गाली-गलौज या अभद्र भाषा कानूनन अश्लीलता के दायरे में नहीं आती: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि गाली-गलौज, अभद्र या अपशब्दों का इस्तेमाल, चाहे वह कितना भी अरुचिकर या असभ्य क्यों न हो, भारतीय दंड संहिता (आईपीसी), 1860 की धारा 294(बी) के तहत कानूनी अश्लीलता (ऑब्सेनिटी) के दायरे में नहीं आता है। मद्रास हाईकोर्ट के एक फैसले के खिलाफ दायर अपील पर सुनवाई करते हुए जस्टिस संजय करोल और जस्टिस विपुल एम. पंचोली की खंडपीठ ने अश्लीलता और आपराधिक धमकी के आरोपों में एक 70 वर्षीय बुजुर्ग की सजा को रद्द कर दिया। हालांकि, अदालत ने खतरनाक हथियार से गंभीर चोट पहुंचाने के मामले में आईपीसी की धारा 326 के तहत उनकी दोषसिद्धि को बरकरार रखा। बुजुर्ग की उम्र, स्वास्थ्य और पारिवारिक जमीनी विवाद को देखते हुए कोर्ट ने इस सजा को संशोधित करते हुए उन्हें ‘अदालत उठने तक’ की प्रतीकात्मक सजा और 50,000 रुपये जुर्माने का निर्देश दिया।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला अगस्त 2017 में हुए एक जमीनी विवाद से शुरू हुआ था। 22 अगस्त 2017 को अपीलकर्ता मणि उर्फ सुब्रमण्यम और शिकायतकर्ता के साले रामासामी के बीच विवाद हुआ था। इसके दो दिन बाद, 24 अगस्त 2017 को अपीलकर्ता का शिकायतकर्ता के भतीजे (पीडब्लू-4) के साथ इसी विवाद को लेकर झगड़ा हुआ। जब शिकायतकर्ता महालिंगम (पीडब्लू-1) ने बीच-बचाव करने की कोशिश की, तो अपीलकर्ता ने कथित तौर पर उसके खिलाफ अभद्र शब्दों और गालियों का इस्तेमाल किया। इसके बाद अपीलकर्ता अपने घर से एक बिलहुक (एक प्रकार का धारदार हथियार) लाया और महालिंगम पर हमला कर दिया, जिससे उसके माथे, नाक और बाएं अंगूठे पर चोटें आईं। महालिंगम को भवानी के सरकारी अस्पताल ले जाया गया, जहां वरिष्ठ सिविल सर्जन डॉ. आर. धिनकर (पीडब्लू-2) ने उसकी जांच की और बाद में नाक की हड्डी में फ्रैक्चर की पुष्टि की।

इस घटना के बाद पुलिस स्टेशन अप्पाकुडल में आईपीसी की धारा 294(बी), 324 और 506(ii) के साथ-साथ एससी/एसटी (अत्याचार निवारण) संशोधन अधिनियम, 2015 के प्रावधानों के तहत प्राथमिकी (एफआईआर) दर्ज की गई। चोट की गंभीरता को देखते हुए बाद में धारा 324 को धारा 326 आईपीसी (गंभीर चोट पहुंचाना) में बदल दिया गया।

इरोड की एससी/एसटी विशेष अदालत ने अपीलकर्ता को सभी आरोपों में दोषी ठहराया था। मद्रास हाईकोर्ट ने अपील पर सुनवाई करते हुए उन्हें एससी/एसटी अधिनियम के आरोपों से बरी कर दिया, लेकिन आईपीसी की धारा 294(बी), 326 और 506(ii) के तहत दोषसिद्धि को बरकरार रखा और धारा 326 के तहत सजा को पांच साल से घटाकर एक साल के साधारण कारावास में बदल दिया। इसके बाद अपीलकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर की।

पक्षों की दलीलें

अपीलकर्ता ने खुद को बेकसूर बताते हुए आईपीसी के तहत अपनी सजा की कानूनी वैधता को चुनौती दी। धारा 326 आईपीसी के तहत दोषसिद्धि को लेकर अपीलकर्ता की दलील थी कि शिकायतकर्ता को कोई गहरा कटा हुआ घाव नहीं आया था, इसलिए यह धारा लागू नहीं होती।

