ऑपरेशन स्नो लेपर्ड में जान गंवाने वाले ब्रिगेडियर के बेटे को अनुकंपा नौकरी दे हरियाणा सरकार: हाईकोर्ट

पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट ने राज्य सरकार के रवैये पर कड़ा ऐतराज जताते हुए ऑपरेशन स्नो लेपर्ड के दौरान जान गंवाने वाले भारतीय सेना के ब्रिगेडियर के बेटे को चार महीने के भीतर अनुकंपा के आधार पर सरकारी नौकरी देने का आदेश दिया है। अदालत ने सरकार के उस तर्क को पूरी तरह खारिज कर दिया, जिसमें सैन्य अधिकारी की मृत्यु को एक सामान्य बीमारी करार देकर उनके आश्रित को लाभ देने से इनकार कर दिया गया था।

हाईकोर्ट ने राज्य सरकार के रुख को बताया संवेदनहीन

मामले की सुनवाई करते हुए जस्टिस निधि गुप्ता की पीठ ने सरकार के इस रुख को अत्यधिक कठोर और समझ से परे बताया। 17 जुलाई के अपने आदेश में अदालत ने कहा कि अत्यधिक ऊंचाई वाले लेह क्षेत्र में सैन्य अभियान के दौरान ब्रिगेडियर अभिमन्यु सिंह राठौर को सेरेब्रल वीनस थ्रोम्बोसिस (सीवीटी) नामक स्थिति का सामना करना पड़ा, जो सीधे तौर पर वहां के प्रतिकूल मौसम और युद्ध जैसी परिस्थितियों के कारण हुई थी। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि सक्रिय युद्ध क्षेत्र में सेवा देते हुए विकसित हुई चिकित्सीय स्थिति को सामान्य बीमारी मानना प्रशासनिक नियमों की गलत व्याख्या है।

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सेना ने जारी किया था बैटल कैजुअल्टी सर्टिफिकेट

यह याचिका बीकॉम और एमबीए डिग्री धारक सक्षम राठौर ने दायर की थी। सक्षम के पिता ब्रिगेडियर अभिमन्यु सिंह राठौर 30 जुलाई 2023 को चीन सीमा पर जारी ऑपरेशन स्नो लेपर्ड के दौरान राष्ट्र सेवा करते हुए वीरगति को प्राप्त हुए थे। इसके बाद सैन्य अधिकारियों ने 10 जनवरी 2024 को आधिकारिक प्रमाण पत्र जारी कर उनकी शहादत को बैटल कैजुअल्टी की श्रेणी में वर्गीकृत किया था।

सेना के प्राधिकारियों ने 24 जनवरी 2024 को सक्षम का आवेदन राज्य सरकार को भेजा था। हालांकि, राज्य प्रशासनिक अधिकारियों ने 16 फरवरी 2024, 24 मई 2024 और 4 दिसंबर 2025 को बिना स्पष्ट कारण बताए अलग-अलग आदेशों के माध्यम से इस आवेदन को खारिज कर दिया।

शहीद और बैटल कैजुअल्टी शब्दावली पर भ्रम दूर

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अदालत में सुनवाई के दौरान राज्य सरकार के प्रतिनिधि डिप्टी एडवोकेट जनरल सुनील रंगा ने तर्क दिया कि तत्कालीन नीति के तहत केवल शहीदों के आश्रित ही अनुकंपा नियुक्ति के पात्र हैं, जबकि बीमारी से जान गंवाने वाले बैटल कैजुअल्टी श्रेणी के कार्मिक इसमें शामिल नहीं हैं। उन्होंने यह भी कहा कि 2023 की नई नीति को इस मामले में पिछली तारीखों से लागू नहीं किया जा सकता।

इसके विपरीत, याचिकाकर्ता के अधिवक्ता रूपन अटवाल ने दलील दी कि सक्षम का आवेदन 2018 की नीति के तहत पूरी तरह वैध है, जिसमें बैटल कैजुअल्टी के आश्रितों को स्पष्ट रूप से शामिल किया गया था।

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शब्दावली के विवाद पर विचार करते हुए हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि भारतीय सशस्त्र बल आधिकारिक तौर पर शहीद शब्द का प्रयोग नहीं करते, बल्कि कर्तव्य के दौरान जान गंवाने वाले कर्मियों के लिए बैटल कैजुअल्टी शब्द का उपयोग किया जाता है। अदालत ने पाया कि हरियाणा सरकार की 2014 की नीति भले ही शहीद शब्द पर आधारित थी, लेकिन 2018 और 2023 के नीतिगत संशोधनों में बैटल कैजुअल्टी को इसमें शामिल कर दिया गया था। कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि प्रशासनिक अधिकारियों ने केवल शब्दों के जाल में उलझकर अपनी ही संशोधित नीतियों की अनदेखी की है।

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