सुप्रीम कोर्ट ने मृत जमाकर्ताओं की लावारिस पड़ी संपत्ति (Unclaimed Deposits) को उनके कानूनी वारिसों तक पहुँचाने के लिए केंद्र सरकार को एक व्यापक नीति तैयार करने का निर्देश दिया है। कोर्ट ने सरकार से एक विस्तृत हलफनामा दाखिल करने को कहा है जिसमें यह स्पष्ट हो कि वारिसों को इन संपत्तियों की पहचान करने और उन्हें हासिल करने में कैसे मदद की जाएगी।
मंगलवार को हुई सुनवाई के दौरान भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने अपने केंद्रीकृत सर्च पोर्टल ‘UDGAM’ की प्रगति रिपोर्ट पेश की। जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस संदीप मेहता और जस्टिस विजय बिश्नोई की बेंच पत्रकार सुचेता दलाल द्वारा दायर एक जनहित याचिका (PIL) पर सुनवाई कर रही थी। इस याचिका में बैंक खातों, डाकघरों और बीमा पॉलिसियों में सालों से बेकार पड़ी भारी-भरकम राशि को उनके असली हकदारों तक पहुँचाने के लिए एक प्रभावी तंत्र बनाने की मांग की गई है।
सुनवाई के दौरान रिजर्व बैंक के वकील ने बेंच को बताया कि ‘अनक्लेम्ड डिपॉजिट्स – गेटवे टू एक्सेस इंफॉर्मेशन’ (UDGAM) पोर्टल एक इंटरैक्टिव प्लेटफॉर्म है। अब तक इस पर लगभग 44 लाख सर्च किए जा चुके हैं। इस पोर्टल का मुख्य उद्देश्य पंजीकृत उपयोगकर्ताओं को एक ही स्थान पर कई बैंकों में लावारिस जमा राशि खोजने की सुविधा देना है।
हालांकि, याचिकाकर्ता की ओर से पेश हुए वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण ने वर्तमान व्यवस्था की कमियों को उजागर किया। उन्होंने तर्क दिया कि अभी यह सिस्टम अधूरा है। उन्होंने कहा कि जहाँ एक ओर बैंकों का डेटा जोड़ा जा रहा है, वहीं डाकघर की बचत योजनाओं और बीमा पॉलिसियों में भी बहुत बड़ी राशि फंसी हुई है। भूषण ने बेंच से कहा, “इन्हें एकीकृत करने के लिए अब तक कुछ नहीं किया गया है।” उन्होंने मांग की कि एक ऐसा तंत्र होना चाहिए जहाँ एक ही सर्च से वारिस को सभी वित्तीय क्षेत्रों की जानकारी मिल सके।
यह मामला बेहद गंभीर है क्योंकि ‘डिपॉजिटर एजुकेशन एंड अवेयरनेस’ (DEA) फंड में जमा राशि में बेतहाशा बढ़ोतरी हुई है। आरबीआई ने 2014 में कमर्शियल और को-ऑपरेटिव बैंकों की लावारिस राशि को रखने के लिए इस फंड की शुरुआत की थी।
याचिका में दिए गए आंकड़ों के अनुसार:
- मार्च 2019 के अंत में इस फंड में ₹18,381 करोड़ थे।
- मार्च 2020 तक यह राशि बढ़कर ₹33,114 करोड़ हो गई।
- मार्च 2021 के अंत तक यह आंकड़ा ₹39,264.25 करोड़ तक पहुँच गया।
याचिकाकर्ता का कहना है कि आरबीआई के नियंत्रण में एक ऐसा केंद्रीकृत डेटाबेस होना चाहिए जिसमें मृतक खाताधारकों के नाम, पते और आखिरी ट्रांजेक्शन की तारीख जैसी स्पष्ट जानकारी हो।
केंद्र की ओर से पेश एडिशनल सॉलिसिटर जनरल एन. वेंकटरमन ने कहा कि यदि कोई असली वारिस सामने आता है, तो उसे डीईए फंड से पैसा वापस कर दिया जाता है। हालांकि, कोर्ट ने टिप्पणी की कि सारी जिम्मेदारी वारिसों पर ही नहीं छोड़ी जा सकती। कोर्ट ने सवाल किया कि आखिर बैंकों और संस्थानों द्वारा खुद आगे बढ़कर वारिसों को जानकारी देने की नीति क्यों नहीं बनाई जा सकती ताकि उन्हें कानूनी लड़ाई न लड़नी पड़े।
केंद्र ने अदालत को सूचित किया कि वे इन चिंताओं को दूर करने के लिए एक अपडेटेड हलफनामा तैयार कर रहे हैं। बेंच ने सरकार को एक सप्ताह का समय देते हुए प्रस्तावित नीति का विवरण मांगा है। मामले की अगली सुनवाई 19 मई को होगी।

