नैनीताल से हल्द्वानी शिफ्ट होगा उत्तराखंड हाईकोर्ट, परिसर स्थानांतरण के खिलाफ दायर याचिका खारिज

उत्तराखंड हाईकोर्ट ने नैनीताल से अदालत परिसर को हल्द्वानी स्थानांतरित करने के प्रस्ताव के खिलाफ दायर याचिका को खारिज कर दिया है। अदालत ने इस चुनौती को समय से पूर्व बताते हुए कहा कि एक छोटे से पर्वतीय पर्यटन स्थल नैनीताल में जगह की कमी, सीमित बुनियादी ढांचा और अत्यधिक महंगाई न्याय पाने की राह में बड़ी बाधा बन रहे हैं।

जस्टिस मनोज कुमार तिवारी और जस्टिस पंकज पुरोहित की खंडपीठ ने हाईकोर्ट और नैनीताल के जिलाधिकारी द्वारा अदालत परिसर को स्थानांतरित करने के संबंध में जारी आदेशों को चुनौती देने वाली याचिका पर यह फैसला सुनाया। 3 सितंबर को दिए अपने आदेश में पीठ ने कहा कि यह मामला अभी काफी शुरुआती चरण में है। अदालत ने स्पष्ट किया कि वर्तमान में वन भूमि का केवल चयन किया गया है, उसे विधिवत रूप से डी-रिजर्व (गैर-अधिसूचित) नहीं किया गया है। पीठ ने यह भी दर्ज किया कि राज्य सरकार ने हाईकोर्ट परिसर को स्थानांतरित करते समय निर्धारित कानूनी प्रक्रियाओं का पूरी तरह पालन करने का आश्वासन दिया है।

नैनीताल में बुनियादी ढांचा सीमित और खर्चीला जीवन

अदालत ने अपने आदेश में रेखांकित किया कि नैनीताल जैसे छोटे पर्वतीय पर्यटन स्थल में जगह और बुनियादी ढांचे का भारी अभाव है। यहां कनेक्टिविटी से जुड़ी दिक्कतें हैं और जीवनयापन की लागत बहुत अधिक है। पीठ ने कहा कि इतनी ऊंची लागत से उन वादकारियों पर भारी वित्तीय बोझ पड़ता है जो समाज के वंचित वर्गों से आते हैं। इसके अलावा युवा वकीलों और हाईकोर्ट के कर्मचारियों को भी लगातार परेशानियों का सामना करना पड़ता है।

अदालत का मानना था कि महंगा शहर होने के कारण यह स्थिति सामाजिक और आर्थिक न्याय को बढ़ावा नहीं देती। इसके साथ ही जगह की कमी के चलते जजों की स्वीकृत संख्या बढ़ाने समेत एक संस्थान के तौर पर हाईकोर्ट के विकास में भी रुकावट आ रही है।

READ ALSO  सुप्रीम कोर्ट ने कहा न्यायाधीशों की सुरक्षा के लिए केंद्र कदम उठाए, इसे राज्यों के भरोसे मत छोड़े

स्थानांतरण के लिए प्रस्तावित भूमि और घटनाक्रम

हाईकोर्ट को स्थानांतरित करने की प्रक्रिया के तहत 14 मई को नैनीताल के जिलाधिकारी ने भूमि चिन्हित करने से जुड़ा एक आदेश जारी किया था। इसके बाद 19 जून को हाईकोर्ट ने एक फुल कोर्ट प्रस्ताव पारित किया। इस प्रस्ताव में नैनीताल से हाईकोर्ट को तराई-सेंट्रल फॉरेस्ट डिवीजन, रुद्रपुर में बेल बाबा मंदिर के पास स्थित लगभग 73 हेक्टेयर वन भूमि पर शिफ्ट करने की बात कही गई थी।

हाथी गलियारे और पर्यावरण संबंधी आपत्तियां

याचिकाकर्ता ने वन भूमि के प्रस्तावित उपयोग पर सवाल उठाते हुए दावा किया था कि जिस क्षेत्र को चिन्हित किया गया है, वह हाथी गलियारे (एलिफेंट कॉरिडोर) के अंतर्गत आता है। याचिका में दलील दी गई थी कि इस भूमि के गैर-वन उपयोग से गंभीर पर्यावरणीय परिणाम हो सकते हैं।

