जिस फ्लैट में मिला शव, उसकी किराएदारी साबित करने में विफलता साक्ष्य अधिनियम की धारा 106 पर निर्भरता को करती है निष्फल: सुप्रीम कोर्ट ने हत्या के आरोपी को किया बरी

सुप्रीम कोर्ट ने अपहरण और हत्या के मामले में दोषी ठहराए गए एक आरोपी की दोषसिद्धि और सजा को रद्द करते हुए निर्णय दिया कि अभियोजन पक्ष द्वारा फ्लैट के मालिकाना हक या आरोपी की किराएदारी साबित न कर पाने से भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 की धारा 106 के तहत प्रतिकूल निष्कर्ष का आधार पूरी तरह समाप्त हो जाता है। जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की पीठ ने स्पष्ट किया कि पोस्टमार्टम रिपोर्ट और शव की बरामदगी के अलावा, अपीलकर्ता को हत्या या उस फ्लैट से जोड़ने वाला कोई भी ठोस साक्ष्य रिकॉर्ड पर मौजूद नहीं था, जहां से शव बरामद किया गया था।

मामले की पृष्ठभूमि

अभियोजन की कहानी एक ऐसे व्यक्ति से शुरू हुई जो घर से हैदराबाद के लिए निकला था और अगले दिन तक फोन पर उससे संपर्क नहीं हो सका। इसके दो दिन बाद उसके पिता (पीडब्ल्यू1) को फिरौती के लिए फोन आया, जिसमें एक बैंक खाते में 2,00,000 रुपये जमा करने का निर्देश दिया गया। इसके दो दिन बाद पीडब्ल्यू1 ने पुलिस में शिकायत (प्रदर्श पी1) दर्ज कराई और गीतांजलि नामक खाते में 1,50,000 रुपये जमा करा दिए।

जांच अधिकारी (पीडब्ल्यू11) ने दो फोन नंबरों के बीच हुई बातचीत के आधार पर आरोपी ए6 को गिरफ्तार किया। कथित तौर पर ए6 की निशानदेही पर उप्पल स्थित एआरके रेजिडेंसी के फ्लैट नंबर 402 से लापता व्यक्ति का शव एक फ्रिज के अंदर से बरामद किया गया। इसके साथ ही ए6 ने पांच अन्य आरोपियों (ए1 से ए5) की संलिप्तता के बारे में भी स्वीकारोक्ति दी।

इस मामले में छह लोगों को आरोपी बनाया गया था। मुकदमे की सुनवाई के दौरान आरोपी ए4 की मृत्यु हो गई, जबकि ट्रायल कोर्ट ने ए1, ए2, ए3, ए5 और ए6 को दोषी ठहराते हुए सजा सुनाई। अपील पर सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने ए2, ए3, ए5 और ए6 को बरी कर दिया, लेकिन चौकीदार (पीडब्ल्यू3) की गवाही और साक्ष्य अधिनियम की धारा 106 के तहत प्रतिकूल निष्कर्ष के आधार पर ए1 की दोषसिद्धि और सजा को बरकरार रखा, क्योंकि वह किराए के फ्लैट में शव की मौजूदगी का कोई स्पष्टीकरण नहीं दे पाया था। इसके बाद ए1 ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।

केवल बिना पुष्टि वाले इकबालिया बयानों पर आधारित कहानी

अभियोजन का आरोप था कि ए1 एक आदतन अपराधी था, जो जेल में ए4 से मिला था। जेल से छूटने के बाद ए1 सिरिसिल्ला में रहने लगा, जहां का ए4 निवासी था, और वे राजनीति में शामिल हो गए। वहां ए1 के ए2 के साथ घनिष्ठ संबंध बन गए, जो मृतक के मकान में किराएदार थी। अभियोजन के अनुसार मृतक के भी ए2 के साथ अवैध संबंध थे। ए1 और ए2 ने मिलकर मृतक का फिरौती के लिए अपहरण करने की साजिश रची, क्योंकि ए2 ने ए1 को बताया था कि मृतक के पिता फिरौती देने में सक्षम हैं। बाद में ए1 ने ए3 से शादी कर ली और फिर ए1 ने ए3 से लेकर ए6 के साथ मिलकर अपहरण की योजना बनाई, जिसके परिणामस्वरूप हत्या हुई।