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न तो राज्य सरकार और न ही शिकायतकर्ता ने एससी/एसटी अधिनियम के तहत अपीलकर्ता को बरी किए जाने के खिलाफ कोई क्रॉस-अपील दायर की थी। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में कोर्ट की सहायता के लिए नियुक्त न्यायमित्र (अमीकस क्यूरी) और वरिष्ठ अधिवक्ता शैलेश मडियाल की दलीलों को भी सुना।

अदालत का विश्लेषण

1. धारा 294(बी) आईपीसी के तहत अश्लीलता का अपराध

सुप्रीम कोर्ट ने धारा 294(बी) आईपीसी के मुख्य तत्वों की समीक्षा की और पाया कि आईपीसी में ‘अश्लील’ (ऑब्सीन) शब्द को परिभाषित नहीं किया गया है। कोर्ट ने ‘रंजीत डी. उदेशी बनाम महाराष्ट्र राज्य’ मामले में संविधान पीठ के ऐतिहासिक फैसले का हवाला दिया, जिसमें अश्लीलता तय करने के लिए ‘हिक्लिन टेस्ट’ का इस्तेमाल किया गया था। इस टेस्ट के अनुसार, यह देखा जाता है कि क्या कोई सामग्री संवेदनशील दिमागों को भ्रष्ट या विकृत कर सकती है। कोर्ट ने ‘चंद्रकांत कल्याणदास काकोडकर बनाम महाराष्ट्र राज्य’ और ‘अवीक सरकार बनाम पश्चिम बंगाल राज्य’ मामलों का भी जिक्र किया, जहां ‘कम्युनिटी स्टैंडर्ड टेस्ट’ (सामुदायिक मानक परीक्षण) को अपनाया गया था। इसके तहत अश्लीलता उसे माना जाता है जो कामुक हो, कामुक हितों को बढ़ावा दे और किसी सामान्य व्यक्ति को भ्रष्ट करने की प्रवृत्ति रखे।

खंडपीठ ने कानूनी तौर पर अश्लीलता और गाली-गलौज या अभद्र भाषा के बीच एक स्पष्ट अंतर रेखा खींची। जस्टिस संजय करोल ने निर्णय में लिखा:

“आइए स्पष्ट करें, कानूनी तौर पर अश्लीलता (ऑब्सेनिटी) ‘अभद्रता’, ‘गाली-गलौज’ या ‘अपशब्दों’ की पर्यायवाची नहीं है। केवल अपशब्दों, गालियों और अभद्र भाषा का उपयोग, चाहे वह कितना भी अरुचिकर या असभ्य क्यों न हो, उसे अश्लीलता के बराबर नहीं माना जा सकता।”

‘समरेश बोस बनाम अमल मित्रा’, ‘एस. खुशबू बनाम कनियाम्माल’, ‘एन.एस. मदनगोपाल बनाम के. ललिता’ और ‘अपूर्वा अरोड़ा बनाम राज्य (एनसीटी दिल्ली)’ मामलों का हवाला देते हुए कोर्ट ने दोहराया:

“जो शब्द केवल अभद्र या गाली-गलौज वाले हैं, वे मन में घृणा, अरुचि या सदमे की भावना पैदा कर सकते हैं, लेकिन वह अपने आप में कानून के दायरे में उन्हें अश्लील नहीं बनाता।”

खंडपीठ ने रेखांकित किया कि विवाद के दौरान अपीलकर्ता द्वारा कहे गए शब्द अत्यधिक अपमानजनक या अभद्र जरूर थे, लेकिन उनमें कामुकता का कोई ऐसा तत्व नहीं था जो यौन विचारों को उत्तेजित करे। कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला:

“ऐसे शब्द, चाहे वे कितने भी गाली-गलौज वाले, अरुचिकर या असभ्य क्यों न हों, आईपीसी की धारा 294(बी) की आवश्यकता को पूरा नहीं करते, क्योंकि रिकॉर्ड पर ऐसा कुछ भी नहीं है जो यह दर्शाए कि उनमें ऊपर संदर्भित तीनों तत्वों में से कोई एक या सभी मौजूद थे।”

