पुणे मानसिक अस्पताल में मरीज की मौत पर महाराष्ट्र सरकार को 22 लाख रुपये मुआवजा देने का हाईकोर्ट का निर्देश

बॉम्बे हाईकोर्ट ने महाराष्ट्र सरकार को निर्देश दिया है कि वह पुणे के सरकारी यरवदा मानसिक अस्पताल में नवंबर 2013 में दूसरे मरीज द्वारा मारे गए एक 50 वर्षीय व्यक्ति के परिवार को 22 लाख रुपये का मुआवजा दे। हाईकोर्ट ने इस मौत के लिए राज्य सरकार को जिम्मेदार ठहराते हुए कहा कि अस्पताल प्रशासन ने कर्तव्य के पालन में गंभीर लापरवाही बरती और अपने संरक्षण में मौजूद मरीजों की सुरक्षा करने में पूरी तरह नाकाम रहा।

जस्टिस मनीष एम. पितले और जस्टिस श्रीराम वी. शिरसात की खंडपीठ ने पीड़ित की विधवा की ओर से साल 2017 में दायर याचिका पर यह आदेश जारी किया। हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को आठ हफ्ते के भीतर मुआवजे का भुगतान करने का निर्देश दिया है और कहा है कि इस राशि का उपयोग महिला और उसके दो बच्चों के कल्याण के लिए किया जाए।

अस्पताल में स्टाफ की भारी कमी

हाईकोर्ट ने घटना वाली रात अस्पताल में कर्मचारियों की भारी कमी का विशेष रूप से उल्लेख किया। उस रात ऑब्जर्वेशन वार्ड (निगरानी वार्ड) में 77 मरीजों की देखभाल के लिए केवल तीन कर्मचारी ही ड्यूटी पर तैनात थे। हाईकोर्ट ने कहा कि यह अनुपात साफ तौर पर दर्शाता है कि सरकारी अस्पताल का प्रबंधन बेहद लापरवाही भरे तरीके से किया जा रहा था।

जानलेवा हमले का पूरा ब्योरा

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रियल एस्टेट का कारोबार करने वाले पीड़ित सिजोफ्रेनिया बीमारी से पीड़ित थे। उन्हें चिकित्सकीय सलाह पर 19 नवंबर 2013 को यरवदा मानसिक अस्पताल में भर्ती कराया गया था। अस्पताल के कर्मचारियों ने उनकी पत्नी को भरोसा दिलाया था कि वह जल्द ही ठीक हो जाएंगे। लेकिन भर्ती होने के महज दो दिन बाद, यानी 21 नवंबर 2013 को उन्हें सूचित किया गया कि बीती रात अस्पताल के ही एक अन्य मरीज ने उनके पति की हत्या कर दी है।

घटना के वक्त ड्यूटी पर मौजूद एक कर्मचारी ने हमलावर मरीज को पीड़ित पर बेरहमी से हमला करते हुए देखा था। बाद में आई पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट से पता चला कि पीड़ित की मौत सिर में गंभीर चोट लगने और गला घोंटने के कारण हुई थी। इसी हमलावर मरीज ने एक और मरीज पर भी हमला किया था, जिसकी भी सिर में चोट लगने के कारण मौत हो गई थी।

कानूनी प्रक्रिया और पीड़ित परिवार की स्थिति

इस घटना के बाद आरोपी मरीज के खिलाफ प्राथमिकी (एफआईआर) दर्ज की गई थी। हालांकि, आरोपी की मानसिक स्थिति ठीक न होने और उसका लगातार इलाज चलने के कारण अभी तक आपराधिक सुनवाई रुकी हुई है।

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अपने फैसले में हाईकोर्ट ने जोर देकर कहा कि चूंकि मृतक राज्य की कस्टडी (संरक्षण) में था, इसलिए उसके मौलिक अधिकारों की रक्षा करने की जिम्मेदारी सरकार की थी। हाईकोर्ट ने पीड़ित परिवार पर पड़े गंभीर आर्थिक और मानसिक प्रभाव का भी संज्ञान लिया। मृतक ही अपने परिवार का एकमात्र कमाने वाला सदस्य था। इसके अलावा, दंपत्ति का एक बेटा 90 प्रतिशत मानसिक दिव्यांगता से पीड़ित है, जो कभी स्वतंत्र रूप से कमाने की स्थिति में नहीं आ पाएगा और उसे जीवनभर सहारे की जरूरत होगी।

कोर्ट ने इस बात पर भी ध्यान दिया कि पीड़ित परिवार पिछले लगभग नौ वर्षों से इस मामले में कानूनी लड़ाई लड़ रहा है। खंडपीठ ने यह भी आदेश दिया कि सरकार द्वारा पहले दी जा चुकी 1 लाख रुपये की अनुग्रह राशि (एक्स-ग्रेशिया) को इस 22 लाख रुपये के मुआवजे में से काटा नहीं जाएगा।

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