READ ALSO  रिटायर्ड ज़िला जज संतोष कुमार यूपीपीएससी के नए सदस्य नियुक्त

याचिकाकर्ता की ओर से पेश वकील एम.सी. पंत, नवनीश नेगी और एम.एस. भंडारी ने तर्क दिया कि हाईकोर्ट परिसर का निर्माण गैर-साइट-विशिष्ट और गैर-वन उद्देश्य के तहत आता है। वकीलों ने कहा कि वन (संरक्षण) अधिनियम, संबंधित नियमों और 29 दिसंबर 2023 के एकीकृत दिशा-निर्देशों व स्पष्टीकरणों का पालन किए बिना ऐसी वन भूमि का उपयोग नहीं किया जा सकता। उन्होंने यह भी कहा कि जिलाधिकारी या संबंधित अधिकारियों ने केंद्र सरकार से आवश्यक पूर्व अनुमति नहीं ली है, इसलिए कानूनन यह स्थानांतरण मान्य नहीं है। वकीलों के अनुसार, पर्यावरण संरक्षण के संवैधानिक दायित्व को देखते हुए इस भूमि का डायवर्जन नहीं किया जाना चाहिए।

राज्य सरकार की दलीलें और अदालत का फैसला

राज्य सरकार का पक्ष रखते हुए महाधिवक्ता एस.एन. बाबुलकर ने कहा कि स्थानांतरण की प्रक्रिया अभी केवल भूमि चिन्हित करने के चरण में है और उचित समय पर सभी वैधानिक स्वीकृतियां ले ली जाएंगी। उन्होंने कहा कि नैनीताल शहर अपनी भार वहन क्षमता (लोड-बेयरिंग कैपेसिटी) पूरी तरह खो चुका है। ऐसे में वादकारियों, प्रैक्टिस करने वाले वकीलों, हाईकोर्ट के कर्मचारियों और खुद नैनीताल शहर की बेहतरी के लिए अदालत को हल्द्वानी शिफ्ट करना जरूरी है। महाधिवक्ता ने यह भी बताया कि प्रस्तावित भूमि तथाकथित हाथी गलियारे से लगभग 10 किलोमीटर दूर है।

डिप्टी सॉलिसिटर जनरल ललित शर्मा ने अदालत को अवगत कराया कि राज्य सरकार की ओर से क्षेत्रीय सशक्त समिति के समक्ष मंजूरी के लिए अभी कोई प्रस्ताव नहीं भेजा गया है। वहीं उत्तराखंड हाईकोर्ट का पक्ष रख रहे वकील शोभित सहारिया ने कहा कि वन भूमि को डी-रिजर्व करने के लिए तय कानूनी प्रक्रियाओं का पालन करना पड़ता है।

READ ALSO  केरल हाईकोर्ट के जज द्वारा विधवा वकील पर की गई टिप्पणी के लिए वकीलों का विरोध, सार्वजनिक माफी की मांग  

दोनों पक्षों को सुनने के बाद खंडपीठ ने याचिका को खारिज करते हुए कहा कि यह मामला समय से पहले लाया गया है क्योंकि अभी सिर्फ जमीन चिन्हित हुई है। अदालत ने कहा कि जब वन भूमि को डी-रिजर्व करने या उसे गैर-वन उपयोग में लाने का वास्तविक चरण आएगा, तब केंद्र सरकार से अनुमति ली जा सकती है। इसके साथ ही हाथी गलियारे पर प्रभाव पड़ने की दलील को खारिज करते हुए पीठ ने कहा कि प्रस्तावित जमीन हाथी गलियारे से करीब 10 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है और यह तथ्य खुद याचिकाकर्ता द्वारा संलग्न किए गए दस्तावेजों से भी स्पष्ट होता है।

Law Trend
Law Trendhttps://lawtrend.in/
Legal News Website Providing Latest Judgments of Supreme Court and High Court

Related Articles

Latest Articles