दिल्ली हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 397(3) [अब भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 438(3)] के तहत दूसरी पुनरीक्षण याचिका (रिवीजन पिटीशन) दायर करने पर लगे कानूनी प्रतिबंध को कोर्ट की अंतर्निहित शक्तियों (इनहेरेंट पावर्स) का हवाला देकर तब तक दरकिनार नहीं किया जा सकता, जब तक कि गंभीर अन्याय का मामला स्पष्ट रूप से स्थापित न हो। हाईकोर्ट ने नेगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स (NI) एक्ट के तहत अंतरिम मुआवजे में संशोधन करने वाले सत्र न्यायालय (रिवीजनल कोर्ट) के आदेश को चुनौती देने वाले आरोपी की याचिका को “पूरी तरह से बेतुका” बताते हुए खारिज कर दिया और याचिकाकर्ता पर 10,000 रुपये का जुर्माना भी लगाया।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला शिकायतकर्ता गीता ठाकुर द्वारा एनआई (NI) एक्ट की धारा 138 के तहत दर्ज कराई गई एक शिकायत से शुरू हुआ था। शिकायत के अनुसार, शिकायतकर्ता ने याचिकाकर्ता नगिंदर सिंह और एक अन्य सह-आरोपी (जिसे इस याचिका में पक्षकार नहीं बनाया गया है) के संयुक्त अनुरोध पर कई चेकों के माध्यम से अलग-अलग किस्तों में 5,00,000 रुपये का एक मित्रवत ऋण (लोन) दिया था। याचिकाकर्ता और सह-आरोपी ने दो साल के भीतर ऋण राशि वापस करने का आश्वासन दिया था।
अपनी देनदारी चुकाने के लिए, याचिकाकर्ता ने एक चेक जारी किया, जो बाद में उसके बैंक खाते में पर्याप्त राशि न होने के कारण बाउंस हो गया। वैधानिक मांग नोटिस (स्टैच्यूटरी डिमांड नोटिस) मिलने के बाद भी चेक की राशि का भुगतान नहीं किया गया, जिसके कारण शिकायतकर्ता को मामला दर्ज कराना पड़ा।
ट्रायल कोर्ट की कार्यवाही के दौरान, मजिस्ट्रेट ने याचिकाकर्ता और सह-आरोपी दोनों को एनआई एक्ट की धारा 143A के तहत अंतरिम मुआवजे के रूप में चेक राशि का 20% शिकायतकर्ता को भुगतान करने का निर्देश दिया था। इस निर्देश को याचिकाकर्ता और सह-आरोपी ने सत्र न्यायालय के समक्ष आपराधिक पुनरीक्षण याचिका दायर कर चुनौती दी।
सत्र न्यायालय (रिवीजनल कोर्ट) ने 28 जनवरी 2026 के अपने आदेश में पाया कि याचिकाकर्ता और सह-आरोपी ने अपने बचाव में यह स्वीकार किया था कि उन्हें चेकों के माध्यम से शिकायतकर्ता से 5,00,000 रुपये का लोन मिला था। इस आधार पर, सत्र न्यायालय ने 20% अंतरिम मुआवजा देने के ट्रायल कोर्ट के फैसले को बरकरार रखा। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट के एक पूर्व फैसले (श्रीमती अपर्णा ए. शाह बनाम मेसर्स शेठ डेवलपर्स प्राइवेट लिमिटेड व अन्य, क्रिमिनल अपील संख्या 813/2013) का हवाला देते हुए, सत्र न्यायालय ने आदेश में संशोधन किया। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि चूंकि चेक पर केवल याचिकाकर्ता के हस्ताक्षर थे, इसलिए चेक का लेखक (ड्रॉवर) होने के नाते केवल वही अंतरिम मुआवजे का भुगतान करने के लिए उत्तरदायी है।
इसके बाद याचिकाकर्ता ने इस संशोधित आदेश को चुनौती देने के लिए हाईकोर्ट का रुख किया।
पक्षों की दलीलें
हाईकोर्ट के समक्ष याचिका की स्वीकार्यता (मेनटेनेबिलिटी) का कानूनी मुद्दा उठा, विशेष रूप से इस बात को लेकर कि क्या यह याचिका सीआरपीसी (CrPC) की धारा 397(3) [अब बीएनएसएस (BNSS) की धारा 438(3)] के तहत प्रतिबंधित है, जो किसी भी पक्षकार को दूसरी पुनरीक्षण याचिका दायर करने से रोकती है।
याचिकाकर्ता के वकील ने तर्क दिया कि यदि कोई पक्षकार हाईकोर्ट की अंतर्निहित शक्तियों का सहारा लेता है और गंभीर अन्याय का मामला प्रदर्शित करता है, तो सीआरपीसी की धारा 397(3) के तहत लगा कानूनी प्रतिबंध लागू नहीं होता है।
