किसी अन्य व्यक्ति के नाम पर ईमेल आईडी बनाना पहचान की चोरी नहीं: इलाहाबाद हाईकोर्ट

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक अहम फैसले में स्पष्ट किया है कि किसी अन्य व्यक्ति के नाम पर ईमेल आईडी तैयार करना सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम (आईटी एक्ट) के तहत पहचान की चोरी यानी ‘आइडेंटिटी थेफ्ट’ के दायरे में नहीं आता। कोर्ट ने कहा कि कानून में ऐसी कोई रोक नहीं है जो किसी व्यक्ति को किसी अन्य के नाम से ईमेल पता बनाने से रोकती हो। इस टिप्पणी के साथ कोर्ट ने फर्जी ईमेल के जरिए झूठी शिकायतें भेजने के आरोपी दो व्यक्तियों के खिलाफ दर्ज प्राथमिकी की कानूनी कार्रवाई पर रोक लगा दी है।

यह आदेश न्यायमूर्ति अब्दुल मोइन और न्यायमूर्ति प्रमोद कुमार श्रीवास्तव की खंडपीठ ने 1 सितंबर को जारी किया। पीठ दो आरोपियों की ओर से 23 जुलाई को दर्ज कराई गई एफआईआर को रद्द करने की मांग वाली याचिका पर सुनवाई कर रही थी।

आईटी एक्ट की धारा 66-सी का दायरा

याचिकाकर्ताओं पर आरोप था कि उन्होंने किसी तीसरे व्यक्ति के नाम से एक ईमेल आईडी बनाई और उसके माध्यम से लोकायुक्त समेत कई लोगों को भ्रामक संदेश और फर्जी शिकायतें भेजीं। पुलिस ने इस मामले में मानहानि के अलावा आईटी एक्ट की धारा 66-सी के तहत मामला दर्ज किया था।

राज्य सरकार के अधिवक्ता आशीष गौतम ने दलील दी कि किसी अन्य व्यक्ति के नाम पर जानबूझकर ईमेल आईडी बनाकर शिकायतें भेजना उस व्यक्ति के विशिष्ट पहचान चिह्न (यूनिक आइडेंटिफिकेशन फीचर) का दुरुपयोग है, जो धारा 66-सी के तहत दंडनीय अपराध बनता है।

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हालांकि हाईकोर्ट ने इस दलील को खारिज कर दिया। खंडपीठ ने कहा कि संसद ने आईटी एक्ट की धारा 66-सी में केवल इलेक्ट्रॉनिक हस्ताक्षर, पासवर्ड या किसी अन्य विशिष्ट पहचान चिह्न के कपटपूर्ण उपयोग को ही अपराध माना है। इस कानूनी प्रावधान में ‘ईमेल आईडी’ शब्द शामिल नहीं है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि महज किसी के नाम से ईमेल खाता खोलना न तो किसी के पासवर्ड या इलेक्ट्रॉनिक हस्ताक्षर का उपयोग है और न ही किसी विशिष्ट पहचान की चोरी। लिहाजा, प्रथम दृष्टया यह कृत्य धारा 66-सी के तहत अपराध नहीं बनता।

आपराधिक मानहानि पर एफआईआर को चुनौती

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याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश वकील अनुज दयाल और अंकित कुमार त्रिवेदी ने भी अदालत के समक्ष तर्क रखा कि किसी के नाम पर ईमेल बनाना किसी दूसरे की गोपनीय पहचान को चुराना नहीं है।

इसके साथ ही बचाव पक्ष ने मामले में दर्ज आपराधिक मानहानि की धारा पर भी सवाल उठाया। वकीलों ने सुप्रीम कोर्ट के सुब्रमण्यम स्वामी बनाम यूनियन ऑफ इंडिया मामले के नजीर का हवाला देते हुए दलील दी कि आपराधिक मानहानि के मामलों में सीधे पुलिस एफआईआर दर्ज नहीं की जा सकती, बल्कि पीड़ित पक्ष को सक्षम मजिस्ट्रेट के समक्ष औपचारिक शिकायत दर्ज करानी होती है।

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दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद हाईकोर्ट ने आरोपियों के खिलाफ दर्ज एफआईआर की अग्रिम कानूनी कार्यवाही पर अंतरिम रोक लगाते हुए उन्हें राहत दे दी।

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