मध्यप्रदेश हाईकोर्ट की इंदौर पीठ ने अनुकंपा नियुक्ति के दावों को लेकर एक महत्वपूर्ण निर्णय लिया है। हाईकोर्ट ने उन प्रशासनिक आदेशों को रद्द कर दिया है जिनमें अनुकंपा नियुक्ति की प्रक्रिया के लिए उत्तराधिकार प्रमाण पत्र (Succession Certificate) की मांग की गई थी। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि अनुकंपा नियुक्ति कोई पैतृक संपत्ति नहीं है जो उत्तराधिकार के माध्यम से हस्तांतरित हो, बल्कि यह मृतक सरकारी कर्मचारी के परिवार को तत्काल वित्तीय राहत देने के लिए दी जाने वाली एक रियायत है।
दो याचिकाओं (W.P. No. 13968/2023 और W.P. No. 6223/2024) पर एक साथ सुनवाई करते हुए जस्टिस जय कुमार पिल्लई ने स्पष्ट किया कि 2014 की नीति के अनुसार, पात्र आश्रितों की श्रेणी में विवाहित पुत्री की तुलना में पुत्र को वैधानिक प्राथमिकता प्राप्त है।
मामले की पृष्ठभूमि
यह कानूनी विवाद जिला अस्पताल रतलाम में ड्राइवर के पद पर कार्यरत श्री रमेशवन गोस्वामी की 22 जून, 2020 को हुई मृत्यु के बाद शुरू हुआ। उनके पुत्र रितेश वन (याचिकाकर्ता) ने दिसंबर 2021 में अनुकंपा नियुक्ति के लिए आवेदन किया था। हालांकि, उनकी बहन अनिता वन ने भी उसी पद के लिए अपना दावा पेश किया और मृतक के बेटों को मिलने वाले सेवा लाभों पर आपत्ति जताई।
दोनों पक्षों के प्रतिद्वंद्वी दावों को देखते हुए, विभाग ने 23 जनवरी और 6 फरवरी, 2024 को पत्र जारी कर दोनों को उत्तराधिकार प्रमाण पत्र प्रस्तुत करने का निर्देश दिया। रितेश वन ने इस शर्त को हाईकोर्ट में चुनौती दी, जबकि अनिता वन ने इन पत्रों को रद्द करने के साथ-साथ खुद की नियुक्ति और सेवा परिलब्धियों में $1/3$ हिस्से की मांग की थी।
पक्षों की दलीलें
रितेश वन के वकील की दलील: याचिकाकर्ता के वकील ने तर्क दिया कि पूरा परिवार मृतक पिता की आय पर निर्भर था। उन्होंने कहा कि अनिता वन एक विवाहित पुत्री हैं जो अलग रहती थीं और पिता ने अपने जीवनकाल में ही उनसे संबंध विच्छेद कर लिए थे। यह भी तर्क दिया गया कि अनिता वन पहले ही एक ‘अनापत्ति शपथ पत्र’ (No-objection affidavit) दे चुकी थीं, जिसके बाद अब वे आपत्ति दर्ज करने की पात्र नहीं हैं।
अनिता वन के वकील की दलील: अनिता वन ने हिंदू पुत्री होने के नाते सेवा परिलब्धियों में समान हिस्सेदारी का दावा किया। उन्होंने तर्क दिया कि “नामांकित व्यक्ति (Nominee) केवल एक कस्टोडियन होता है।” उन्होंने भाई द्वारा प्रस्तुत शपथ पत्र को फर्जी बताया और ‘वरिष्ठता के सिद्धांत’ का हवाला देते हुए कहा कि बड़ी संतान होने के नाते उन्हें प्राथमिकता मिलनी चाहिए। उन्होंने इस संबंध में राज किशोर कुमार बनाम बिहार राज्य और पीयूष कुमार अंचल बनाम छत्तीसगढ़ राज्य के मामलों का उदाहरण दिया।
राज्य सरकार और अन्य प्रतिवादियों की दलील: राज्य सरकार ने उत्तराधिकार प्रमाण पत्र की मांग को उचित ठहराते हुए कहा कि यह कानूनी वारिसों का पता लगाने के लिए आवश्यक था। अन्य प्रतिवादियों ने प्रारंभिक आपत्ति जताई कि मामला अभी अपरिपक्व है क्योंकि उत्तराधिकार प्रमाण पत्र का मामला रतलाम की सिविल कोर्ट में लंबित है।
हाईकोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणी
हाईकोर्ट ने प्रशासनिक अधिकारियों के रुख को “मौलिक रूप से गलत” पाया। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि उत्तराधिकार प्रमाण पत्र बैंक खातों, शेयरों और अन्य चल संपत्तियों के दावों के लिए होता है ताकि संस्थान सही वारिस को संपत्ति सौंप सकें।
हाईकोर्ट ने कहा:
“अनुकंपा नियुक्ति कोई विरासत में मिलने वाली संपत्ति या अधिकार नहीं है जो उत्तराधिकार के जरिए मिले। यह नियोक्ता द्वारा दी गई एक रियायत है ताकि शोक संतप्त परिवार को अचानक आई वित्तीय बदहाली से बचाया जा सके। इसलिए, अनुकंपा नियुक्ति के आवेदन के लिए उत्तराधिकार प्रमाण पत्र की मांग करना मनमाना और कानून के अधिकार के बिना है।”
दावों की योग्यता पर कोर्ट ने 29.09.2014 की अनुकंपा नियुक्ति नीति को लागू किया, जो कर्मचारी की मृत्यु के समय प्रभावी थी। नीति की कंडिका 2 के अनुसार:
- प्राथमिकता का क्रम: सबसे पहले जीवित पति/पत्नी को प्राथमिकता मिलती है, उसके बाद उनके द्वारा नामांकित पुत्र या अविवाहित पुत्री का स्थान आता है।
- विवाहित पुत्री की स्थिति: विवाहित पुत्री केवल तभी पात्र होती है जब मृतक की केवल बेटियां हों और मृतक की पत्नी/पति जीवित हों।
- निष्कर्ष: कोर्ट ने पाया कि अनिता वन एक विवाहित पुत्री हैं और उन्होंने इसके विपरीत (जैसे तलाक का डिक्री) कोई सबूत पेश नहीं किया। अतः पुत्र (रितेश वन) को वैधानिक प्राथमिकता है और उनका दावा विवाहित पुत्री के दावे से ऊपर है।
अनिता वन द्वारा दिए गए उदाहरणों पर कोर्ट ने कहा कि ‘वरिष्ठता का सिद्धांत’ वहां लागू होता है जहां दोनों दावेदार एक ही श्रेणी के हों (जैसे दो पात्र बेटे)। सुप्रीम कोर्ट के सरबती देवी बनाम उषा देवी मामले का जिक्र करते हुए कोर्ट ने कहा कि नामांकित व्यक्ति वित्तीय संपत्तियों के लिए कस्टोडियन हो सकता है, लेकिन:
“…इसे अनुकंपा नियुक्ति के साथ नहीं जोड़ा जा सकता। अनुकंपा नियुक्ति वारिसों के बीच बांटी जाने वाली संपत्ति नहीं है; यह एक विशिष्ट योजना है जो अपने स्वयं के नियमों और शर्तों से चलती है।”
हाईकोर्ट का निर्णय
हाईकोर्ट ने रितेश वन की याचिका स्वीकार कर ली और अनिता वन की याचिका खारिज कर दी। कोर्ट ने विभाग द्वारा जारी विवादित पत्रों को रद्द करते हुए अधिकारियों को निर्देश दिया कि वे 60 दिनों के भीतर रितेश वन की नियुक्ति पर विचार करें।
एक “अनिवार्य शर्त” के रूप में, हाईकोर्ट ने निर्देश दिया कि विभाग रितेश वन से एक शपथ पत्र ले जिसमें वे अपनी मां और अन्य आश्रितों की उचित देखभाल करने का वचन दें। कोर्ट ने चेतावनी दी:
“यह स्पष्ट किया जाता है कि यदि याचिकाकर्ता किसी भी समय इस दायित्व को पूरा करने में विफल रहता है, तो उत्तरदाता अधिकारियों को कानून की उचित प्रक्रिया का पालन करने के बाद उसकी अनुकंपा नियुक्ति रद्द करने का पूरा अधिकार होगा।”
केस विवरण:
- केस टाइटल: रितेशवन बनाम मध्यप्रदेश राज्य और अन्य
- केस नंबर: रिट पिटीशन नंबर 13968/2023 (साथ में W.P. No. 6223/2024)
- पीठ: जस्टिस जय कुमार पिल्लई
- आदेश की तिथि: 4 मई, 2026