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सुप्रीम कोर्ट ने इस पूरी कहानी को खारिज करते हुए टिप्पणी की:

“हमें तुरंत इस बात पर ध्यान देना होगा कि इकबालिया बयानों के अलावा उपरोक्त कहानी को साबित करने के लिए कुछ भी नहीं था, और इन इकबालिया बयानों पर किसी भी आरोपी को फंसाने के लिए कतई भरोसा नहीं किया जा सकता।”

पूर्व निष्कर्ष और खारिज किए गए साक्ष्य

हाईकोर्ट ने पहले ही अभियोजन पक्ष के कई महत्वपूर्ण साक्ष्यों को खारिज कर दिया था:

  • एटीएम सीसीटीवी फुटेज: रकम की निकासी दिखाने वाले सीसीटीवी फुटेज पर इसलिए भरोसा नहीं किया जा सका क्योंकि फुटेज से आरोपियों की पहचान नहीं हो सकी थी और साक्ष्य अधिनियम की धारा 65बी के तहत अनिवार्य प्रमाण पत्र भी प्रस्तुत नहीं किया गया था।
  • कॉल रिकॉर्ड्स: जांच अधिकारी द्वारा पेश किए गए मोबाइल कॉल विवरण पर विचार नहीं किया जा सका, क्योंकि सर्विस प्रोवाइडर के नोडल अधिकारी का परीक्षण नहीं कराया गया था और धारा 65बी का प्रमाण पत्र भी रिकॉर्ड पर नहीं लाया गया था।
  • टेस्ट आइडेंटिफिकेशन परेड (टीआईपी): ए1, ए3 और ए5 की पहचान परेड को अविश्वसनीय माना गया, क्योंकि गवाह पीडब्ल्यू3 ने स्वीकार किया था कि अज्ञात आरोपियों की पहचान के लिए जेल ले जाने से पहले पुलिस ने उसे संदिग्धों की तस्वीरें दिखाई थीं।

कोर्ट का विश्लेषण: धारा 106 और ‘अंतिम बार देखे जाने’ के सिद्धांत की विफलता

हाईकोर्ट द्वारा भरोसा किए गए शेष आधारों—पीडब्ल्यू3 की गवाही और साक्ष्य अधिनियम की धारा 106 के अनुप्रयोग—की समीक्षा करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने इसमें गंभीर खामियां पाईं।

पीडब्ल्यू3, जिसने एआरके रेजिडेंसी में चौकीदार के रूप में काम करने का दावा किया था, ने गवाही दी थी कि ए1 ने 17 जून 2011 को फ्लैट नंबर 402 किराए पर लिया था और ए3 व ए5 के जाने से दो दिन पहले उसने ए1 को मृतक को फ्लैट में लाते देखा था। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि पीडब्ल्यू3 के चौकीदार होने का कोई दस्तावेजी सबूत पेश नहीं किया गया, कोई आगंतुक रजिस्टर (विजिटर्स रजिस्टर) पेश नहीं हुआ और न ही ए1 व फ्लैट मालिक के बीच कोई लीज डीड प्रस्तुत की गई। इसके अलावा, 17 फ्लैटों वाले परिसर के किसी भी अन्य निवासी से पूछताछ नहीं की गई ताकि परिसर में ए1 और अन्य आरोपियों की उपस्थिति साबित हो सके।

इसी प्रकार, फ्लैट का मालिक होने का दावा करने वाले पीडब्ल्यू4 ने अपने मालिकाना हक से जुड़ा कोई भी दस्तावेज पेश नहीं किया। जिरह के दौरान उसने स्वीकार किया कि पुलिस ने उससे कभी मालिकाना हक साबित करने वाले दस्तावेज मांगे ही नहीं थे।

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साक्ष्य अधिनियम की धारा 106 के लागू होने को खारिज करते हुए कोर्ट ने कहा:

“जिस फ्लैट से शव बरामद हुआ, उसके मालिकाना हक और फ्लैट में पीडब्ल्यू3 के चौकीदार के रूप में कार्यरत होने के साक्ष्य का अभाव, ए1 को किराए पर दिए जाने के सिद्धांत को पूरी तरह ध्वस्त कर देता है; और नतीजतन साक्ष्य अधिनियम की धारा 106 पर की गई निर्भरता—अर्थात ए1 द्वारा किराए पर लिए गए फ्लैट में शव की मौजूदगी का कोई उचित स्पष्टीकरण न होना—भी निष्फल हो जाती है। यह इस ‘अंतिम बार देखे जाने’ के सिद्धांत पर भी संदेह का गहरा साया डालता है कि ए1 मृतक को उस फ्लैट में लेकर गया था जहां से उसका शव बरामद हुआ।”

