंभीर कमी

याचिका में दिल्ली विश्वविद्यालय में पढ़ रहे विद्यार्थियों के लिए किफायती और पर्याप्त संस्थागत हॉस्टल सुविधाओं की पुरानी और गंभीर कमी का मुद्दा उठाया गया है। इसमें कहा गया है कि विश्वविद्यालय की स्थापना के 104 से अधिक वर्ष बीत जाने और छात्रों की तादाद व भौगोलिक विस्तार में भारी वृद्धि के बावजूद आवासीय बुनियादी ढांचे का विकास उसके अनुपात में नहीं हो सका है।

याचिका के अनुसार, विश्वविद्यालय के कई कॉलेजों में हॉस्टल की कोई सुविधा ही नहीं है। वहीं जिन चुनिंदा कॉलेजों में हॉस्टल उपलब्ध हैं, वहां सीटों की संख्या वास्तविक मांग की तुलना में बेहद कम है। इस संस्थागत कमी के कारण खासकर अन्य राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों से आने वाले हजारों छात्रों को कॉलेजों के आसपास स्थित निजी पीजी, निजी हॉस्टलों, किराए के कमरों और साझा फ्लैटों में रहने के लिए मजबूर होना पड़ता है। इससे छात्रों और उनके परिवारों पर भारी आर्थिक बोझ पड़ता है।

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याचिकाकर्ता ने अदालत में दलील दी कि सत्य निकेतन की त्रासदी को केवल किसी एक इमारत, इलाके या साउथ कैंपस तक सीमित घटना के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। यह पूरी राजधानी में डीयू कॉलेजों के पास निजी स्तर पर संचालित व्यवस्थाओं में रह रहे हजारों विद्यार्थियों की सुरक्षा और कल्याण से जुड़ा एक व्यापक मसला है।

समयबद्ध हॉस्टल नीति और अंतरिम सुरक्षा ऑडिट की मांग

याचिका में अदालत से यह आग्रह किया गया है कि वह संबंधित अधिकारियों को प्रत्येक कॉलेज के मौजूदा हॉस्टल और छात्रों की आवासीय जरूरतों का अलग-अलग मूल्यांकन करने का निर्देश दे। इसके आधार पर चरणबद्ध और समयबद्ध तरीके से दिल्ली विश्वविद्यालय हॉस्टल विकास नीति अथवा मास्टर प्लान तैयार किया जाए।

याचिका में यह भी सुझाव दिया गया है कि जिन कॉलेजों के पास पर्याप्त जमीन उपलब्ध है, वहां हॉस्टलों के विस्तार या नए निर्माण पर विचार किया जाए। वहीं जिन संस्थानों के पास जमीन की कमी है, उनके लिए उपयुक्त सरकारी या विश्वविद्यालय की जमीन पर साझा हॉस्टल बनाए जाएं।

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स्थायी हॉस्टल ढांचा तैयार होने में लगने वाले समय को देखते हुए अंतरिम सुरक्षा उपायों की भी मांग की गई है। याचिका में कहा गया है कि डीयू के आसपास संचालित सभी निजी पीजी और हॉस्टलों का अनिवार्य स्ट्रक्चरल व फायर-सेफ्टी ऑडिट कराया जाए और उनके लिए पंजीकरण तथा नियमित निरीक्षण की एक पुख्ता व्यवस्था तय की जाए।

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