दमन और कुप्रबंधन के मामलों में सदस्यता के लिए ‘रजिस्टर ऑफ मेंबर्स’ में नाम होना ही एकमात्र पैमाना नहीं: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि कंपनी अधिनियम, 1956 की धारा 397 और 398 के तहत ‘सदस्य’ (member) के रूप में दर्जा निर्धारित करने के लिए रजिस्टर ऑफ मेंबर्स में नाम का होना ही एकमात्र अनिवार्य शर्त नहीं है। जस्टिस पमिदिघंटम श्री नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की पीठ ने कहा कि यदि कंपनी के आचरण और अन्य दस्तावेजों से किसी व्यक्ति का हित (stakeholder interest) सिद्ध होता है, तो उसे सदस्यता का हकदार माना जा सकता है।

कानूनी मुद्दा

इस मामले में मुख्य विवाद यह था कि क्या प्रतिवादी संख्या 1, धनंजय पांडे, को ‘डॉ. बैस सर्जिकल एंड मेडिकल इंस्टीट्यूट प्राइवेट लिमिटेड’ का सदस्य माना जा सकता है? अपीलकर्ताओं का तर्क था कि चूंकि पांडे का नाम औपचारिक रूप से कंपनी के सदस्यों के रजिस्टर में दर्ज नहीं था, इसलिए वे दमन और कुप्रबंधन (oppression and mismanagement) के खिलाफ याचिका दायर करने के पात्र नहीं हैं। सुप्रीम कोर्ट ने कंपनी और उसके निदेशकों की अपीलों को खारिज करते हुए कंपनी लॉ बोर्ड (CLB) और हाईकोर्ट के उस फैसले को सही ठहराया जिसमें पांडे को कंपनी के आचरण के आधार पर सदस्य माना गया था।

मामले की पृष्ठभूमि

अपीलकर्ता कंपनी का गठन 1994 में हुआ था। 1998 में वित्तीय कठिनाइयों के दौरान, धनंजय पांडे ने कंपनी में निवेश का प्रस्ताव दिया, बशर्ते उन्हें प्रबंध निदेशक नियुक्त किया जाए और अस्पताल को एक विशेष कार्डियक सेंटर में बदला जाए। इसके बाद उन्हें पांच साल के लिए प्रबंध निदेशक नियुक्त किया गया।

पांडे का दावा था कि 15 जुलाई 1999 को बोर्ड की बैठक में उनके द्वारा दिए गए ‘शेयर एप्लिकेशन मनी’ के बदले उन्हें 14,75,998 शेयर आवंटित किए गए थे। बाद में विवादों और निलंबन के बाद, पांडे ने 2001 में याचिका दायर की। उनका मुख्य आरोप था कि निवेश के बावजूद कंपनी ने उन्हें शेयर सर्टिफिकेट जारी नहीं किए। अपीलकर्ताओं ने धारा 399 के तहत पांडे की याचिका की वैधता (locus standi) को चुनौती दी।

पक्षों के तर्क

अपीलकर्ताओं की ओर से: वरिष्ठ अधिवक्ता श्री श्याम मेहता ने तर्क दिया कि कंपनी अधिनियम, 1956 की धारा 41 के तहत ‘सदस्य’ केवल वही है जिसका नाम रजिस्टर में दर्ज हो। उनके तर्क थे:

  • सदस्यता एक ‘क्षेत्राधिकार संबंधी तथ्य’ (jurisdictional fact) है जिसके बिना धारा 397 और 398 के तहत कार्यवाही नहीं हो सकती।
  • पांडे ने पहले पैसे की वसूली के लिए दीवानी मुकदमा दायर किया था, जिससे साबित होता है कि उन्होंने अपने निवेश को शेयर पूंजी के बजाय एक ऋण (debt) माना था।
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प्रतिवादी की ओर से: धनंजय पांडे के वकीलों ने तर्क दिया कि:

