इलाहाबाद हाईकोर्ट ने BNSS के तहत ‘ट्रायल इन एब्सेंटिया’ पर जारी किए विस्तृत दिशा-निर्देश; घोषित अपराधियों के खिलाफ समयबद्ध तरीके से मुकदमा समाप्त करने का निर्देश

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS), 2023 के तहत ‘घोषित अपराधियों’ (Proclaimed Offenders) की अनुपस्थिति में मुकदमा चलाने (Trial in Absentia) के संबंध में विस्तृत दिशा-निर्देश और समय-सीमा जारी की है। न्यायमूर्ति प्रवीन कुमार गिरी ने एक गैर-जमानती वारंट (NBW) को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई करते हुए स्पष्ट किया कि अब कानून में ऐसे पुख्ता प्रावधान हैं जो यह सुनिश्चित करते हैं कि किसी आरोपी के फरार होने से न्याय की प्रक्रिया न रुके।

हाईकोर्ट ने कहा कि BNSS की धारा 356 के तहत, यदि कोई घोषित अपराधी मुकदमे से बचने के लिए फरार हो जाता है और उसकी गिरफ्तारी की कोई तत्काल संभावना नहीं होती, तो इसे आरोपी द्वारा अपनी उपस्थिति के अधिकार का त्याग माना जाएगा। ऐसी स्थिति में कोर्ट को उसकी अनुपस्थिति में मुकदमा आगे बढ़ाने और फैसला सुनाने का अधिकार है।

मामले की पृष्ठभूमि

याचिकाकर्ता रवि उर्फ रविंद्र सिंह ने BNSS की धारा 528 (पूर्ववर्ती CrPC की धारा 482) के तहत हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। याचिका में अपर सत्र न्यायाधीश, आगरा द्वारा 18 अक्टूबर, 2024 को जारी किए गए गैर-जमानती वारंट को रद्द करने की मांग की गई थी।

यह मामला 24 नवंबर, 2020 को पुलिस स्टेशन सैंया, आगरा में दर्ज एक FIR से जुड़ा है, जो IPC की धारा 307 और 504 के तहत दर्ज की गई थी। याचिकाकर्ता को दिसंबर 2021 में हाईकोर्ट से जमानत मिल गई थी और फरवरी 2024 में उसकी उपस्थिति में आरोप (Charges) भी तय कर दिए गए थे। हालांकि, इसके बाद वह कई तारीखों पर ट्रायल कोर्ट में पेश नहीं हुआ, जिसके बाद कोर्ट ने NBW, कुर्की और उद्घोषणा की कार्रवाई शुरू की।

पक्षों के तर्क

याचिकाकर्ता के वकील: याचिकाकर्ता के वकील ने तर्क दिया कि ट्रायल कोर्ट ने सीधे गैर-जमानती वारंट जारी कर दिया, जो कानून के खिलाफ है। उनके अनुसार, चूंकि आरोपी पहले से जमानत पर था, इसलिए कोर्ट को धारा 89 CrPC (अब BNSS की धारा 92) की प्रक्रिया अपनानी चाहिए थी और कुर्की से पहले जमानत बांड को जब्त करने का नोटिस देना चाहिए था।

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सरकारी वकील (A.G.A.): राज्य सरकार की ओर से तर्क दिया गया कि आरोपी जानबूझकर कोर्ट के साथ ‘लुका-छिपी’ खेल रहा है। उन्होंने बताया कि आरोपी को कार्यवाही की पूरी जानकारी थी, आरोप उसकी मौजूदगी में तय हुए थे और वह पहले भी एक वारंट रिकॉल करवा चुका था, लेकिन फिर फरार हो गया। उन्होंने कहा कि आरोपी की इस रणनीति से ट्रायल में देरी हो रही है और अन्य सह-आरोपियों को परेशानी हो रही है।

कोर्ट का विश्लेषण और महत्वपूर्ण टिप्पणियां

हाईकोर्ट ने पाया कि याचिकाकर्ता अक्टूबर 2024 से लगभग 29 तारीखों पर अनुपस्थित रहा। जस्टिस गिरी ने BNSS की धाराओं का हवाला देते हुए कहा कि धारा 228 और 355 के तहत आरोपी की व्यक्तिगत उपस्थिति अनिवार्य है, जब तक कि उसे छूट न दी गई हो।

