बॉम्बे हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि सिविल मुकदमों में पक्षकारों को उनकी इच्छा के विरुद्ध मध्यस्थता (Mediation) के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता, भले ही वे आपस में करीबी रिश्तेदार ही क्यों न हों। हाईकोर्ट ने कहा कि हालांकि पारिवारिक विवादों में मध्यस्थता एक बेहतर विकल्प है, लेकिन मध्यस्थता अधिनियम, 2023 और सिविल प्रक्रिया संहिता (CPC) की धारा 89 के तहत सभी पक्षकारों की सहमति के बिना इसे अनिवार्य नहीं बनाया गया है।
जस्टिस राजेश एस. पाटिल ने वादी (Plaintiffs) द्वारा मामले को मध्यस्थता के लिए भेजने की याचिका को खारिज करते हुए टिप्पणी की: “मध्यस्थता अधिनियम, 2023 किसी भी अनिवार्य मध्यस्थता का प्रावधान नहीं करता है और न ही यह कोर्ट को सभी पक्षों की सहमति के बिना मध्यस्थता का आदेश देने की शक्ति देता है।”
मामले की पृष्ठभूमि
यह विवाद 1994 के एक पारिवारिक समझौते (Family Arrangement) के विशिष्ट निष्पादन (Specific Performance) के लिए 2023 में दायर एक मुकदमे से संबंधित है। इसमें वादी संख्या 1 सुगंधा हिरेमठ, प्रतिवादी संख्या 1 बाबासाहेब नीलकंठ कल्याणी और प्रतिवादी संख्या 5 गौरीशंकर नीलकंठ कल्याणी की बहन हैं। कल्याणी परिवार के बीच पुणे जिला कोर्ट सहित कराड और सतारा की अदालतों में विभाजन (Partition) और प्रोबेट याचिकाओं जैसे कई कानूनी विवाद चल रहे हैं। सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने आपसी रिश्तों को देखते हुए मध्यस्थता का सुझाव दिया था।
पक्षकारों के तर्क
वादी (Plaintiffs) की दलीलें: वादी की ओर से सीनियर एडवोकेट जनक द्वारकादास ने तर्क दिया कि कोर्ट के पास प्रतिवादी नंबर 1 की सहमति के बिना भी मामले को मध्यस्थता के लिए भेजने का अधिकार है। उन्होंने कहा कि यदि सफलता की “1% संभावना” भी हो, तो भी कोर्ट को प्रयास करना चाहिए। उन्होंने अफकॉन्स इंफ्रास्ट्रक्चर लिमिटेड बनाम चेरियन वर्की कंस्ट्रक्शन और महेंद्र नाथ सोरल बनाम रवींद्र नाथ सोरल जैसे सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला दिया।
प्रतिवादी नंबर 1 (Defendant No. 1) की दलीलें: प्रतिवादी नंबर 1 की ओर से सीनियर एडवोकेट डॉ. वीरेंद्र तुलजापुरकर ने मध्यस्थता के प्रस्ताव का कड़ा विरोध किया। उन्होंने कोर्ट को बताया कि पूर्व में सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर एक प्रसिद्ध मध्यस्थ द्वारा की गई कोशिशें विफल रही थीं। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि वादी का समझौता करने का इरादा नेक नहीं है, क्योंकि वे अन्य अदालतों में सुनवाई जारी रखे हुए हैं और मध्यस्थता से जुड़ी खबरों को मीडिया में लीक किया गया, जिससे उनके निवेशकों के बीच गलत संदेश गया।
हाईकोर्ट का विश्लेषण
हाईकोर्ट ने भारत में मध्यस्थता से संबंधित कानूनी ढांचे, विशेष रूप से मध्यस्थता अधिनियम, 2023, CPC की धारा 89 और वाणिज्यिक न्यायालय अधिनियम (Commercial Courts Act), 2015 की धारा 12-ए का विश्लेषण किया।
1. मध्यस्थता की स्वैच्छिक प्रकृति: हाईकोर्ट ने उल्लेख किया कि कमर्शियल कोर्ट एक्ट की धारा 12-ए के तहत वाणिज्यिक मुकदमों में मध्यस्थता अनिवार्य है, लेकिन सामान्य सिविल मुकदमों के लिए ऐसा कोई बंधन नहीं है। मध्यस्थता अधिनियम, 2023 की धारा 5 (जो अभी पूरी तरह अधिसूचित नहीं है) का उल्लेख करते हुए कोर्ट ने “स्वैच्छिक और आपसी सहमति से” वाक्यांश पर जोर दिया, जो इसे एक सहमति-आधारित प्रक्रिया बनाता है।
2. न्यायिक मिसालें: हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के रूपा एंड कंपनी लिमिटेड बनाम फरहाद हकीम (2025) के हालिया फैसले का हवाला दिया, जिसमें कहा गया था: “मध्यस्थता किसी भी पक्ष पर थोपी नहीं जा सकती।” कोर्ट ने वादी द्वारा पेश किए गए पुराने फैसलों को वर्तमान कानून और 2023 के संशोधनों के आलोक में अलग माना।
3. ‘समझौते के तत्वों’ का अभाव: जस्टिस पाटिल ने कहा कि CPC की धारा 89 के तहत किसी मामले को मध्यस्थता के लिए भेजने से पहले कोर्ट को यह संतुष्ट होना चाहिए कि वहां “समझौते के ऐसे तत्व मौजूद हैं जो पक्षों को स्वीकार्य हो सकते हैं।” इस मामले में, कोर्ट ने पाया कि पिछले विफल प्रयासों और किसी भी ठोस प्रस्ताव के अभाव को देखते हुए मध्यस्थता की कोई संभावना नहीं दिखती।
हाईकोर्ट का निर्णय
हाईकोर्ट ने यह निष्कर्ष निकालते हुए कि समझौते की कोई गुंजाइश नहीं है, वादी की अर्जी खारिज कर दी। कोर्ट ने कहा: “उपरोक्त विश्लेषण के आलोक में, मेरी राय में, मुझे इसमें कोई संदेह नहीं है कि पक्षकारों के बीच मध्यस्थता के माध्यम से समझौते की कोई संभावना नहीं है।”
अब यह मुकदमा अपने गुण-दोष (Merits) के आधार पर आगे बढ़ेगा।
केस विवरण
केस टाइटल: सुगंधा हिरेमठ एवं अन्य बनाम बाबासाहेब नीलकंठ कल्याणी एवं अन्य
केस नंबर: अंतरिम आवेदन संख्या 5241/2025 (सूट नंबर 250/2023 में)
बेंच: जस्टिस राजेश एस. पाटिल
तारीख: 04 मई, 2026