  • रजिस्टर में नाम दर्ज करना कंपनी की वैधानिक जिम्मेदारी थी और कंपनी अपनी ही गलती का लाभ नहीं उठा सकती।
  • पांडे ने भारी निवेश किया था जिसका उपयोग कंपनी ने अपने व्यवसाय में किया।
  • सदस्यता की ‘अति-तकनीकी’ व्याख्या करना अधिनियम के उपचारात्मक उद्देश्य को विफल कर देगा।

सुप्रीम कोर्ट का विश्लेषण

सुप्रीम कोर्ट ने धारा 2(27) (सदस्य की परिभाषा) और धारा 41 (सदस्यता प्राप्त करने के तरीके) के बीच के संबंधों की जांच की। कोर्ट ने पाया कि धारा 397 और 398 के तहत क्षेत्राधिकार ‘न्यायसंगत प्रकृति’ (equitable in character) का है।

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व्यापक बनाम संकीर्ण व्याख्या: पीठ ने महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा:

“धारा 397 और 398 की न्यायसंगत नींव एक मार्गदर्शक कारक होनी चाहिए ताकि ‘सदस्य’ शब्द की व्याख्या केवल औपचारिक रजिस्टर प्रविष्टि तक सीमित रखकर अति-प्रतिबंधात्मक या तकनीकी तरीके से न की जाए, जिससे विधायी योजना का उपचारात्मक उद्देश्य ही विफल हो जाए।”

कंपनी का आचरण: कोर्ट ने उन तथ्यों को रेखांकित किया जिन्होंने पांडे की सदस्यता को पुख्ता किया:

  1. 1998 में अपीलकर्ता संख्या 2 द्वारा लिखे गए पत्र में पांडे को “सह-मालिक” (co-owner) बताया गया था।
  2. सुलह कार्यवाही (conciliation) के दौरान उनके शेयर आवंटन की पात्रता स्वीकार की गई थी।
  3. अस्पताल का नाम बदलकर “एकवीरा हार्ट इंस्टीट्यूट” किया गया, जो पांडे के व्यावसायिक प्रतिष्ठान की पहचान थी।
  4. उनके निवेश का उपयोग कंपनी के विस्तार और अधिकृत पूंजी बढ़ाने के लिए किया गया था।
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कोर्ट ने दिल्ली हाईकोर्ट के उमेश कुमार बावेजा बनाम आईएल एंड एफएस ट्रांसपोर्टेशन नेटवर्क लिमिटेड मामले का भी जिक्र किया:

“…जब तक सार और प्रभाव में दमन और कुप्रबंधन की शिकायत करने वाले व्यक्ति को कंपनी के आचरण द्वारा शेयरधारक/सदस्य के रूप में मान्यता दी गई है… तब तक न्याय और समानता (equity) के विचारों को प्रभावी होने देना चाहिए।”

निर्णय

सुप्रीम कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि दस्तावेजों और कंपनी के लगातार आचरण से यह स्पष्ट है कि धनंजय पांडे के स्वामित्व हित को मान्यता दी गई थी। कोर्ट ने उन्हें ‘डीम्ड मेंबर’ (deemed member) मानने के फैसले में हस्तक्षेप करने का कोई कारण नहीं पाया। कोर्ट ने निर्देश दिया कि सुप्रीम कोर्ट में जमा की गई लगभग 2.59 करोड़ रुपये की राशि ब्याज सहित धनंजय पांडे को जारी की जाए।

केस विवरण:

  • केस का शीर्षक: डॉ. बैस सर्जिकल एंड मेडिकल इंस्टीट्यूट प्राइवेट लिमिटेड और अन्य बनाम धनंजय पांडे
  • केस संख्या: सिविल अपील संख्या 8973/2010 (सिविल अपील संख्या 9456/2010 के साथ)
  • पीठ: जस्टिस पमिदिघंटम श्री नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे
  • तारीख: 04 मई, 2026

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