“गंभीर अन्याय” साबित करने के लिए याचिकाकर्ता के वकील ने दलील दी कि याचिकाकर्ता को कुल 5,00,000 रुपये की लोन राशि में से केवल 50,000 रुपये ही प्राप्त हुए थे, इसलिए उसे पूरी चेक राशि का भुगतान करने के लिए उत्तरदायी नहीं ठहराया जा सकता। वकील ने यह भी प्रस्तुत किया कि याचिकाकर्ता ने चेक पर “केवल हस्ताक्षर” किए थे।
सुनवाई के दौरान शिकायतकर्ता की ओर से कोई भी वकील उपस्थित नहीं हुआ।
कोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणियां
हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता के इस कानूनी तर्क को स्वीकार किया कि यदि गंभीर अन्याय स्थापित हो जाता है, तो कानूनी प्रतिबंध कोर्ट को अपनी अंतर्निहित शक्तियों का उपयोग करने से पूरी तरह नहीं रोकता है। हालांकि, कोर्ट ने जोर देकर कहा कि सामान्य परिस्थितियों में स्पष्ट कानूनी प्रतिबंधों को दरकिनार करने के लिए अंतर्निहित शक्तियों का उपयोग नहीं किया जा सकता है।
याचिका की स्वीकार्यता का आकलन करते हुए, जस्टिस गिरीश काठपालिया ने टिप्पणी की:
“यह सर्वविदित है कि कानून द्वारा जिसे स्पष्ट रूप से प्रतिबंधित किया गया है, उसे अंतर्निहित शक्तियों का हवाला देकर पिछले दरवाजे से प्रवेश नहीं दिया जा सकता। लेकिन जहां अंतर्निहित शक्तियों का उपयोग चाहने वाला याचिकाकर्ता गंभीर अन्याय का मामला स्थापित करने में सफल रहता है, वहां हाईकोर्ट निश्चित रूप से दूसरी पुनरीक्षण याचिका के रूप में अपनी अंतर्निहित अधिकारिता का उपयोग करने के लिए उचित होगा।”
इस सिद्धांत को मामले के तथ्यों पर लागू करते हुए, कोर्ट ने याचिकाकर्ता की दलील को मेरिट के आधार पर खारिज कर दिया। याचिकाकर्ता के केवल 50,000 रुपये प्राप्त होने के दावे पर टिप्पणी करते हुए कोर्ट ने कहा:
“मैं इस तर्क से बिल्कुल भी सहमत नहीं हूं, क्योंकि अगर उसे केवल 50,000 रुपये मिले थे, तो उसके पास 5,00,000 रुपये का चेक जारी करने का कोई कारण नहीं था।”
कोर्ट ने आगे कहा कि याचिकाकर्ता का यह तर्क कि उसने केवल चेक पर हस्ताक्षर किए थे, स्वीकार किए गए बचाव के आलोक में कोई मायने नहीं रखता, जहां 5,00,000 रुपये के लोन की प्राप्ति को स्वीकार किया गया था। मामले में गंभीर अन्याय का कोई भी तत्व न पाते हुए कोर्ट ने टिप्पणी की:
“आज, याचिकाकर्ता के वकील को सुनने के बाद, मुझे यह याचिका नोटिस जारी करने योग्य भी नहीं लगती। बल्कि, यह याचिका पूरी तरह से बेतुकी पाई गई है।”
कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि यह याचिका कानूनी प्रतिबंध को दरकिनार करने का एक स्पष्ट प्रयास थी। कोर्ट ने माना:
“यह निश्चित रूप से गंभीर अन्याय का मामला नहीं है जिसके लिए यह अदालत अपनी अंतर्निहित शक्तियों का उपयोग करेगी और सीआरपीसी की धारा 397(3) [अब बीएनएसएस की धारा 438(3)] के तहत लगे प्रतिबंध की अनदेखी करते हुए इस दूसरी पुनरीक्षण याचिका को पिछले दरवाजे से प्रवेश की अनुमति देगी।”
कोर्ट का निर्णय
हाईकोर्ट ने सत्र न्यायालय के 28 जनवरी 2026 के आदेश को बरकरार रखा और याचिका खारिज कर दी। इसके साथ ही, कोर्ट ने याचिकाकर्ता पर 10,000 रुपये का जुर्माना लगाया और उसे यह राशि एक सप्ताह के भीतर दिल्ली हाईकोर्ट कानूनी सेवा समिति (DHCLSC) में जमा करने का निर्देश दिया। जुर्माने के आदेश का अनुपालन सुनिश्चित करने के लिए आदेश की एक प्रति ट्रायल कोर्ट को भी भेजी गई।
मामले का विवरण
मामले का शीर्षक: नगिंदर सिंह बनाम गीता ठाकुर
वाद संख्या: सीआरएल.एम.सी. 2527/2026 और सीआरएल.एम.ए. 10253/2026
पीठ: जस्टिस गिरीश काठपालिया
निर्णय की तिथि: 19.05.2026