इसके अलावा, कोर्ट ने यह भी कहा कि इस बात का कोई सबूत नहीं है कि सार्वजनिक स्थान पर इन शब्दों के इस्तेमाल से दूसरों को कोई ‘परेशानी’ (annoyance) हुई हो, जो कि इस धारा के तहत सजा के लिए एक अनिवार्य वैधानिक तत्व है।

2. धारा 506(ii) आईपीसी के तहत आपराधिक धमकी का अपराध

आपराधिक धमकी के आरोप का विश्लेषण करते हुए कोर्ट ने ‘नरेश अनेजा बनाम उत्तर प्रदेश राज्य’ मामले का उल्लेख किया। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि इस अपराध के लिए किसी व्यक्ति को डराने के इरादे से जानबूझकर धमकी दी जानी चाहिए। अभियोजन पक्ष का आरोप था कि अपीलकर्ता ने बिलहुक लहराते हुए शिकायतकर्ता को धमकी दी थी कि वह उसे काटे बिना चैन से नहीं बैठेगा। इस पर कोर्ट ने निर्णय दिया:

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“झगड़े के दौरान केवल धमकी भरे शब्दों का इस्तेमाल करना, बिना इस प्रमाण के कि उसका उद्देश्य शिकायतकर्ता को डराना था या उसे कोई काम करने या न करने के लिए मजबूर करना था, इस प्रावधान को लागू करने के लिए पर्याप्त नहीं होगा।”

चूंकि इस बात का कोई पुख्ता सबूत नहीं था कि अपीलकर्ता का इरादा शिकायतकर्ता के मन में भय पैदा करने का था, इसलिए धारा 506(ii) आईपीसी के तहत उनकी सजा को रद्द कर दिया गया।

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3. धारा 326 आईपीसी के तहत गंभीर चोट पहुंचाने का अपराध

‘मथाई बनाम केरल राज्य’ मामले में तय कानूनी सिद्धांतों को लागू करते हुए कोर्ट ने चिकित्सा साक्ष्यों की समीक्षा की। कोर्ट ने अपीलकर्ता की इस दलील को खारिज कर दिया कि धारा 326 के लिए गहरे कटे हुए घाव का होना जरूरी है। आईपीसी की धारा 320 के तहत ‘हड्डी या दांत का टूटना या विस्थापित होना’ ‘गंभीर चोट’ (grievous hurt) की श्रेणी में आता है। सीटी स्कैन और डॉक्टरों की गवाही से यह साबित हुआ कि शिकायतकर्ता की नाक की हड्डी में फ्रैक्चर हुआ था जो बिलहुक से हुआ था, जो कि एक खतरनाक हथियार है। इसलिए, धारा 326 आईपीसी के तहत दोषसिद्धि को कोर्ट ने सही माना।

अदालत का निर्णय

सुप्रीम कोर्ट ने इस अपील को आंशिक रूप से स्वीकार कर लिया। कोर्ट ने अपीलकर्ता को आईपीसी की धारा 294(बी) और 506(ii) के तहत दी गई सजा को रद्द कर दिया। वहीं, धारा 326 आईपीसी के तहत दोषसिद्धि को बरकरार रखते हुए कोर्ट ने इस तथ्य पर विचार किया कि यह विवाद परिवार के जमीनी विवाद से जुड़ा था। इसके साथ ही अपीलकर्ता की आयु (लगभग 70 वर्ष) और उनके स्वास्थ्य को ध्यान में रखा गया।

परिणामस्वरूप, खंडपीठ ने उनकी कारावास की सजा को बदलकर ‘अदालत के उठने तक’ की सजा में तब्दील कर दिया और उन पर 50,000 रुपये का जुर्माना लगाया, जिसे दो महीने के भीतर जमा करना होगा।

मामले का विवरण

मामले का शीर्षक: मणि @ सुब्रमण्यम बनाम राज्य, पुलिस उप अधीक्षक द्वारा प्रतिनिधि
वाद संख्या: 2026 की आपराधिक अपील संख्या (विशेष अनुमति याचिका (क्रिमिनल) संख्या 4516/2025 से उत्पन्न)
पीठ: जस्टिस संजय करोल, जस्टिस विपुल एम. पंचोली
निर्णय की तिथि: 17 जुलाई 2026

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