जांच की कार्यशैली पर गंभीर असंतोष व्यक्त करते हुए पीठ ने टिप्पणी की:

“जैसा कि हमने शुरुआत में ही देखा, अभियोजन पक्ष द्वारा ट्रायल कोर्ट के समक्ष कोई ठोस साक्ष्य प्रस्तुत नहीं किया गया था। जांच अत्यंत लचर थी और केवल इकबालिया बयानों तथा उनसे निकलकर सामने आई अश्लील कहानी पर आधारित थी, जिसमें ए1 को ए2 व ए3 से और ए2 को मृतक से जोड़ा गया था।”

मामले के अन्य पहलुओं पर विचार करते हुए कोर्ट ने पाया:

  • कॉल रिकॉर्ड्स: नोडल अधिकारी के जरिए कॉल रिकॉर्ड साबित न होने और धारा 65बी का प्रमाण पत्र न होने के कारण, “कॉल रिकॉर्ड्स के सावधानीपूर्वक विश्लेषण की पूरी कहानी धराशायी हो जाती है।”
  • ए6 का बयान और बरामदगी: ए6 को पहले ही बरी किया जा चुका था। ऐसे में यदि उसकी निशानदेही पर शव की बरामदगी साबित भी मानी जाए, तो वह ए1 को दोषी ठहराने के लिए प्रयुक्त नहीं हो सकती, विशेषकर तब जब जब्ती या बयान के संबंध में किसी स्वतंत्र गवाह का परीक्षण नहीं कराया गया।
  • पैसे का लेन-देन: बरामद नकदी को अपहरण और फिरौती के अपराध से नहीं जोड़ा जा सका। गीतांजलि के खाते में पैसा जमा कराया गया था, लेकिन उस संबंध में कोई जांच नहीं हुई, खाताधारक को अदालत में नहीं लाया गया और न ही बैंक अधिकारियों का परीक्षण कराकर बैंक स्टेटमेंट या निकासी साबित की गई।
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पोस्टमार्टम रिपोर्ट से यह स्थापित हुआ था कि मृतक की मृत्यु ‘गला घोंटने से जुड़ी सांस रुकने (स्मदरिंग)’ के कारण हुई थी। इस पर कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला:

“पोस्टमार्टम रिपोर्ट से यह तो स्थापित होता है कि मृतक की मृत्यु ‘गला घोंटने से जुड़ी सांस रुकने’ के कारण हुई थी और शव एक फ्लैट के भीतर फ्रिज में छिपा हुआ पाया गया था। लेकिन इसके अलावा, ए1 से ए6 को इस हत्या या उस फ्लैट से जोड़ने वाला कोई भी ऐसा साक्ष्य मौजूद नहीं है जिस पर भरोसा किया जा सके। जांच अधिकारी पूरी तरह से इकबालिया बयानों के आधार पर ही आगे बढ़े और आरोपियों को इस अपराध से जोड़ने वाला कोई ठोस साक्ष्य जुटाने में विफल रहे।”

कोर्ट का निर्णय

सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट द्वारा ए1 के खिलाफ पारित दोषसिद्धि और सजा के आदेश को बरकरार रखने का कोई आधार नहीं पाया और उसे पूरी तरह निरस्त कर दिया। कोर्ट ने अपील स्वीकार करते हुए निर्देश दिया कि यदि अपीलकर्ता अभी भी हिरासत में है, तो उसे किसी अन्य मामले में वांछित न होने की स्थिति में तत्काल रिहा किया जाए। यदि वह पहले से ही रिहा हो चुका है, तो निष्पादित किए गए जमानत बांड निरस्त माने जाएंगे।

मामले का विवरण

मामले का शीर्षक: कोंडापाका श्रीधर उर्फ शेखर उर्फ मधु उर्फ गोपी उर्फ चिन्ना बनाम तेलंगाना राज्य
वाद संख्या: क्रिमिनल अपील संख्या 4512/2025
पीठ: जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन
निर्णय की तिथि: 03 सितंबर, 2026

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