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धारा 356 को एक ‘ऐतिहासिक प्रावधान’ बताते हुए हाईकोर्ट ने कहा:

“भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS), 2023 की धारा 356… अदालत को ऐसे आरोपी के खिलाफ जांच, ट्रायल या फैसला सुनाने की अनुमति देती है जिसे घोषित अपराधी करार दिया गया है और वह जानबूझकर गिरफ्तारी से बच रहा है।”

कोर्ट ने आरोपी के फरार होने की चार अलग-अलग स्थितियों का उल्लेख किया और त्वरित सुनवाई के लिए प्रक्रिया निर्धारित की। अनुपस्थिति में ट्रायल (Trial in Absentia) शुरू करने के लिए कोर्ट ने निम्नलिखित शर्तें अनिवार्य बताईं:

  1. कम से कम 30 दिनों के अंतराल पर दो लगातार गिरफ्तारी वारंट जारी किए गए हों।
  2. स्थानीय या राष्ट्रीय समाचार पत्र में नोटिस प्रकाशित किया गया हो।
  3. आरोपी के रिश्तेदारों या दोस्तों को सूचित किया गया हो।
  4. आरोपी के घर और स्थानीय पुलिस स्टेशन पर जानकारी चस्पा की गई हो।
  5. आरोप तय होने की तारीख से 90 दिन बीत चुके हों।

कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि BNSS की धारा 209 (घोषणा के जवाब में पेश न होना) के तहत मुकदमा चलाने के लिए अब किसी लोक सेवक की लिखित शिकायत की अनिवार्य सीमा नहीं है, जैसा कि कुछ अन्य अपराधों में होता है।

फैसला और निर्देश

हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता को ट्रायल में सहयोग करने का अवसर देते हुए NBW के आदेश को दो महीने के लिए स्थगित रखा है। हालांकि, कोर्ट ने BNSS के प्रभावी कार्यान्वयन के लिए कड़े दिशा-निर्देश जारी किए हैं:

  • ट्रायल कोर्ट के लिए: पीठासीन अधिकारी बिना किसी ठोस कारण के सुनवाई स्थगित नहीं करेंगे। लापरवाही के कारण देरी होने पर अधिकारियों के खिलाफ विभागीय कार्रवाई की जा सकती है।
  • पुलिस के लिए: समन और वारंट तामील करने की सभी प्रविष्टियां (G.D. entries) अनिवार्य रूप से ऑनलाइन पोर्टल (NSTEP/CIS) पर अपलोड करनी होंगी। ऐसा न करने पर पुलिस अधिकारियों को दंडित किया जा सकता है।
  • अभियोजन के लिए: अभियोजन निदेशालयों को उन मामलों की निगरानी करने का निर्देश दिया गया है जिनमें सजा 7 साल या उससे अधिक है।
  • राज्य सरकार के लिए: DGP और अभियोजन निदेशक को यह आदेश 60 दिनों के भीतर सभी संबंधित अधिकारियों तक पहुंचाने का निर्देश दिया गया है।
  • लक्ष्मण रेखा (समय सीमा): कोर्ट ने BNSS में निर्धारित समय-सीमाओं को दोहराया, जैसे यौन अपराधों का ट्रायल 2 महीने में पूरा करना और अंतिम बहस के 30-45 दिनों के भीतर फैसला सुनाना।
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हाईकोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि ये नए प्रावधान आपराधिक न्याय प्रक्रिया के हर चरण के लिए एक “लक्ष्मण रेखा” तय करने के उद्देश्य से हैं, ताकि आरोपी और पीड़ित दोनों को त्वरित न्याय मिल सके।

मामले का विवरण

  • केस टाइटल: रवि उर्फ रविंद्र सिंह बनाम उत्तर प्रदेश राज्य व अन्य
  • केस नंबर: APPLICATION U/S 528 BNSS No. 7980 of 2026
  • बेंच: जस्टिस प्रवीन कुमार गिरी
  • दिनांक: 5 मई, 2026

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